home page

जीडीपी अनुमान की नई पद्धति का केंद्र ने किया बचाव, संशोधन को अद्यतन आंकड़ों का परिणाम बताया

 | 
जीडीपी अनुमान की नई पद्धति का केंद्र ने किया बचाव, संशोधन को अद्यतन आंकड़ों का परिणाम बताया


-एमओएसपीआई ने जीडीपी की गणना के तरीके, नेगेटिव मैन्युफैक्चरिंग डिफ्लेटर और अनुमानों में किए गए बदलावों की जानकारी दी

नई दिल्ली, 02 सितंबर (हि.स.)। केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 की (अप्रैल-जून) पहली तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अनुमानों में किए गए बदलावों व नई पद्धति के बारे में विस्तार से जानकारी दी है।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) ने हाल में जारी देश की आर्थिक वृद्धि के अनुमानों की पद्धति का बचाव करते हुए बुधवार को कहा कि पिछले वित्त वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में संशोधन और विभिन्न मूल्य सूचकांकों में अंतर अद्यतन आंकड़ों तथा अनुमान लगाने की बेहतर तकनीकों को दर्शाते हैं, न कि यह मुख्य वृद्धि दर को कृत्रिम रूप से बढ़ाने का प्रयास है।

एमओएसपीआई का यह स्पष्टीकरण सरकार द्वारा 2022-23 को आधार वर्ष बनाकर वार्षिक और तिमाही जीडीपी अनुमानों की नई शृंखला के जारी किए जाने के दो दिनों बाद आया है। मंत्रालय ने बताया कि इसमें नया उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई), बैंकिंग सेवा मूल्य सूचकांक और अतिरिक्त प्रशासनिक आंकड़े शामिल किए गए हैं। एमओएसपीआई ने जीडीपी की गणना के तरीके, नेगेटिव विनिर्माण अपस्फीतिकारक और चालू वित्त वर्ष 2026-27 की (अप्रैल-जून) तिमाही के जीडीपी अनुमानों में किए गए बदलावों के बारे में विस्तार से जानकारी दी है।

मंत्रालय ने बयान में बताया कि चालू वित्त वर्ष 2026-27 की अप्रैल-जून तिमाही के जीडीपी अनुमानों के अलग-अलग पहलुओं को समझाने के लिए अतिरिक्त जानकारी जारी की गई है। इसमें डबल अपस्फीति का इस्तेमाल, जीडीपी और महंगाई मापने के दूसरे तरीकों के बीच अंतर, इससे पिछले वित्त वर्ष के अनुमानों में बदलाव और नॉमिनल एवं रियल ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) के बीच का अंतर शामिल है।

मंत्रालय ने बताया कि 31 अगस्त, 2026 को आधार वर्ष 2022-23 के साथ वार्षिक और त्रैमासिक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अनुमानों की अद्यतन श्रृंखला जारी की गई। इन जीडीपी के अनुमानों को आधार वर्ष 2022-23 के साथ आउटपुट उत्पादक मूल्य सूचकांक (पीपीआई), बैंकिंग सेवा मूल्य सूचकांक (बीकेएसपीआई) की नई श्रृंखला और विभिन्न प्रशासनिक स्रोतों से प्राप्त अद्यतन आंकड़ों का उपयोग करके अपडेट किया गया है।

मंत्रालय ने विनिर्माण क्षेत्र में नकारात्मक अंतर्निहित मूल्य डिफ्लेटर, खनन क्षेत्र में नाममात्र एवं वास्तविक वृद्धि के बीच बड़े फासले और उत्पादन एवं व्यय-आधारित अनुमानों के बीच सांख्यिकीय अंतर से जुड़े सवालों का जवाब दिया गया है। संशोधित जीडीपी शृंखला के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 की अप्रैल-जून तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था वास्तविक रूप से 7.8 फीसदी की दर से बढ़ी है।

मंत्रालय ने कहा कि विनिर्माण क्षेत्र के लिए नकारात्मक अंतर्निहित सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) डिफ्लेटर का अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि कारखाने से निकलने वाले उत्पादों की कीमतों में गिरावट आई है। जून तिमाही में विनिर्माण जीवीए की गणना ‘डबल-डिफ्लेशन’ पद्धति से की गई। इसमें उत्पादन और मध्यवर्ती खपत को कीमतों में बदलाव के आधार पर अलग-अलग समायोजित करने के बाद वास्तविक जीवीए निकाला जाता है। जब इनपुट कीमतें उत्पादन कीमतों की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ती हैं तो नाममात्र जीवीए वास्तविक जीवीए की तुलना में धीमी गति से बढ़ सकता है। इससे दोनों उत्पादन और इनपुट कीमतों में वृद्धि के बावजूद नकारात्मक अंतर्निहित डिफ्लेटर बन सकता है।

मंत्रालय ने कहा कि अप्रैल-जून तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र का वास्तविक जीवीए 9.2 फीसदी बढ़ा, जबकि नाममात्र वृद्धि 7.7 फीसदी रही है। इससे अंतर्निहित जीवीए डिफ्लेटर शून्य से 1.5 फीसदी रहा। मंत्रालय ने ऐसे क्षेत्रों में कपड़ा एवं कपास ओटाई, बुनियादी धातु तथा रबड़ और प्लास्टिक उत्पादों का उल्लेख किया, जहां इनपुट कीमतों में वृद्धि उत्पादन कीमतों की वृद्धि से अधिक रही।

एमओएसपीआई ने अंतरराष्ट्रीय अनुभव का भी हवाला देते हुए कहा कि ऊर्जा और कच्चे माल की कीमतों में झटकों के दौरान डबल-डिफ्लेशन का इस्तेमाल करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में विनिर्माण क्षेत्र के डिफ्लेटर नकारात्मक यानी अस्थिर हो सकते हैं। कृषि का मामला कुछ अलग है। तिमाही कृषि जीवीए का पहले उत्पादन आंकड़ों के आधार पर स्थिर कीमतों पर अनुमान लगाया जाता है और इसके बाद संबंधित उत्पादक मूल्य सूचकांक के आधार पर मौजूदा कीमतों पर अनुमान निकाला जाता है। मंत्रालय ने कहा कि पहली तिमाही में कृषि, वानिकी और मत्स्य उत्पादन पीपीआई करीब पांच फीसदी बढ़ा, जिससे निहित मुद्रास्फीति दर 3.9 फीसदी रही।

मंत्रालय ने इस दावे को भी खारिज किया कि जून तिमाही 2025-26 के लिए मौजूदा कीमतों पर जीडीपी अनुमान को 86.05 लाख करोड़ रुपये से घटाकर 80 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया ताकि नवीनतम वृद्धि दर अधिक मजबूत दिखाई दे। मंत्रालय के मुताबिक, 86.05 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा 2011-12 आधार वर्ष वाली पुरानी शृंखला के तहत निकाला गया था और अगस्त, 2025 में पहली बार जारी हुआ था। फरवरी, 2026 में 2022-23 आधार वर्ष वाली नई शृंखला लागू होने पर पहली तिमाही का संबंधित अनुमान संशोधित होकर 80.32 लाख करोड़ रुपये रह गया। अप्रैल-जून में वित्त वर्ष 2025-26 के अस्थायी जीडीपी अनुमान जारी होने पर यह आंकड़ा बढ़कर 80.44 लाख करोड़ रुपये किया गया। इसके बाद नयी औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) और पीपीआई श्रृंखला को शामिल करने पर इसे फिर से संशोधित कर 80 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया।

मंत्रालय ने कहा कि ये संशोधन नया आधार वर्ष, बेहतर आंकड़ा स्रोत, अद्यतन पद्धतियों और अतिरिक्त संकेतकों को शामिल करने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। उसने यह भी कहा कि पुराने 86.05 लाख करोड़ रुपये के अनुमान की तुलना नवीनतम वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही के अनुमान से सीधे नहीं की जानी चाहिए क्योंकि दोनों अलग जीडीपी शृंखलाओं से संबंधित हैं। नई शृंखला के तहत वित्त वर्ष 2025-26 की जून तिमाही का तुलनीय आंकड़ा 80.32 लाख करोड़ रुपये था।

मंत्रालय ने यह भी समझाने की कोशिश की है कि करीब 2.5 प्रतिशत की निहित जीडीपी मुद्रास्फीति दर उपभोक्ता और थोक मुद्रास्फीति से काफी अलग क्यों हो सकती है।

जीडीपी डिफ्लेटर पूरी अर्थव्यवस्था में कीमतों का एक मापक है, जो नाममात्र एवं वास्तविक जीडीपी के अनुपात से निकाला जाता है। इसके विपरीत, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) घरेलू खपत के एक तय समूह को मापता है, जबकि थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) मुख्य रूप से वस्तुओं पर केंद्रित होता है और सेवाओं को शामिल नहीं करता। जीडीपी डिफ्लेटर निवेश, सरकारी खर्च, निर्यात और सेवाओं की व्यापक श्रेणी समेत पूरी अर्थव्यवस्था में कीमतों के प्रभाव को दर्शाता है।

मंत्रालय ने कहा कि जीडीपी तैयार करने में वस्तु या समूह के स्तर पर 300 से अधिक अलग-अलग मूल्य डिफ्लेटर का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए निहित जीडीपी डिफ्लेटर का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) या थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के अनुरूप चलना जरूरी नहीं है। इस तरह तीनों सूचकांकों के दायरे, भार, कीमतों की अवधारणा और विभिन्न क्षेत्रों में कीमतों में बदलाव के अंतर से इनके बीच बड़ा अंतर हो सकता है।

मंत्रालय ने कहा कि खनन क्षेत्र में नाममात्र और वास्तविक जीवीए वृद्धि के बीच बड़ा अंतर मुख्य रूप से खनिज कीमतों में तेज वृद्धि के कारण रहा, न कि अनुमानों में किसी असंगति के कारण। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में खनन और उत्खनन क्षेत्र का वास्तविक जीवीए 2.4 फीसदी घटा। यह क्षेत्र के औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में दर्ज कमजोरी के अनुरूप था। खनन आईआईपी अप्रैल में 3.8 फीसदी और मई में 1.4 फीसदी घटा, जबकि जून में इसमें 1.6 फीसदी की वृद्धि हुई। इसी दौरान उत्पादक कीमतों में तेज वृद्धि हुई।

खनन और संबद्ध पीपीआई मुद्रास्फीति अप्रैल में 22 फीसदी, मई में 21.2 फीसदी और जून में 15.5 फीसदी रही। कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस की कीमतों में मई में 72.2 फीसदी तक की वृद्धि हुई, जबकि धातु-अयस्क की कीमतें तीनों महीनों में 23 फीसदी से अधिक बढ़ीं। इसके परिणामस्वरूप वास्तविक जीवीए में गिरावट के बावजूद तिमाही में खनन और संबद्ध क्षेत्र का नाममात्र जीवीए 22.3 फीसदी बढ़ा।

मंत्रालय ने उत्पादन और व्यय पद्धतियों से निकाले गए जीडीपी अनुमानों के बीच अपेक्षाकृत बड़े सांख्यिकीय अंतर को लेकर भी बहुत अधिक निष्कर्ष निकालने से सावधान किया। उसने कहा कि यह अंतर दोनों पद्धतियों से प्राप्त अनुमानों के बीच अंतर को दर्शाने वाला एक संतुलन मद है और अधिक व्यापक स्रोत आंकड़े उपलब्ध होने पर इसमें बदलाव हो सकता है। मंत्रालय के अनुसार, मौजूदा अंतर के आकार को अपने आप में जीडीपी के कम या अधिक आकलन का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।

भविष्य में संशोधनों के दौरान जीडीपी किसी भी दिशा में बदल सकती है, जो उत्पादन और व्यय पक्ष के अंतर्निहित अनुमानों में बदलाव पर निर्भर करेगा। मंत्रालय ने कहा कि मौजूदा कीमतों पर अंतिम अनुमानों में यह अंतर बहुत कम या शून्य हो जाता है। उसने वित्त वर्ष 2022-23 और वित्त वर्ष 2023-24 को इसके उदाहरण के रूप में बताया।

उल्लेखनीय है कि भारत ने पहली तिमाही में 7.8 फीसदी जीडीपी वृद्धि हासिल की है, जिसके लिए प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों को बधाई भी दी थी।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / प्रजेश शंकर