महर्षि मेंही परमहंस महाराज की जयंती पर निकाली गई भव्य शोभायात्रा
अररिया 30 अप्रैल(हि.स.)। संत सद्गुरु महर्षि मेंही परमहंस जी महाराज की 142 वीं जयंती के मौके पर गुरुवार को उनके अनुयायियों की ओर से भव्य शोभायात्रा निकाली गई।शोभायात्रा भागकोहलिया चौरा परवाहा स्थित संतमत मंदिर से निकाली गई,जो शहर का परिक्रमा कर पुनः संतमत मंदिर में आकर समाप्त हुई।शोभायात्रा में कई वाहनों पर गुरु महाराज की तस्वीर रखकर उसे फूलों से सजाया गया था,जिसके पीछे बैंड बाजे के साथ सैकड़ों श्रद्धालु महिलाएं और पुरुष हाथों में केसरिया झंडा लिए सद्गुरु महाराज की जयकारा लगाते हुए चल रहे थे। यह शोभायात्रा चौरा परवाहा आश्रम से शुरू होकर पंचमुखी मंदिर, हाई स्कूल रोड, धर्मशाला चौक, दीनदयाल चौक, गोडि़यारे चौक से होते हुए पुनः आश्रम पहुंची।
मौके पर आश्रम में प्रवचन का आयोजन किया गया,जिसमें कैलाश बाबा ने अपने प्रवचन में कहा कि भारत की संस्कृति ऋषियों और संतों की संस्कृति है।यहां अनेक संत, ऋषि अवतरित हुए हैं। संतों के इस अद्भुत कड़ी में हमारे गौरव पूज्यपाद महर्षि मेंहीं का जन्म बैशाख शुक्ल चतुर्दशी को 1885 ईस्वी में मधेपुरा जिलान्तर्गत खोकसी श्याम नामक गांव में ननिहाल में हुआ था। जन्म से ही इनके सिर में सात जटायें थीं। कंघी से रोज सुलझाने पर भी सातों जटायें प्रातः यथावत मिल जाती थीं। लोगों ने समझा कि अवश्य ही इस बालक के रूप में किसी दिव्य आत्मा का जन्म हुआ है। बचपन में इनका नाम रामानुग्रह लाल दास था।बाद में इनके दादा ने नाम बदल कर मेंहीं लाल रख दिया। बचपन से ही इनको साधु-संतो की संगति भाने लगी थी। इन्होंने श्री रामानंदजी महाराज से दीक्षा ली थी और ध्यान-भजन में तल्लीन रहते थे। इन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहकर ईश्वर भक्ति में अपना समस्त जीवन बिता देने का संकल्प कर लिया था। इसके बाद वे भागलपुर, कुप्पा घाट में वर्षों तक एक गुफा में कठिन तपस्या करके ब्रह्मज्ञान को प्राप्त किया। 8 जून 1986 ईस्वी को वे ब्रह्मलीन हो गए। आज देश-विदेश में गुरु महाराज के लाखों भक्त हैं, जो उनके बताए हुए मार्ग पर चल कर अपना जीवन सफल बना रहे हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / राहुल कुमार ठाकुर

