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धान की खेती में 'एजोला' अपनाएं किसान, यूरिया की बचत के साथ सुधरेगी मिट्टी की सेहत और बढ़ेगी पैदावार

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धान की खेती में 'एजोला' अपनाएं किसान, यूरिया की बचत के साथ सुधरेगी मिट्टी की सेहत और बढ़ेगी पैदावार


कटिहार, 05 अगस्त (हि.स.)। धान की खेती में बढ़ती लागत और रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए जिला कृषि विभाग ने अनूठी पहल की है। जिला कृषि पदाधिकारी-सह-परियोजना निदेशक, आत्मा, कटिहार ने जिले के किसानों से अपील की है कि वे धान की फसल में 'एजोला' (Azolla) जैव उर्वरक का अधिकाधिक उपयोग करें। प्राकृतिक जैव उर्वरक और हरित खाद के रूप में एजोला का प्रयोग किसानों के लिए वरदान साबित हो रहा है, जिससे न केवल यूरिया की बचत होगी, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधरेगी और फसल उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

कृषि विभाग के अनुसार, एजोला धान की फसल को प्रति हेक्टेयर लगभग 25 से 30 किलोग्राम प्राकृतिक नाइट्रोजन उपलब्ध कराता है, जिससे रासायनिक नाइट्रोजन यानी यूरिया की आवश्यकता 20 से 25 प्रतिशत तक कम हो जाती है। इसके नियमित उपयोग से धान में अधिक कल्ले निकलते हैं, पौधों की बेहतर बढ़वार होती है और खेतों में गहरी हरियाली बनी रहती है। साथ ही, यह मिट्टी की जैविक उर्वराशक्ति और सूक्ष्मजीव गतिविधि को बढ़ाने के साथ-साथ खरपतवारों का प्राकृतिक नियंत्रण भी करता है।

वैज्ञानिक विधि के संबंध में जानकारी देते हुए बताया गया कि धान की रोपाई के 7 से 10 दिन बाद प्रति हेक्टेयर लगभग 300 से 500 किलोग्राम ताजा एजोला खेत में समान रूप से फैलाना चाहिए। इस दौरान खेत में 5 से 10 सेंटीमीटर तक पानी का स्तर बनाए रखना आवश्यक है ताकि एजोला तेजी से पूरे खेत में फैल सके। लगभग 15 से 20 दिनों में यह प्राकृतिक रूप से सड़कर फसल को नाइट्रोजन प्रदान करता है।

किसान एजोला का उपयोग करते समय कुछ खास सावधानियां बरतें। एजोला डालने के तुरंत पहले या बाद में खरपतवारनाशक का प्रयोग न करें। खेत में पानी का स्तर स्थिर रखें तथा तेज बहाव से बचाएं और केवल स्वस्थ एवं शुद्ध एजोला कल्चर का ही उपयोग करें।

जिला कृषि पदाधिकारी ने अंत में किसानों से आह्वान किया है कि वे इस सस्ती, टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल जैव तकनीक को अपनाकर अपनी खेती की लागत को घटाएं और उच्च गुणवत्ता वाली फसल प्राप्त कर बेहतर आय अर्जित करें।

हिन्दुस्थान समाचार / विनोद सिंह