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सारण जिले के सिलहौरी में सावन माह में उमड़ती है श्रद्धालु की भीड़

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सारण जिले के सिलहौरी में सावन माह में उमड़ती है श्रद्धालु की भीड़


सारण जिले के सिलहौरी में सावन माह में उमड़ती है श्रद्धालु की भीड़


सारण जिले के सिलहौरी में सावन माह में उमड़ती है श्रद्धालु की भीड़


सारण जिले के सिलहौरी में सावन माह में उमड़ती है श्रद्धालु की भीड़


सारण जिले के सिलहौरी में सावन माह में उमड़ती है श्रद्धालु की भीड़


सारण, 10 अगस्त (हि.स.)। जिले के मढ़ौरा प्रखंड स्थित सिलहौरी गांव आस्था और पौराणिक धरोहरों का एक प्रमुख केंद्र है। यहाँ स्थापित बाबा शिलानाथ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि रामचरितमानस और शिव पुराण में वर्णित देवर्षि नारद के मोह भंग की अद्भुत घटना का ऐतिहासिक साक्ष्य माना जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल में इसी स्थान पर राजा शीलनिधि का महल था, जिन्होंने अपनी पुत्री का स्वयंवर आयोजित किया था। राजकुमारी के सौंदर्य पर मोहित होकर देवर्षि नारद ने भगवान विष्णु से सुंदर रूप मांगा।परंतु हरि का एक अर्थ वानर भी होता है, अतः सृष्टि कल्याण के लिए श्रीहरि ने नारद जी को वानर का मुख दे दिया। स्वयंवर में नारद जी का उपहास उड़ा और राजकुमारी ने भगवान विष्णु को वरमाला पहना दी।

जल में अपना मुख देखकर क्रोधित नारद जी ने भगवान विष्णु को शाप दे दिया। किंतु सत्य का बोध होने पर, पश्चाताप हेतु नारद जी ने इसी स्थान पर कठोर तपस्या की और शिवलिंग की स्थापना की। राजा शीलनिधि के नाम व पत्थरो की बहुलता के कारण यह स्थान शिलानाथ धाम और कालंतर में गाँव सिलहौरी के नाम से जाना गया।स्वयंवर से पूर्व नारद जी ने जिस जलकुंभ में अपना चेहरा देखा था, वह आज नारद पोखरा या नारद कुंड के नाम से प्रसिद्ध है।

मान्यता है कि इस कुंड में स्नान कर बाबा शीलनाथ का जलाभिषेक करने से मानसिक तनाव दूर होता है और अपार शांति मिलती है। तेरस, सावन और महाशिवरात्रि पर बिहार और उत्तर प्रदेश से श्रद्धालु यहाँ जलाभिषेक करने आते हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / धनंजय कुमार