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मातृभाषा में शिक्षा एवं विकसित भारत विषय पर आभासी व्याख्यान का हुआ आयोजन

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पटना, 26 फ़रवरी (हि.स.)। मातृभाषा में शिक्षा एवं विकसित भारत विषय पर एक गरिमामयी आभासी व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य मातृभाषा-आधारित शिक्षा की आवश्यकता, प्रासंगिकता एवं विकसित भारत के निर्माण में उसकी केंद्रीय भूमिका पर गंभीर विमर्श करना था।

इस महत्वपूर्ण बौद्धिक संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में लंगट सिंह कॉलेज, मुजफ्फरपुर के प्रख्यात शिक्षाविद्, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली के राष्ट्रीय सह-संयोजक एवं भारतीय भाषा मंच के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. राजेश्वर कुमार ने ओजस्वी, तार्किक एवं व्यावहारिक विचार प्रस्तुत किए।

उक्त अवसर पर डॉ. कुमार ने मातृभूमि, मातृभाषा और राष्ट्र-निर्माण के अंतर्संबंध को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी भी राष्ट्र की स्थायी और समग्र उन्नति उसकी भाषायी आत्मनिर्भरता पर आधारित होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक भारत अपनी जमीनी वास्तविकताओं को अपनी मातृभाषाओं के माध्यम से नहीं समझेगा और शिक्षा, शोध, नीति-निर्माण, प्रशासन एवं बौद्धिक विमर्श में मातृभाषा को प्राथमिकता नहीं देगा, तब तक “विकसित भारत” की संकल्पना अधूरी रहेगी।

उन्होंने विकसित देशों का उदाहरण देते हुए कहा कि जिन राष्ट्रों ने आज वैश्विक स्तर पर प्रगति की है, उन्होंने अपने ज्ञान-विज्ञान, तकनीकी विकास और प्रशासनिक संरचना की नींव अपनी मातृभाषा में रखी। मातृभाषा में चिंतन, लेखन, संवाद और अनुसंधान के माध्यम से ही वे राष्ट्र नवाचार और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ सके। भारत को भी अपनी भाषायी अस्मिता को सुदृढ़ करते हुए ज्ञान-सृजन की प्रक्रिया को मातृभाषा-केंद्रित बनाना होगा।

डॉ. कुमार ने विशेष रूप से विद्यार्थियों के संदर्भ में कहा कि मातृभाषा में शिक्षा से विषय-वस्तु की गहरी, सहज एवं स्थायी समझ विकसित होती है। छात्र केवल तथ्यों को याद नहीं करते, बल्कि वे विश्लेषण, आलोचनात्मक चिंतन और सृजनात्मकता की क्षमता अर्जित करते हैं। इसके विपरीत, विदेशी भाषा में शिक्षा ग्रहण करना अनेक विद्यार्थियों के लिए मानसिक दबाव का कारण बनता है।

उन्होंने चिंता व्यक्त की कि अंग्रेज़ी को अनिवार्य माध्यम के रूप में स्थापित करने से कई विद्यार्थी हीनभावना, आत्मविश्वास की कमी एवं मानसिक तनाव का अनुभव करते हैं, जो उनके समग्र विकास में बाधक सिद्ध होता है।

उन्होंने यह भी प्रतिपादित किया कि मातृभाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा, संवेदना और राष्ट्रीय चेतना की आधारशिला है। मातृभाषा में शोध और योजना-निर्माण से समाज की वास्तविक समस्याओं का यथार्थ आकलन संभव होता है, जिससे नीतियाँ अधिक व्यावहारिक, समावेशी और प्रभावकारी बनती हैं।

अपने व्याख्यान में डॉ. कुमार ने यह स्पष्ट किया कि विकसित भारत का लक्ष्य केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक स्वाभिमान, बौद्धिक स्वतंत्रता और भाषायी आत्मगौरव से भी जुड़ा हुआ है। अतः विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में मातृभाषा-आधारित गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शोध एवं प्रकाशन को संस्थागत स्तर पर प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।

कार्यक्रम के समापन पर आयोजित प्रश्नोत्तरी सत्र में प्रतिभागियों ने मातृभाषा-आधारित शिक्षा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, शोध की भाषा तथा व्यावहारिक क्रियान्वयन से संबंधित विविध प्रश्न प्रस्तुत किए। डॉ. कुमार ने संतुलित एवं तथ्यपरक उत्तर देते हुए इस दिशा में समाज, शिक्षण संस्थानों और नीति-निर्माताओं के सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।

अंत में आयोजकों ने मुख्य वक्ता, प्रतिभागियों एवं सहयोगियों के प्रति आभार ज्ञापित करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के बौद्धिक विमर्श मातृभाषा के संवर्धन एवं राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया को नई दिशा प्रदान करेंगे।

कार्यक्रम में शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास उत्तर बिहार प्रांत के संयोजक गौरव पंवार, सह संयोजक डॉ. एस. एस. पाण्डेय, उत्तर बिहार प्रांत के प्रचार-प्रसार विभाग संयोजक प्रो. पी. के. झा प्रेम, पर्यावरण शिक्षा के सह संयोजक डॉ. सुमन झा, महिला कार्य संयोजक डॉ. कुमारी मनिषा, डॉ. राजू प्रसाद, डॉ. अनुपम सिंह डॉ. प्रियंका कुमारी, डॉ. दिनेश वल्लभ, डॉ. चंदा कुमारी, डॉ. अमरेंद्र कुमार, डॉ. रामजी पाण्डेय, डॉ. प्रवीण कुमार झा, डॉ. नीलेश कुमार झा, डॉ. नीलम कुमारी, डॉ. मनीषा कुमारी, डॉ. आशुतोष कुमार सहित सैकड़ों शिक्षाविद, शिक्षक और शोधार्थी शामिल थे।

कार्यक्रम का प्रारंभ डॉ. सूर्य भूषण दूबे के सरस्वती वंदना के गायन से हुआ। कार्यक्रम का संचालन डॉ सूर्यदेव राम तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ अर्चना उपाध्याय के द्वारा किया गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुरभित दत्त