home page

नारायणपुर में मनाया गया नई फसल से जुड़ा ‘गायता जोहारनी’ उत्सव

 | 
नारायणपुर में मनाया गया नई फसल से जुड़ा ‘गायता जोहारनी’ उत्सव


नारायणपुर, 12 अक्टूबर (हि.स.)।जिले के देवगांव में करंगाल परगना की ओर से ग्राम बिंजली स्थित माता शीतला मंदिर परिसर में आज साेमवार काे गायता जोहारनी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में परगना के अंतर्गत आने वाले कुल 28 गांवों के ग्रामीणों ने हिस्सा लिया।

नवाखानी की परंपरा को प्रतीकात्मक रूप से आगे बढ़ाते हुए नई फसल से जुड़े भोजन के रूप में लाई और गुड़ का वितरण किया गया। कार्यक्रम में शामिल ग्रामीणों के लिए भोजन की व्यवस्था भी युवा वर्ग की ओर से की गई। गायता जोहारनी जिसे बस्तर के अबूझमाड़ में बड़े उत्साह के साथ मनाया जा रहा है।यह पर्व इसलिए भी खास है क्योंकि ये खेती-किसानी और फसलों से जुड़ा है। आधुनिकता के बढ़ते प्रभाव के बावजूद बस्तर ने अपनी अनेक सांस्कृतिक मान्यताओं और परंपराओं को आज भी जीवंत बनाए रखा है, इन्हीं परंपराओं में गायता जोहारनी का विशेष स्थान है।

गायता जोहारनी का संबंध आदिवासी समाज के महत्वपूर्ण पर्व नवाखानी से है, जो नई फसल के आगमन और उसके सेवन की परंपरा से जुड़ा हुआ है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, नई फसल को भोजन के रूप में ग्रहण करने से पहले ग्राम देवी-देवताओं और कुल देवी-देवताओं को उसका भोग अर्पित किया जाता है। इसके बाद ही समाज के लोग नई फसल का सेवन करते हैं। इसी क्रम में गायता जोहारनी का आयोजन होता है, जिसमें ग्रामीण सामूहिक रूप से सामग्री और राशि एकत्र करते हैं तथा पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ अपने ग्राम प्रमुखों का सम्मान करते हैं।

आदिवासी समाज की पारंपरिक ग्राम व्यवस्था में गायता का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। गायता गांव की सामाजिक और धार्मिक व्यवस्था से जुड़ा प्रमुख व्यक्ति होता है, जिसकी भूमिका ग्रामीण जीवन के विभिन्न संस्कारों और सामुदायिक आयोजनों में दिखाई देती है। परंपरा के अनुसार, गांव में बसाहट के लिए स्थान उपलब्ध कराने से लेकर बच्चे के जन्म, युवा अवस्था में घोटुल प्रवेश, विवाह और मृत्यु जैसे संस्कारों तक गायता की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। गायता का सम्मान करना केवल किसी व्यक्ति का सम्मान करना नहीं, बल्कि उस पारंपरिक व्यवस्था के प्रति सम्मान प्रकट करना भी है।

गायता जोहारनी के आयोजन में गांव के लोग सामूहिक रूप से एकत्र होकर गायता के घर पहुंचते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं. इसके बाद माता के गुड़ी अर्थात पारंपरिक देवस्थल में पूजा-अर्चना की जाती है. परंपरा के अनुसार, गायता सहित गांव के प्रमुख व्यक्तियों को चावल, हल्दी और फूलों से तिलक लगाकर सम्मानित किया जाता है। इस दौरान पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन और लोकगीत पूरे आयोजन को सांस्कृतिक स्वरूप प्रदान करते हैं। मांदरी नृत्य, रेला गीत-नृत्य और हुल्कि पाटा इस अवसर के प्रमुख सांस्कृतिक आकर्षण हैं। ग्राम बिंजली में आयोजित गायता जोहारनी कार्यक्रमों ने यह दिखाया कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक विरासत आज भी सामूहिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है। नई फसल के प्रति कृतज्ञता, ग्राम देवी-देवताओं के प्रति आस्था, गायता और समाज प्रमुखों के प्रति सम्मान तथा पारंपरिक गीत-नृत्य के माध्यम से आदिवासी समाज ने अपनी विशिष्ट पहचान को अभिव्यक्त किया।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे