home page

अंबिकापुर : रासायनिक खादों को अलविदा कह नील-हरित शैवाल से खेतों की सेहत संवार रहे प्रगतिशील किसान धनेश्वर

 | 
अंबिकापुर : रासायनिक खादों को अलविदा कह नील-हरित शैवाल से खेतों की सेहत संवार रहे प्रगतिशील किसान धनेश्वर


अंबिकापुर : रासायनिक खादों को अलविदा कह नील-हरित शैवाल से खेतों की सेहत संवार रहे प्रगतिशील किसान धनेश्वर


अंबिकापुर, 02 जून (हि.स.)। सरगुजा जिले के अंबिकापुर विकासखंड के ग्राम पंचायत लब्जी (नावापारा) में 'खेत बचाओ अभियान' के तहत पर्यावरण और सेहत सुधार की एक नई मिसाल देखने को मिल रही है। खेती में रासायनिक खादों के अंधाधुंध इस्तेमाल से मिट्टी की घटती उपजाऊ क्षमता के बीच यहाँ के एक प्रगतिशील किसान धनेश्वर प्रसाद ने एक सकारात्मक और अनुकरणीय राह चुनी है। छह एकड़ कृषि भूमि के स्वामी धनेश्वर अब रासायनिक खादों का मोह छोड़कर पूरी तरह जैविक खेती की ओर कदम बढ़ा चुके हैं और क्षेत्र के दूसरे किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन रहे हैं।

धनेश्वर प्रसाद के इस बदलाव की कहानी कृषि विभाग के सही मार्गदर्शन से शुरू हुई। वे बताते हैं कि पहले वे अपनी फसलों में केवल रासायनिक खादों का ही प्रयोग करते थे, जिसके दुष्परिणामस्वरूप हर साल खाद की मात्रा बढ़ानी पड़ती थी और जमीन की स्वाभाविक उर्वरा शक्ति कम होती जा रही थी। इस गंभीर समस्या से उबरने के लिए उन्होंने कृषि विस्तार विभाग से संपर्क कर अपने खेत की मिट्टी की जांच कराई। परीक्षण रिपोर्ट में मिट्टी के भीतर नाइट्रोजन की भारी कमी पाई गई, जिसके बाद विभागीय अधिकारियों ने उन्हें मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए ’नील-हरित शैवाल’ (ब्लू-ग्रीन एल्गी) के प्रयोग की तकनीकी सलाह दी।

कृषि विभाग के इसी परामर्श को अमलीजामा पहनाते हुए धनेश्वर ने एक अनूठा नवाचार किया। उन्होंने अपने घर की बाड़ी में ही एक विशेष टैंक का निर्माण कर नील-हरित शैवाल का उत्पादन शुरू कर दिया है। धनेश्वर के अनुसार, इस टैंक से लगभग 25 किलोग्राम नील-हरित शैवाल का उत्पादन प्राप्त होगा। इसे खेतों में डालने से मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की पूर्ति होगी, जिससे जमीन का स्वास्थ्य सुधरेगा और फसलों की गुणवत्ता व मात्रा दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

जैविक खेती के दूरगामी फायदों को रेखांकित करते हुए धनेश्वर प्रसाद कहते हैं कि यह कदम न सिर्फ वर्तमान फसल को बचाने के लिए है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य और उनके स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए भी बेहद जरूरी है। रासायनिक खादों के दुष्प्रभाव से आज बीमारियां बढ़ रही हैं, जबकि जैविक खेती से हमें शुद्ध और पौष्टिक आहार मिलेगा। पर्यावरण और अपनी माटी को बचाने की इस मुहिम में जुटे धनेश्वर ने क्षेत्र के अन्य कृषक बंधुओं से भी पुरजोर अपील की है कि वे रसायनों का त्याग कर जैविक खेती को अपनाएं, ताकि खेती, मिट्टी और इंसानी सेहत को बचाया जा सके।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / पारस नाथ सिंह