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बस्तर की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए आयोजित हुआ सम्मेलन

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बस्तर की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए आयोजित हुआ सम्मेलन


जगदलपुर, 22 अक्टूबर (हि.स.)। बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक रीति-रिवाजों और आस्था के संरक्षण के उद्देश्य से गुरूवार को बस्तर सांस्कृतिक सुरक्षा मंच के नेतृत्व में पनारापारा स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर प्रांगण में सांस्कृतिक सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें बस्तर दशहरा से जुड़े देवी देवताओं के पुजारी, मांझी,गायता, सिरहा गुनिया तथा विभिन्न समाजों के प्रमुखजनों ने भाग लिया।

सम्मेलन में बस्तर दशहरा समिति के अध्यक्ष एवं सांसद महेश कश्यप, राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव, सर्व आदिवासी समाज के प्रांत उपाध्यक्ष एवं पूर्व विधायक राजाराम तोड़ेम तथा दंतेवाड़ा के जिया पुजारी सहित अन्य प्रमुखजन उपस्थिति में बस्तर के सभी 84 परगनों से जुड़े देवी देवताओं के पुजारियों और पारंपरिक व्यवस्था के प्रतिनिधियों की भूमिका पर चर्चा की गई। वक्ताओं ने बस्तर दशहरा की विशिष्ट परंपराओं को पीढ़ी दर पीढ़ी संरक्षित रखने और उनमें सहभागी समाजों के योगदान पर चर्चा की। बस्तर का 75 दिवसीय दशहरा पर्व अपनी अनूठी जनजातीय परंपराओं और सामूहिक सहभागिता के लिए प्रसिद्ध है। पाट जतरा से लेकर विभिन्न धार्मिक विधि विधानों और डोली विदाई तक, लकड़ी लाने, रथ निर्माण, जोगी बिठाई, श्रृंगार, रथ खींचने तथा अन्य पारंपरिक रस्मों में अनेक समाजों के सदस्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं l सम्मेलन में इन परंपराओं के निर्वहन में जुटे लोगों के योगदान को बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग बताया गया।

बस्तर सांस्कृतिक सुरक्षा मंच की इस पहल का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक मान्यताओं एवं सामाजिक व्यवस्थाओं का संरक्षण करते हुए विभिन्न समाजों के बीच समन्वय और एकता को मजबूत करना था l सम्मेलन के माध्यम से बस्तर की ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखने तथा नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का संदेश दिया गया। आयोजक मंच ने बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण बनाए रखने के लिए सामूहिक सहभागिता और निरंतर प्रयासों के महत्व को रेखांकित करने आयोजन किया गया l

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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे