किशनगंज में बायो डीकंपोज़र तकनीक का सफल प्रयोग, 2000 से अधिक किसान लाभान्वित
किशनगंज, 22 मार्च (हि.स.)। जिले में बायो डीकंपोज़र तकनीक का प्रयोग तेजी से बढ़ रहा है। लगभग 15 गांवों में इस तकनीक को अपनाकर 2000 से अधिक किसान लाभान्वित हो रहे हैं। दिघलबैंक, बहादुरगंज, ठाकुरगंज एवं किशनगंज प्रखंड के कई गांवों के किसान फसल अवशेष प्रबंधन के लिए इस तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। कृषि विभाग के जिला कृषि पदाधिकारी प्रभात कुमार एवं प्रदान संस्थान के जिला समन्वयक अमित कुमार ठाकुर के प्रयास से यह पहल सफल हो रही है। विभाग की योजना के तहत आगामी वर्ष में इसे 30 से 40 गांवों तक विस्तार देने का लक्ष्य रखा गया है। बिहार दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में जिलाधिकारी विशाल राज ने कृषि विभाग के स्टॉल का निरीक्षण किया। इस दौरान चपाती गांव में उत्पादित विभिन्न सब्जियों एवं जैविक खाद तकनीकों का प्रदर्शन किया गया। स्टॉल पर वर्मी कम्पोस्ट, सुपर कम्पोस्ट, बायो डीकंपोज़र, जीवामृत एवं बीजामृत की जानकारी दी गई।
डीएम ने बायो डीकंपोज़र तकनीक की उपयोगिता की सराहना करते हुए इसे किसानों के लिए लाभकारी बताया। उन्होंने अधिक से अधिक किसानों को इससे जोड़ने और जागरूकता बढ़ाने का निर्देश दिया। बायो डीकंपोज़र एक जैविक घोल है, जिसमें सूक्ष्मजीव मौजूद होते हैं। यह पराली, पत्तियां और फसल अवशेषों को तेजी से सड़ाकर जैविक खाद में बदल देता है। इससे पराली जलाने की समस्या में कमी आती है और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा मिलता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, 200 लीटर पानी में गुड़ और बायो डीकंपोज़र मिलाकर 5 से 7 दिनों में घोल तैयार किया जाता है, जिसे खेतों में छिड़काव करने पर 20 से 25 दिनों में अवशेष खाद में बदल जाते हैं। इस तकनीक से मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है, रासायनिक खाद पर निर्भरता घटती है तथा फसलों की गुणवत्ता में सुधार होता है। कृषि विभाग ने किसानों से इस तकनीक को अपनाने की अपील की है।
हिन्दुस्थान समाचार/धर्मेन्द्र सिंह
हिन्दुस्थान समाचार / धर्मेन्द्र सिंह

