रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भारत की बड़ी छलांग, यूरोप में बढ़ी भारत में बने हथियारों की मांग
नई दिल्ली, 24 अक्टूबर (हि.स.)। वैश्विक स्तर पर बदलते सुरक्षा हालात और यूरोपीय देशों की बढ़ती सैन्य जरूरतों से भारतीय रक्षा उद्योग को बड़ा अवसर मिला है। रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद यूरोप के चुनिंदा देशों को भारत से होने वाले गोला-बारूद और संबंधित उत्पादों के निर्यात में 1,600 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। इस बढ़ोतरी के साथ भारत पूर्वी और मध्य यूरोप के 13 देशों को इन उत्पादों की आपूर्ति करने वाले देशों में दक्षिण कोरिया के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। युद्ध से पहले भारत इस सूची में 28वें स्थान पर था।
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार रूस और यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद के चार वर्षों में भारतीय कंपनियों ने यूरोपीय देशों को कम से कम 87.2 करोड़ डॉलर मूल्य के गोला-बारूद और संबंधित उत्पादों का निर्यात किया। इससे पहले के चार वर्षों में इन उत्पादों का निर्यात मूल्य करीब सिर्फ 4.92 करोड़ डॉलर था। युद्ध के पहले की और युद्ध शुरू होने के बाद की दोनों अवधियों की तुलना से निर्यात में हुई तेज वृद्धि का पता चलता है। ये आंकड़े भारत के संपूर्ण रक्षा निर्यात के बजाय गोला-बारूद और उससे जुड़ी कुछ खास श्रेणियों के उत्पादों से संबंधित हैं।
यूरोप में भारतीय उत्पादों की मांग बढ़ने की प्रमुख वजह लंबे समय से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध है। इस संघर्ष के कारण कई यूरोपीय देशों को अपने सैन्य भंडार की भरपाई करने और रक्षा तैयारियों को मजबूत बनाने की जरूरत पड़ी है। क्षेत्र के कुछ देशों ने यूक्रेन को भी हथियार और गोला-बारूद उपलब्ध कराया है। इससे उनके अपने भंडार पर दबाव बढ़ा और अतिरिक्त आपूर्ति के लिए दूसरे देशों की कंपनियों के साथ कारोबार के अवसर पैदा हुए।
रिपोर्ट के अनुसार भारतीय कंपनियों से यूरोप भेजे जाने वाले उत्पादों में तोपों के गोले, मोर्टार, गोला-बारूद और विस्फोटक शामिल हैं। इन उत्पादों की सैन्य अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पोलैंड, रोमानिया, बुल्गारिया, क्रोएशिया और चेक गणराज्य सहित पूर्वी तथा मध्य यूरोप के कई देशों में इनकी मांग बढ़ी है। भारतीय रक्षा कंपनियों के लिए यह बाजार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे उन्हें घरेलू ऑर्डर के अलावा विदेशी ग्राहकों से भी कारोबार हासिल करने का अवसर मिल रहा है।
रक्षा निर्यात में आई इस तेजी के साथ भारत के कुल रक्षा निर्यात ने भी नया रिकॉर्ड बनाया है। रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में देश का रक्षा निर्यात बढ़कर 38,424 करोड़ रुपये हो गया, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में यह 23,622 करोड़ रुपये था। इस तरह सालाना आधार पर इसमें 62.66 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इस दौरान भारत ने 80 से अधिक देशों को रक्षा उपकरणों की आपूर्ति की।
कुल रक्षा निर्यात में सरकारी और निजी कंपनियों, दोनों का योगदान रहा। वित्त वर्ष 2025-26 में रक्षा क्षेत्र की सार्वजनिक कंपनियों ने 21,071 करोड़ रुपये के उत्पादों का निर्यात किया, जबकि निजी कंपनियों का निर्यात 17,353 करोड़ रुपये रहा। पिछले वित्त वर्ष की तुलना में सरकारी रक्षा कंपनियों के निर्यात में 151 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि निजी क्षेत्र के निर्यात में 14 प्रतिशत का इजाफा दर्ज किया गया। ये आंकड़े भारतीय रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में बढ़ती उत्पादन क्षमता और विदेशी बाजारों में विस्तार की संभावनाओं को दर्शाते हैं।
गोला-बारूद के उत्पादन में म्यूनिशन्स इंडिया लिमिटेड की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस कंपनी का गठन वर्ष 2021 में तत्कालीन ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) के पुनर्गठन के बाद किया गया था। उस समय बोर्ड के 41 कारखानों को सार्वजनिक क्षेत्र की अलग-अलग रक्षा कंपनियों में विभाजित किया गया। इस बदलाव का उद्देश्य उत्पादन व्यवस्था में दक्षता बढ़ाना, कंपनियों की जवाबदेही मजबूत करना और रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करना था। इसके बाद सरकारी कंपनियों के साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ी है।
ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत घरेलू रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करने की कोशिश की जा रही है। इसके साथ ही भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह मजबूत करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। विदेशी मांग बढ़ने से उत्पादन क्षमता का बेहतर इस्तेमाल, नए निवेश और आपूर्ति शृंखला के विस्तार की संभावनाएं बन सकती हैं।
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि रक्षा निर्यात के आंकड़ों से भारतीय रक्षा उद्योग की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय मौजूदगी का संकेत मिलता है लेकिन निर्यात में आई तेज वृद्धि को बनाए रखने के लिए कंपनियों को समय पर आपूर्ति, गुणवत्ता और नियामकीय शर्तों का पालन सुनिश्चित करना होगा। यूरोप में बढ़ती मांग भारतीय रक्षा विनिर्माण के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर है, जिसका दीर्घकालीन लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत ग्लोबल मार्केट में अपनी विश्वसनीयता और उत्पादन क्षमता को किस तरह मजबूत करता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / योगिता पाठक

