रंगापारा के बरजुली को जैव विविधता विरासत स्थल का दर्जा
शोणीतपुर (असम), 08 जुलाई (हि.स.)।
असम के कृषि, जैव-विविधता संरक्षण और भविष्य की खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में शोणितपुर जिले ने एक गौरवपूर्ण उपलब्धि हासिल करते हुए रंगापाड़ा के बरजुली को 'जैव-विविधता विरासत स्थल' का दर्जा मिला है।
जिले के रंगापाड़ा स्थित बरजुली को जंगली धान की आनुवंशिक विविधता के संरक्षण के लिए भारत का 55वां 'जैव-विविधता विरासत स्थल' घोषित किया गया है।
जैव-विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 37 के अंतर्गत बरजुली के जंगली धान क्षेत्र के महत्व को देखते हुए, केंद्र सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय वर्षा-आधारित क्षेत्र प्राधिकरण तथा राष्ट्रीय जैव-विविधता प्राधिकरण ने सरकारी अधिसूचना के माध्यम से इसे विरासत स्थल का दर्जा प्रदान किया।
इस घोषणा से रंगापाड़ा के लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई है।
इस मान्यता के साथ बरजुली, असम का तीसरा जैव-विविधता विरासत स्थल बन गया है। बरजुली में एक दुर्लभ जंगली धान की प्रजाति की खोज ने इस स्थान को वैश्विक पहचान दिलाने का मार्ग प्रशस्त किया है। इससे भविष्य में बरजुली के एक प्रमुख पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित होने की भी उम्मीद जताई जा रही है।
रंगापाड़ा-मिसामारी मार्ग पर लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) की सड़क के समीप स्थित गाभरू पुल के पास लगभग चार कठा भूमि में ओराइज़ा कॉफिपोगोन (Oryza coarctata/Oryza cf. pogon) नामक दुर्लभ जंगली धान की प्रजाति की खोज नई दिल्ली के वैज्ञानिक सुधीर पाल अहालोहाल ने की थी। उन्होंने 3 दिसंबर, 2018 को अरुणाचल प्रदेश से मिसामारी स्थित भारतीय सेना की छावनी की ओर जाते समय इस स्थान पर ध्यान दिया और इस धान की पहचान की।
जब कृषि विभाग स्थानीय धान की पारंपरिक किस्मों के बीज संरक्षण और संवर्धन पर विशेष ध्यान दे रहा था, उसी दौरान बरजुली में इस दुर्लभ धान की खोज ने किसानों के बीच नई आशा जगाई। इसके बाद असम राज्य जैव-विविधता परिषद ने इस भूमि के संरक्षण तथा इसे जैव-विविधता विरासत स्थल के रूप में विकसित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए।
इस धान के पौधे लगभग चार फुट ऊंचे होते हैं और इनमें 6–7 इंच लंबे बालियां लगती हैं। प्रत्येक बाली में लगभग 50 से 150 बीज होते हैं, लेकिन इनमें केवल लगभग 20 प्रतिशत ही पूर्ण विकसित धान के दाने होते हैं, जबकि शेष 80 प्रतिशत खोखले रहते हैं। इस धान की प्रजाति को स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है।
इस ऐतिहासिक मान्यता के बाद जिला कृषि विभाग के एक प्रतिनिधिमंडल ने विरासत स्थल का निरीक्षण किया।
बरजुली को प्राप्त यह सम्मान केवल शोणितपुर जिले के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे असम के लिए गर्व का विषय है। यह राज्य की समृद्ध जैव-विविधता, कृषि विरासत तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि और नया मील का पत्थर माना जा रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / जयकिशोर झा

