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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर गुवाहाटी में प्रमुख नागरिक सम्मेलन आयोजित

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर गुवाहाटी में प्रमुख नागरिक सम्मेलन आयोजित


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर गुवाहाटी में प्रमुख नागरिक सम्मेलन आयोजित


गुवाहाटी, 13 सितंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), त्रिवेणी भाग, गुवाहाटी महानगर द्वारा संघ के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत रविवार को गुवाहाटी के बोरबारी स्सुथित दर्शनलय में एक प्रमुख नागरिक सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में लगभग 250 प्रमुख नागरिकों ने हिस्सा लिया।

कार्यक्रम की शुरुआत गणमान्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुई। इसके पश्चात कृष्ण गोस्वामी और उनकी टीम द्वारा बोरगीत तथा हेमांग कलिता द्वारा एक एकल देशभक्ति गीत प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम का संचालन अरुप बुजरबरुआ ने किया और उत्तर असम प्रांत के संघचालक डॉ. भूपेश चंद्र शर्मा ने मुख्य वक्ता के रूप में उद्बोधन दिया। मंच पर गुवाहाटी महानगर के सह संघचालक रुक्म प्रसाद भुइंया भी उपस्थित थे।

सभा को संबोधित करते हुए डॉ. शर्मा ने आरएसएस के 100 साल की यात्रा पर प्रकाश डाला। उन्होंने इसे चुनौतियों, सामाजिक परिवर्तनों और महत्वपूर्ण संगठनात्मक उपलब्धियों से भरा सफर बताया। उन्होंने देश के हर गांव तक पहुंचकर भारतीय संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति जागरूकता पैदा करने में संघ के प्रयासों और राष्ट्र निर्माण में उसकी भूमिका का उल्लेख किया।

मुख्य वक्ता ने आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन और उनके दृष्टिकोण को विस्तार से साझा किया। उन्होंने ब्रिटिश काल की परिस्थितियों का जिक्र करते हुए समाज में व्याप्त विखंडन को दूर करने और लोगों को एकजुट करने की आवश्यकता पर बल दिया, जिसके परिणामस्वरूप 1925 में आरएसएस की स्थापना हुई। इसके अलावा, उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर लगे प्रतिबंध और 1975 के आपातकाल जैसी कठिन परिस्थितियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने संघ के बुनियादी कार्यक्रम देश के हर गांव के लोगो तक पहुंचाकर उन्हें भारतीय संस्कृति,विरासत, परंपरा व सामाजिक दायित्व बारे में जागरूक होने की बात कही।

डॉ. शर्मा के संबोधन का एक प्रमुख केंद्र बिंदु 'कुटुंब प्रबोधन' रहा। उन्होंने माता-पिता और बच्चों के बीच संवाद की कमी, एकल व आत्म-केंद्रित जीवनशैली के बढ़ते प्रभाव और दादा-दादी के साथ बच्चों के घटते मेल-जोल पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि परिवार चरित्र-निर्माण की पहली पाठशाला है, जिसमें माताओं की भूमिका सबसे अहम होती है। उन्होंने बच्चों को रामायण और अन्य पारंपरिक ग्रंथों से जोड़ने का आह्वान किया, जो पारिवारिक रिश्तों, प्रेम, कर्तव्य और सामाजिक मूल्यों का पाठ पढ़ाते हैं।

वर्तमान सामाजिक चुनौतियों जैसे हिंसा, महिलाओं व बच्चों के खिलाफ अपराध, और नशीले पदार्थों के सेवन पर चिंता जताते हुए उन्होंने मजबूत पारिवारिक और सामाजिक बंधनों की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके अलावा, वनों की कटाई, प्लास्टिक प्रदूषण और कृत्रिम बाढ़ जैसे पर्यावरणीय मुद्दों पर बोलते हुए उन्होंने नागरिकों से प्लास्टिक का उपयोग कम करने, पौधरोपण बढ़ाने और पारंपरिक विकल्पों (जैसे केले के पत्ते, जूट या सूती थैले) को अपनाने की अपील की। उन्होंने संघ के 'पंच परिवर्तन' अभियानों का भी उल्लेख किया।

डॉ. शर्मा ने अभिव्यक्ति और धर्म की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों के साथ-साथ नागरिकों के अपने राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों व जिम्मेदारियों को भी याद दिलाया। अपने संबोधन के अंत में उन्होंने 'स्वदेशी' के महत्व पर जोर देते हुए नागरिकों से आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय जिम्मेदारी के रूप में स्वदेशी उत्पादों को अपनाने का आग्रह किया।

कार्यक्रम के अंत में एक प्रश्न उत्तर सत्र आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिभागियों द्वारा उठाए गए सवालों के डॉ. भूपेश चंद्र शर्मा ने विस्तृत उत्तर दिए। यह कार्यक्रम सामाजिक एकता, सांस्कृतिक जागरूकता, पर्यावरण संरक्षण और स्वदेशी अपनाने के संदेश के साथ संपन्न हुआ।

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हिन्दुस्थान समाचार / देबजानी पतिकर