बारिश में मवेशियों की देखभाल एवं टीकाकरण से ही सुरक्षित रहेगी पशुपालकों की आजीविका
जगदलपुर, 27 अगस्त (हि.स.)। बारिश का मौसम पशुपालकों के लिए राहत के साथ-साथ कई गंभीर चुनौतियां भी लेकर आता है। वर्षा ऋतु में वातावरण में नमी बढ़ने, पशु आवास में पानी व कीचड़ जमा होने, चारे की गुणवत्ता प्रभावित होने तथा विभिन्न संक्रामक रोगों का प्रकोप तेजी से बढ़ने की संभावना रहती है।
शहीद गुंडाधुर कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केंद्र, कुम्हरावंड की सहायक प्राध्यापक (पशुधन उत्पादन प्रबंधन) डॉ. नीता मिश्रा ने उन्नत गौशाला में गुरुवार काे आयोजित वैज्ञानिक पशुपालन शिविर के दौरान विद्यार्थियों और पशुपालकों को संबोधित किया। उन्हाेंने कहा कि बस्तर जैसे ग्रामीण एवं आदिवासी अंचल में पशुपालन आजीविका का प्रमुख आधार है, ऐसे में इस मौसम में पशुओं के स्वास्थ्य की नियमित निगरानी, सुरक्षा और वैज्ञानिक प्रबंधन अत्यंत आवश्यक हो जाता है। इस विशेष शिविर में विद्यार्थियों को बरसात के मौसम में पशु प्रबंधन और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया।
सहायक प्राध्यापक डॉ. नीता मिश्रा ने बताया कि बारिश के दिनों में पशुशाला में जलभराव सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरता है, इसलिए पशुशाला का फर्श हमेशा ऊंचा और पर्याप्त ढलान वाला होना चाहिए ताकि मलमूत्र और पानी की निकासी आसानी से हो सके। पशुओं को लगातार गीली और कीचड़युक्त जगह पर रखने से खुर रोग, त्वचा संक्रमण और अन्य बीमारियां तेजी से फैलती हैं, जिसे रोकने के लिए नियमित सफाई और सूखा बिछावन बेहद जरूरी है। इसके साथ ही पशुशाला में पर्याप्त वेंटिलेशन होना चाहिए ताकि नमी और अमोनिया जैसी हानिकारक गैसों का जमाव न हो सके। उन्होंने रेखांकित किया कि बरसात के मौसम में गलघोटू, लंगड़ा बुखार, खुरपका-मुंहपका, एंथ्रेक्स, भेड़-बकरियों में पीपीआर व एंटरोटॉक्सीमिया, सूकरों में स्वाइन फीवर तथा मुर्गियों में रानीखेत व मरेक जैसी संक्रामक एवं जानलेवा बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। इन सभी बीमारियों से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय समय पर टीकाकरण है, इसलिए पशुपालकों को अपने क्षेत्र में चलाए जा रहे सरकारी टीकाकरण अभियानों में अनिवार्य रूप से भाग लेकर अपने मवेशियों का टीकाकरण कराना चाहिए।
शिविर में चारे की गुणवत्ता और पोषण पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने समझाया कि पशुओं को अत्यधिक गीला, सड़ा-गला या फफूंद लगा चारा बिल्कुल न खिलाएं और केवल हरे चारे पर निर्भर रहने के बजाय सूखा चारा, दाना मिश्रण, खनिज लवण व नमक का संतुलित अनुपात में देवें। पशुओं को हमेशा स्वच्छ व ताजा पेयजल उपलब्ध कराया जाए और दुग्ध दोहन के समय थनों व बर्तनों की विशेष स्वच्छता रखी जाए ताकि थनैला रोग से बचाव हो सके। इसके अलावा नवजात बछड़ों, मेमनों और चूजों को ठंड तथा नमी से सुरक्षित रखते हुए जन्म के तुरंत बाद पर्याप्त मात्रा में खीस पिलाना उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए आवश्यक है। अंत में डॉ. मिश्रा ने अपील की कि तेज बारिश या आकाशीय बिजली के दौरान मवेशियों को खुले में न छोड़ें और किसी भी पशु में सुस्ती, तेज बुखार, लंगड़ापन, मुंह में छाले या दूध में अचानक कमी जैसे लक्षण दिखते ही उसे तुरंत अन्य पशुओं से अलग कर नजदीकी पशु चिकित्सक से परामर्श लें, क्योंकि समय पर बरती गई थोड़ी सी सावधानी पशुधन के स्वास्थ्य और पशुपालक की आय दोनों को सुरक्षित रखती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे

