गौहाटी विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग की पहल पर पांचवां होमेन बोरगोहाईं स्मारक व्याख्यान आयोजित
गुवाहाटी, 29 अक्टूबर (हि.स.)। गौहाटी विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग की पहल पर गुरुवार को पांचवें होमेन बोरगोहाईं स्मारक व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में प्रख्यात शिक्षाविद् प्रोफेसर अवनी कुमार भगवती ने 'द ब्रह्मपुत्र वैली, असम: एनवायरनमेंट, सोसाइटी एंड कल्चर' विषय पर मुख्य भाषण दिया। अपने व्याख्यान में उन्होंने ब्रह्मपुत्र घाटी के प्राकृतिक पर्यावरण, समाज-जीवन और सांस्कृतिक विविधता के विभिन्न पहलुओं के साथ-साथ इस क्षेत्र की अनूठी विशेषताओं पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम की शुरुआत में गौहाटी विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर लालन किशोर सिंह ने होमेन बोरगोहाईं के जीवन, कर्म और साहित्य-पत्रकारिता में उनके अनूठे योगदान के बारे में अपने विचार रखे।
गौहाटी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर नानी गोपाल महंत ने मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित होकर कार्यक्रम का उद्घाटन किया। होमेन बोरगोहाईं के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों की यादों को ताजा करते हुए कुलपति महंत ने उल्लेख किया कि, “होमेन बोरगोहाईं ने मुझे सहित कई लोगों को अखबारों में लेख लिखने के लिए प्रोत्साहित करते हुए पत्र लिखे थे। एक आदर्श शिक्षक, अच्छे पत्रकार और गद्य लेखक के रूप में खुद को स्थापित करने की उनकी गहरी इच्छा थी। असमिया गद्य साहित्य के उत्कर्ष को साधने और उसकी परंपरा को बनाए रखने के प्रति भी वे पूरी तरह से प्रतिबद्ध थे। समकालीन असमिया साहित्य में गद्य के स्तर में लगातार आ रही गिरावट को लेकर भी उन्होंने गहरी चिंता व्यक्त की थी।
इसी कार्यक्रम में प्रख्यात पत्रकार, लेखक एवं नगालैंड विश्वविद्यालय के आचार्य डॉ. समुद्र गुप्त कश्यप ने सम्मानित अतिथि के रूप में हिस्सा लिया। इस दौरान उन्हें पांचवें होमेन बोरगोहाईं स्मारक पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
डॉ. समुद्र गुप्त कश्यप ने होमेन बोरगोहाईं की पत्रकारिता में ईमानदारी, निष्ठा और नैतिकता के महत्व पर बात की। सूचना और विचारों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखने के मामले में बोरगोहाईं के दृढ़ रुख का उल्लेख करते हुए उन्होंने वर्तमान समय में पत्रकारिता के गिरते स्तर और मीडिया के प्रति आम जनता के घटते विश्वास पर चिंता व्यक्त की। मीडिया को समाज का प्रहरी बताते हुए उन्होंने कहा कि पत्रकारिता को समाज की वास्तविक तस्वीर निष्पक्षता और जवाबदेही के साथ जनता के सामने रखनी चाहिए।
मुख्य व्याख्यान में प्रोफेसर अवनी कुमार भगवती ने ब्रह्मपुत्र घाटी के भूगोल, पारिस्थितिकी तंत्र और सांस्कृतिक विरासत के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण प्रस्तुत किया। अपने जीवन के अनुभवों का जिक्र करते हुए उन्होंने अंग्रेजी सीखने के शुरुआती दिनों में आने वाली चुनौतियों और असमिया क्षेत्रीय भाषा की विशेषताओं के साथ अंग्रेजी का समन्वय करते हुए खुद को अभिव्यक्त करने के अनुभव का वर्णन किया।
प्रोफेसर भगवती ने होमेन बोरगोहाईं के साहित्य में ब्रह्मपुत्र और इसके परिवेशीय प्राकृतिक पर्यावरण के प्रतिबिंब पर चर्चा की। ब्रह्मपुत्र में एक समय प्रचुर मात्रा में उपलब्ध मछलियों और गंगा डॉल्फिन की संख्या में आई कमी को लेकर उन्होंने गहरी चिंता व्यक्त की। गौहाटी विश्वविद्यालय परिसर की प्राकृतिक और पारिस्थितिकीय विविधता का भी उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया। उनके अनुसार, विश्वविद्यालय का परिसर ब्रह्मपुत्र घाटी की एक छोटी सी झांकी की तरह है, जहां विभिन्न प्रकार के पक्षियों और अन्य जीव-जंतुओं की उपस्थिति इस क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता का परिचय देती है।
इसके साथ ही, मनुष्य और प्रकृति के बीच के संबंध तथा संघर्ष के प्रसंग में प्रोफेसर भगवती ने माजुली द्वीप का उदाहरण दिया। उन्होंने उल्लेख किया कि इन क्षेत्रों के निवासियों को प्राकृतिक चुनौतियों से लगातार जूझकर जीवनयापन करना पड़ता है।
असम में हाल ही में आई बाढ़ का संदर्भ देते हुए प्रोफेसर भगवती ने स्थानीय नदियों की प्रकृति और नदी-केंद्रित पारिस्थितिकी तंत्र पर अधिक ध्यान देने का आह्वान किया। अपने व्याख्यान के माध्यम से उन्होंने आशावादी दृष्टिकोण के साथ यह भी कहा कि बार-बार आने वाली बाढ़, नदी का कटाव, हाथियों की मौत और जैव विविधता का लगातार क्षरण जैसी समस्याएं ब्रह्मपुत्र घाटी के भविष्य को लेकर गंभीर चिंतन का विषय हैं।
कार्यक्रम के अंत में होमेन बोरगोहाईं के पुत्र प्रोफेसर प्रदीप्त बोरगोहाईं ने अपने माता-पिता के अंग्रेजी शिक्षा के अनुभव और अपने पिता के गहरे अध्ययन तथा पढ़ने की आदत के बारे में बताया। वर्तमान समाज में किताबें पढ़ने की आदत के धीरे-धीरे कम होने पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने साहित्य चर्चा, अध्ययन और बौद्धिक परंपरा को जीवित रखने की आवश्यकता पर बल दिया। साहित्यिक और बौद्धिक विरासत की मूल्यवान संपदाओं को समय की धारा में खोने से बचाने के लिए उन्हें संरक्षित कर अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के आह्वान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
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हिन्दुस्थान समाचार / देबजानी पतिकर

