अबूझमाड़ के घोटुलों में चार दशक बाद एक बार फिर गूंज रही मांदर की थाप
नारायणपुर, 29 अगस्त (हि.स.)। जिले के अबूझमाड़ के ग्रामीण चार दशक तक नकसली हिंसा और भय के साये में अपनी सांस्कृतिक विरासत से दूर रहे, लेकिन अब फिर अपनी परंपराओं की ओर लौट रहे हैं। कभी शाम होते ही गांवों में छा जाने वाला सन्नाटा अब कई जगह मांदर की थाप और पारंपरिक गीतों से टूट रहा है। घोटुलों में चेलिक और मोटियारिनों की मौजूदगी बढ़ने लगी है। युवा पारंपरिक नृत्य और गीतों के जरिए अपनी संस्कृति से दोबारा जुड़ रहे हैं। बुजुर्गों के लिए यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उस सामाजिक जीवन की वापसी है, जो लंबे समय तक नक्सल हिंसा के कारण प्रभावित रहा। अब घोटुल की रौनक अबूझमाड़ में बदलते माहौल और लौटते भरोसे की तस्वीर बन रही है।
अबूझमाड़ में लंबे समय तक नक्सल हिंसा का असर केवल सुरक्षा और आवागमन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गांवों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन पर भी पड़ा, शाम होते ही ग्रामीण घरों में सिमट जाते थे। सार्वजनिक रूप से जुटना, त्योहार मनाना और पारंपरिक आयोजनों में शामिल होना जोखिम भरा माना जाता था। इसका असर घोटुल जैसी सामुदायिक संस्थाओं पर भी पड़ा और कई जगह इनकी गतिविधियां लगभग थम गईं। अब परिस्थितियों में बदलाव के साथ ग्रामीण जीवन की पुरानी लय लौटती दिखाई दे रही है। सुरक्षा व्यवस्था मजबूत होने और नक्सल प्रभाव कम होने से गांवों में लोगों का भरोसा बढ़ा है। शाम होते ही युवा घोटुल की ओर पहुंचने लगे हैं। मांदर की थाप के साथ पारंपरिक गीत और नृत्य शुरू होते हैं। चेलिक और मोटियारिन अपनी सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने में भूमिका निभा रहे हैं।
ग्रामीणों के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि घोटुल उनके सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा रहा है। यहां युवा गीत-संगीत और नृत्य के साथ अनुशासन, सामूहिकता और सामाजिक व्यवहार भी सीखते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि घोटुलों में लौटती चहल-पहल यह संकेत है कि अबूझमाड़ में केवल शांति ही नहीं लौट रही, बल्कि लंबे समय से प्रभावित सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन भी फिर से सांस लेने लगा है। अबूझमाड़ की आदिवासी संस्कृति प्रकृति, सामुदायिक जीवन और लोक परंपराओं से गहराई से जुड़ी है। घोटुल इस संस्कृति की महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है, जहां युवा पीढ़ी अपनी परंपराओं को सीखती और आगे बढ़ाती है
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे

