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विक्रमशिला अभ्यारण्य में बढ़ी डॉल्फिनों की संख्या, प्रदूषण बना हुआ है बड़ा खतरा

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विक्रमशिला अभ्यारण्य में बढ़ी डॉल्फिनों की संख्या, प्रदूषण बना हुआ है बड़ा खतरा


भागलपुर, 24 जुलाई (हि.स.)। भारत के विलुप्तप्राय राष्ट्रीय जलीय जीव और गंगा की सेहत का पैमाना माने जाने वाले गांगेय डॉल्फिन (सोंस) के लिए बिहार के भागलपुर से एक राहत भरी खबर है। भागलपुर पर्यटन के अंतर्गत सुल्तानगंज से कहलगांव तक 60 किलोमीटर के दायरे में फैले 'विक्रमशिला गांगेय डॉल्फिन अभ्यारण्य' में डॉल्फिनों की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई है।

वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट और वन विभाग की हालिया गणना के अनुसार, अभ्यारण्य क्षेत्र में डॉल्फिन की संख्या 171 (वर्ष 2018) से बढ़कर अब 210 से अधिक हो गई है। सुरक्षित ब्रीडिंग और संरक्षण के बेहतर प्रयासों के कारण यह बढ़ोतरी संभव हुई है। डॉल्फिन के संरक्षण के लिए वन विभाग और केंद्र सरकार प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत कई नए और अत्याधुनिक उपाय कर रहे हैं। गंगा में चलने वाली नावों में विशेष 'बजर सेंसर' यंत्र लगाने का प्रस्ताव है। जैसे ही कोई नाव डॉल्फिन के करीब पहुंचेगी, यह नाविक को सचेत कर देगा ताकि नाव की दिशा बदली जा सके। डॉल्फिनों के लिए मौत का फंदा बनने वाले तीन हजार किलो से अधिक अवैध नायलॉन और करंट वाले जालों को जब्त किया गया है। वहीं

बिहार सरकार इस क्षेत्र में देश की पहली डॉल्फिन वेधशाला स्थापित कर रही है, जिससे उनके व्यवहार और जीवन चक्र पर बेहतर निगरानी रखी जा सके। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 के तहत डॉल्फिन के शिकार या उन्हें नुकसान पहुंचाने पर पूर्ण प्रतिबंध है। हालांकि डॉल्फिन की संख्या बढ़ी है, लेकिन गंगा नदी में बढ़ता प्रदूषण इस दृष्टिहीन जलीय जीव के लिए आज भी सबसे गंभीर चुनौती है। उल्लेखनीय है कि गांगेय डॉल्फिन प्राकृतिक रूप से अंधी होती हैं। वे रास्ता खोजने और शिकार करने के लिए आवाज की तरंगों का उपयोग करती हैं। गंगा में बढ़ते क्रूज, मोटर बोट और निर्माण कार्य के शोर के कारण उनका यह सिस्टम पूरी तरह गड़बड़ा जाता है। कृषि क्षेत्रों से बहकर आने वाले खतरनाक रासायनिक कीटनाशक (जैसे फ्यूरडॉन और डीडीटी) तथा शहरों का अनुपचारित सीवेज पानी को जहरीला बना रहा है, जिससे डॉल्फिन के प्रजनन अंगों और हार्मोनल सिस्टम पर बुरा असर पड़ता है।

प्रदूषण के कारण गंगा में छोटी मछलियों की संख्या घट रही है, जो डॉल्फिन का मुख्य भोजन हैं। प्लास्टिक कचरे और नायलॉन के जालों में फंसकर दम घुटने से भी कई बार डॉल्फिनों की दर्दनाक मौत की खबरें सामने आती हैं। सबसे बड़ी बात डॉल्फिन की संख्या बढ़ना पर्यावरण के लिए एक शुभ संकेत है, लेकिन 'नमामि गंगे' जैसी योजनाओं के तहत जब तक गंगा को पूरी तरह प्रदूषण मुक्त नहीं किया जाता, तब तक एशिया के इस एकमात्र डॉल्फिन अभ्यारण्य पर खतरा मंडराता रहेगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर