बलरामपुर : शंकरगढ़ के 11 युवाओं का अग्निवीर में चयन, जिले को मिला पहला पैरा कमांडो
बलरामपुर, 19 जून (हि.स.)। जिले के विकासखंड शंकरगढ़ के दूरस्थ गांवों के 11 युवाओं ने भारतीय सेना के अग्निवीर भर्ती अभियान में चयनित होकर क्षेत्र का गौरव बढ़ाया है। इनमें ग्राम जोकापाठ निवासी अरविंद यादव का चयन भारतीय सेना की प्रतिष्ठित स्पेशल फोर्स ‘पैरा कमांडो’ में हुआ है। शुक्रवार को चयनित युवा अपने प्रशिक्षकों के साथ कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी से मिलने पहुंचे, जहां उन्होंने सभी को शुभकामनाएं देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
कलेक्टर ने कहा कि सरगुजा संभाग, बलरामपुर जिला और विशेष रूप से शंकरगढ़ क्षेत्र के युवाओं में अपार प्रतिभा और क्षमता है। यदि उन्हें सही मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और प्रोत्साहन मिले तो वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना सकते हैं। उन्होंने चयनित युवाओं से अपने गांवों और पंचायतों के अन्य युवाओं को भी प्रेरित करने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि दूरस्थ अंचलों के युवाओं की सफलता पूरे समाज के लिए प्रेरणा बनती है और इससे नई पीढ़ी को आगे बढ़ने का आत्मविश्वास मिलता है।
अग्निवीर भर्ती में सफलता हासिल करने वाले इन युवाओं की कहानी केवल चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कठिन परिस्थितियों में संघर्ष, अनुशासन और दृढ़ संकल्प की मिसाल भी है। सीमित संसाधनों और सुविधाओं के बीच गांव की पगडंडियों, मैदानों और जंगलों में नियमित अभ्यास करते हुए इन युवाओं ने अपने सपनों को साकार किया। सुबह की दौड़, घंटों की तैयारी और देश सेवा का जज्बा ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
युवाओं की इस उपलब्धि के पीछे अतिथि शिक्षक सुदर्शन यादव और एक सेवानिवृत्त सैनिक की महत्वपूर्ण भूमिका रही। दोनों ने युवाओं को सेना भर्ती प्रक्रिया की जानकारी देने के साथ शारीरिक और लिखित परीक्षा की तैयारी कराई तथा लगातार उनका मनोबल बढ़ाया। प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन और युवाओं की कड़ी मेहनत ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया।
सुदर्शन यादव ने बताया कि शंकरगढ़ क्षेत्र के युवाओं में खेल प्रतिभा और शारीरिक क्षमता भरपूर है। आवश्यकता केवल उन्हें सही दिशा और अवसर प्रदान करने की है।
ग्राम जोकापाठ निवासी अरविंद यादव का चयन भारतीय सेना की स्पेशल फोर्स ‘पैरा कमांडो’ में हुआ है। जिले से इस प्रतिष्ठित इकाई में चयनित होने वाले वे पहले युवा बताए जा रहे हैं। अरविंद ने बताया कि सेना में भर्ती होकर देश सेवा करना उनका बचपन का सपना था। उन्होंने आठवीं कक्षा से ही दौड़ और शारीरिक तैयारी शुरू कर दी थी।अरविंद ने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता, प्रशिक्षकों और प्रशासन से मिले प्रोत्साहन को दिया। उनका कहना है कि निरंतर अभ्यास, अनुशासन और लक्ष्य के प्रति समर्पण ने उन्हें यह सफलता दिलाई।
वनांचल और ग्रामीण क्षेत्रों से घिरे शंकरगढ़ में न तो बड़े प्रशिक्षण केंद्र उपलब्ध हैं और न ही आधुनिक सुविधाएं, लेकिन इसके बावजूद यहां के युवाओं ने कठिन परिस्थितियों को अपनी सफलता की राह में बाधा नहीं बनने दिया। इन 11 युवाओं की उपलब्धि यह साबित करती है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती और दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर किसी भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है।
हिन्दुस्थान समाचार / विष्णु पांडेय

