मेघालय का 36वां सेंग खिहलांग 2026: स्वदेशी आस्था, सांस्कृतिक निरंतरता और सभ्यतागत एकता का भव्य संगम
वेस्ट जयंतिया हिल्स (मेघालय), 24 अप्रैल (हि.स.)। खासी–पनार (जयंतिया) समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण स्वदेशी आध्यात्मिक आयोजनों में से एक 36वां सेंग खिहलांग (टियन फाइरा / लुमफुंग) 17 से 19 अप्रैल 2026 तक वेस्ट जयंतिया हिल्स जिले के सीन रायज मुथलोंग में सफलतापूर्वक आयोजित हुआ। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आधिकारिक सूत्रों ने शुक्रवार को यह जानकारी दी। वर्ष 1981 में स्थापित यह आयोजन 30–40 लोगों के छोटे से समूह से बढ़कर आज लाखों श्रद्धालुओं की विशाल आध्यात्मिक सभा बन चुका है, जो सांस्कृतिक निरंतरता, पहचान और आध्यात्मिक दृढ़ता का प्रतीक है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के असम क्षेत्र प्रचार प्रमुख डॉ. सुनील मोहंती ने पूर्वोत्तर की स्वदेशी परंपराओं को भारत की व्यापक सभ्यतागत धारा के संदर्भ में विस्तार से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत की आत्मा को समझने के लिए पूर्वोत्तर की ओर देखना आवश्यक है, जहां परंपराएं आज भी अपने मौलिक और आध्यात्मिक स्वरूप में जीवित हैं।
मेघालय के ऐतिहासिक गौरव का उल्लेख करते हुए उन्होंने उर्मी रानी (600–630 ई.), कृषक पातर, हाटक और गुहक जैसे प्राचीन शासकों का स्मरण किया। उन्होंने जयंतियापुर के ऐतिहासिक महत्व पर भी प्रकाश डाला, जो 1835 में ब्रिटिश अधिग्रहण तक जयंतिया साम्राज्य की राजधानी रहा। साथ ही प्रभात राय सिएम (1500–1516), लक्ष्मी सिन्हा (1670–1701), जिन्होंने 1680 में जयंत राजबाड़ी का निर्माण कराया तथा अंतिम शासक राजेंद्र सिंह सिएम (1832–1835) का भी उल्लेख किया।
औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष को स्मरण करते हुए उन्होंने यू तिरोत सिंग, यू कियांग नांगबह और पा टोगन संगमा के बलिदानों को नमन् किया, जिन्होंने स्वाधीनता और पहचान की रक्षा के लिए अपना जीवन समर्पित किया।
डॉ. मोहंती ने स्वदेशी विरासत की समृद्धि पर प्रकाश डालते हुए मेनहिर और डोलमेन जैसी मेगालिथिक परंपराओं को प्राचीन सभ्यता का स्थायी प्रतीक बताया। उन्होंने नार्टियांग दुर्गा मंदिर और वर्तमान बांग्लादेश स्थित जयंतिया शक्तिपीठ के आध्यात्मिक महत्व का भी उल्लेख किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने मेघालय में लगभग 3000 वर्ष पुरानी लौह-गलन परंपरा का उल्लेख करते हुए इसे उन्नत स्वदेशी ज्ञान प्रणाली का प्रमाण बताया।
विविध परंपराओं के भीतर निहित दार्शनिक एकता पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर भारत की विभिन्न जनजातीय आस्थाएं—न्यीशी, अपातानी, गालो, मिसिंग और कछारी—पंच भूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) के प्रति श्रद्धा जैसे समान आधार साझा करती हैं। उन्होंने ऋग्वेद के वाक्य “एकोऽहम् बहुस्याम” का उल्लेख करते हुए कहा कि विविधता एक ही सत्य के अनेक रूपों में प्रकट होने का संकेत है और भारतीय दृष्टिकोण में यह एकता का ही विस्तार है।
उन्होंने स्वदेशी आस्थाओं को विश्व की आधुनिक सभ्यताओं और संगठित धर्मों की मूल आधारशिला बताते हुए कहा कि जिस प्रकार गंगा का अस्तित्व गंगोत्री से जुड़ा है, उसी प्रकार आधुनिक सभ्यताएं भी स्वदेशी परंपराओं पर आधारित हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक अध्ययन परिषद (आईसीसीएस) का भी उल्लेख किया, जो विश्व की 40 से अधिक स्वदेशी परंपराओं—माओरी, एबोरिजिनल, एजटेक और जुलु—को एक मंच पर लाकर “सभी एक हैं” के भाव को सुदृढ़ करता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के संदर्भ में उन्होंने “पंच परिवर्तन” की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें परिवार मूल्यों का संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता, स्वत्व का संवर्धन और नागरिक कर्तव्यों का पालन शामिल है। उन्होंने नियम खासी के मूल सिद्धांतों—“टिप ब्रिव टिप ब्लेई”, “टिप कुर टिप खा” और “कमाई या का होक”—का उल्लेख करते हुए कहा कि सच्ची आध्यात्मिकता आचरण, करुणा और निःस्वार्थ सेवा में परिलक्षित होती है।
तीन दिवसीय कार्यक्रम के दौरान पहले दिन प्रतिनिधियों का आगमन और पारंपरिक मावबिन्ना (मोनोलिथ) शोभायात्रा, दूसरे दिन स्थापना, जागरूकता सत्र और प्रार्थनाएं तथा तीसरे दिन भव्य समापन समारोह आयोजित किया गया। 30 से अधिक सीन राइज और सेंग खासी इकाइयों ने पारंपरिक गीत और नृत्य प्रस्तुत कर समुदाय की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित किया।
इस आयोजन में मेघालय के उपमुख्यमंत्री स्नियावभलांग धर, मंत्री वाइलाडमिकी शायला, मंत्री सानबोर शुल्लाई, विधायक मैथ्यू बियॉन्डस्टार कुर्बाह, जेएचएडीसी के उप मुख्य कार्यकारी सदस्य लास्की रिम्बाई, सदस्य सूकी लापासम और रिकुट पारिएन सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया। साथ ही शांगपुंग, रालियांग, जोवाई और नांगबह इलाकों के पारंपरिक डोल्लोई तथा विभिन्न विभागों के अधिकारी भी उपस्थित रहे।
36वां सेंग खिहलांग एक सशक्त संदेश के साथ संपन्न हुआ, जिसमें एकता, सांस्कृतिक गौरव और यह पुनः स्थापित किया गया कि स्वदेशी परंपराओं का संरक्षण एक समरस, आध्यात्मिक और समावेशी समाज के निर्माण के लिए अत्यंत आवश्यक है।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीप्रकाश

