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एमजीसीयू में कालिदास साहित्य की शाश्वतता पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी

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एमजीसीयू में कालिदास साहित्य की शाश्वतता पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी


-देश-विदेश के विद्वानों की रही गरिमामयी उपस्थिति

पूर्वी चंपारण,21 मार्च (हि.स.)।महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग द्वारा 20 एवं 21 मार्च 2026 को “भारत विद्या परंपरा एवं कालिदास साहित्य की शाश्वतता” विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ। संगोष्ठी में भारतीय ज्ञान परंपरा और महाकवि कालिदास के साहित्य की वैश्विक प्रासंगिकता पर गंभीर और बहुआयामी विमर्श किया गया।उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव ने की।

मुख्य अतिथि के रूप में पद्मश्री प्रो. अभिराज राजेंद्र मिश्र (पूर्व कुलपति, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय) उपस्थित रहे। विशिष्ट अतिथियों में प्रो. चंद्रभूषण झा (सेंट स्टीफंस कॉलेज), प्रो. अनिल प्रताप गिरी, प्रो. अयान भट्टाचार्य तथा कार्यक्रम संयोजक एवं संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. प्रसून दत्ता सिंह शामिल रहे। कार्यक्रम का प्रारंभ प्रो. प्रसून दत्ता सिंह के स्वागत भाषण से हुआ, जिसमें उन्होंने कालिदास के साहित्य में निहित सौंदर्य, संवेदना और प्रकृति-मानव संबंधों के अद्वितीय समन्वय को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि कालिदास की रचनाएं केवल सौंदर्यबोध तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे मानव को उसके अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों के प्रति भी सजग करती हैं। उनका साहित्य एक “कॉस्मिक समन्वय” प्रस्तुत करता है, जहां प्रकृति और संस्कृति एक-दूसरे में विलीन हो जाती हैं। मुख्य वक्ता पद्मश्री प्रो. अभिराज राजेंद्र मिश्र ने कालिदास के काल, उनके ऐतिहासिक संदर्भों और जन्मस्थान से जुड़ी विभिन्न मान्यताओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में कालिदास के जन्मस्थान को लेकर कश्मीर, मिथिला और नेपाल जैसी विभिन्न धारणाएं हैं, किंतु भारतीय ज्ञान परंपरा इन मतभेदों को विवाद नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समृद्धि के रूप में स्वीकार करती है। उनके शब्दों में, “महान कवि हर उस स्थान पर जन्म लेते हैं, जहां उन्हें प्रेम और सम्मान प्राप्त होता है।”

प्रो. चंद्रभूषण झा ने अपने वक्तव्य में जर्मनी में कालिदास साहित्य के अध्ययन और लोकप्रियता का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि यूरोपीय विद्वानों, विशेषकर जर्मन परंपरा में, कालिदास के काव्य को अत्यंत गंभीरता से पढ़ा और समझा गया है। उन्होंने कहा कि कालिदास के साहित्य में प्रकृति, शरीर और ब्रह्मांडीय व्यवस्था का गहन ज्ञान समाहित है, जो उनकी कृतियों को वैश्विक स्तर पर विशिष्ट बनाता है।

विद्वानों ने ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ के संदर्भ में कहा कि शकुंतला की विदाई का प्रसंग केवल लौकिक नहीं, बल्कि अलौकिक अनुभूति प्रदान करता है, जिसमें पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं के माध्यम से व्यक्त भावनाएं आत्मा को स्पर्श करती हैं। प्रो. अयान भट्टाचार्य ने काव्यशास्त्र की दृष्टि से कालिदास के साहित्य का विश्लेषण करते हुए कहा कि काव्य स्वयं में एक पूर्ण विद्या है। उन्होंने कहा कि कालिदास की रचनाएं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थों की सिद्धि में सहायक हैं और उनकी काव्यधारा समय की सीमाओं से परे जाकर आज भी समान रूप से प्रासंगिक बनी हुई है।

अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलपति प्रो. संजय श्रीवास्तव ने मेघदूतम् और अभिज्ञानशाकुंतलम् का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि इन कृतियों में प्रकृति और मानवीय भावनाओं विशेषकर विरह, आकांक्षा और प्रेम का जो सूक्ष्म चित्रण मिलता है, वह कालिदास को कालजयी बनाता है। उन्होंने कहा कि कालिदास की काव्य-शैली और अलंकारिकता ने साहित्यिक परंपराओं को गहराई से प्रभावित किया है तथा प्रकृति और मानव के संबंधों को अभिव्यक्त करने के नए आयाम स्थापित किए हैं। उन्होंने संगोष्ठी के सफल आयोजन के लिए समस्त आयोजन समिति को बधाई दी। संगोष्ठी के आयोजन में संयोजन समिति के डॉ. बबलू पाल और डॉ. बिस्वजीत बर्मन की विशेष रूप भूमिका रही।

धन्यवाद ज्ञापन प्रो. श्याम कुमार झा द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसमें उन्होंने सभी अतिथियों, विद्वानों, प्रतिभागियों और आयोजन से जुड़े सदस्यों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. उमेश पात्रा ने किया। इस अवसर पर देश-विदेश के अनेक प्रतिष्ठित विद्वान एवं शिक्षाविद उपस्थित रहे, जिनमें प्रो. सुनील महावर, प्रो. प्रणवीर सिंह, प्रो. अरतत्राण पाल, प्रो. विजय कुमार चौधरी, नेपाल से पधारे संस्कृत के विद्वान, प्रो. पंकज कुमार, डॉ. शिवेंद्र सिंह, प्रो. सपना सुगंधा, डॉ. गरिमा तिवारी, डॉ. गोविंद वर्मा, डॉ. पथलोथ ओंकार तथा डॉ. आशा मीणा सहित विभिन्न विभागों के शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं शामिल रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / आनंद कुमार