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विश्व जल दिवस पर 'विश्व शांति में जल की भूमिका' विषय पर वेबिनार का आयोजन

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विश्व जल दिवस पर 'विश्व शांति में जल की भूमिका' विषय पर वेबिनार का आयोजन


सहरसा, 22 मार्च (हि.स.)। नदी मित्र इकाई, सहरसा द्वारा विश्व जल दिवस के अवसर पर 22 मार्च को 'विश्व शांति में जल की भूमिका' विषय पर मत्स्यगंधा स्थित कला ग्राम में वेबिनार का आयोजन किया गया। मुख्य वक्ता के रूप में नदी मित्र ओम प्रकाश भारती ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा इस वर्ष विश्व जल दिवस का विषय है -'शांति के लिए जल' , जो बेहतर जल सुरक्षा, टिकाऊ कृषि उत्पादन और पर्यावरणीय अखंडता की आवश्यकता को दर्शाता है।इसका उद्देश्य समाज को मीठे पानी के महत्व के बारे में जागरूक करना रहा है। एक समय था जब कुओं, तालाबों, नालों, नदियों और अन्य स्रोतों में स्वच्छ जल उपलब्ध था, लेकिन अब स्थिति बिल्कुल अलग है। पानी की मात्रा और गुणवत्ता दोनों ही दृष्टि से उसकी उपलब्धता एक गंभीर समस्या है।

जल संकट कई कारकों पर आधारित भौतिक या आर्थिक हो सकता है, जैसे कि तीव्र शहरीकरण, औद्योगीकरण, अस्थिर कृषि पद्धतियाँ, जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा पैटर्न, जल का अत्यधिक उपयोग और अक्षम जल प्रबंधन, प्रदूषण, अपर्याप्त अवसंरचना, हितधारकों के बीच जुड़ाव की कमी, भारी वर्षा के कारण अपवाह, मृदा अपरदन और अवसादन। जल की कमी से पारिस्थितिकी तंत्र का कामकाज बाधित होता है, खाद्य और जल सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है, और अंततः शांति प्रभावित होती है। विश्व संसाधन संस्थान के अनुसार, 17 देश 'अत्यधिक उच्च' स्तर के जल संकट का सामना कर रहे हैं, जिससे लोगों के बीच संघर्ष, अशांति और अशांति उत्पन्न होने का खतरा है।आज विश्व के 1.6 अरब लोगों को पीने का स्वच्छ जल नहीं मिल पा रहा है। जल संरक्षण तथा सभी को स्वच्छ जल उपलब्ध कराना आज की सबसे बड़ी चुनौती है। केवल भारत में 200 से अधिक नदियां लुप्त होने के कगार पर है।

नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 60 करोड़ से अधिक लोग शुद्ध जल नहीं प्राप्त होने का दबाव झेल रहे हैं। भारत में लगभग 70 फीसदी जल प्रदूषित है। जिसकी वजह से पानी की गुणवत्ता के वैश्वविक सूचकांक में भारत 120वें स्थान पर है। भारत भी इन समस्याओं से अछूता नहीं है।भारत के लगभग हर राज्य और प्रमुख शहरों में भूजल स्तर घट रहा है भारत में जल की उपलब्धता पहले से ही इतनी कम है कि इसे जल संकटग्रस्त श्रेणी में रखा जा सकता है, और अनुमान है कि यह 2025 तक घटकर 1341 घन मीटर और 2050 तक 1140 घन मीटर हो जाएगी।

हिन्दुस्थान समाचार / अजय कुमार