प्राचीन पुस्तकों के संरक्षण और अध्ययन के लिए नई पीढ़ी को प्रेरित करने वाले धनजीत तालुकदार को 'असम गौरव' सम्मान
गुवाहाटी, 24 अक्टूबर (हि.स.)। असम की प्राचीन संस्कृति, परंपरा और ज्ञान-परंपरा के संरक्षण की दिशा में लंबे समय से काम कर रहे गुवाहाटी विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के संरक्षण विभाग के सहायक संरक्षक धनजीत तालुकदार को 'असम गौरव' सम्मान से सम्मानित करने के लिए राज्य सरकार ने चयनित किया है। यह पुरस्कार नई दिल्ली में 29 नवंबर को आयोजित होने वाले समारोह में प्रदान किया जाएगा।
एक पांडुलिपि शोधकर्ता और प्रशिक्षक के रूप में, सांची के पत्तों की पांडुलिपियों से लेकर ब्रिटिश शासनकाल के दौरान कागज पर लिखी गई विभिन्न प्राचीन पांडुलिपियों जैसे अमूल्य धरोहरों का संरक्षण करना और इस ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना तालुकदार का मुख्य उद्देश्य रहा है।
प्राचीन पांडुलिपियों में इतिहास, संस्कृति, परंपरा और कई महत्वपूर्ण जानकारियों का खजाना छिपा हुआ है। लेकिन आज की पीढ़ी के कई लोग इन पुस्तकों को पढ़ और समझ नहीं पाते हैं। इन पुस्तकों में इस्तेमाल किए गए कई शब्दों के अनेक अर्थ होने के कारण उनके वास्तविक महत्व को समझने के लिए विशेष अध्ययन और अभ्यास की आवश्यकता होती है। इस बात को समझते हुए, गौहाटी विश्वविद्यालय के पुस्तकालयाध्यक्ष (लाइब्रेरियन) धनजीत तालुकदार ने युवा पीढ़ी को प्राचीन पांडुलिपियों को पढ़ने और उनका अध्ययन करने के लिए प्रेरित करने की पहल की है।
इस कार्य के अलावा उन्होंने पांडुलिपियों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (नेशनल मैन्यूस्क्रिप्ट मिशन) की शुरुआत के समय से ही वे इस महायज्ञ से जुड़ गए थे। उन्होंने विभिन्न सत्रों और गांवों में जाकर लोगों के घरों में संरक्षित प्राचीन पांडुलिपियों की पहचान करने और उनके उचित संरक्षण की व्यवस्था करने के कार्य में हिस्सा लिया। उनके प्रयासों से पचास से अधिक सत्रों में पांडुलिपियों के संरक्षण का कार्य किया गया। उन्होंने निश्चित नियमों के अनुसार पुस्तकों की सफाई, धूल हटाना, उन्हें उपयुक्त वातावरण में रखना और अन्य संरक्षण संबंधी कदम उठाए।
हालांकि, विभिन्न सत्रों में काम करने के दौरान उन्होंने महसूस किया कि कई जगहों पर लोग प्राचीन पांडुलिपियों को पढ़ना नहीं जानते हैं। परिणामस्वरूप, पांडुलिपियों के प्रति उनकी रुचि भी कम है। यद्यपि कुछ सत्रों में पांडुलिपि अध्ययन की परंपरा आज भी बनी हुई है, लेकिन अधिकांश मामलों में यह अभ्यास सीमित हो गया है। इसलिए, उनका मानना है कि केवल पांडुलिपियों का संरक्षण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें पढ़ना, समझना और उनमें निहित ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना भी आवश्यक है।
इसी सोच के साथ प्राचीन पांडुलिपियों को पढ़ने और सिखाने की यात्रा शुरू हुई। उन्हें पहली बार तेजपुर विश्वविद्यालय में इस विषय पर व्याख्यान देने का अवसर मिला। इसके बाद विभिन्न संस्थानों और संगठनों से आमंत्रण आने लगे। धीरे-धीरे उनकी यह पहल और अधिक व्यापक हो गई। उन्होंने विभिन्न महाविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों का दौरा कर छात्र-छात्राओं को प्राचीन पांडुलिपियां पढ़ना और समझना सिखाने का प्रयास जारी रखा।
उनके अनुसार, प्राचीन पांडुलिपियों में न केवल ऐतिहासिक जानकारी है, बल्कि कई आकर्षक कहानियां और मूल्यवान ज्ञान संपदा भी शामिल है। इन पांडुलिपियों के अध्ययन के माध्यम से नई पीढ़ी के बीच असम के नामघरों, सत्रों तथा राज्य की परंपरा और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ाना संभव है।
वे लगभग पंद्रह वर्षों से पांडुलिपि अध्ययन और अध्यापन से जुड़े हुए हैं। उनके प्रयासों के कारण आज कई छात्र-छात्राएं प्राचीन पांडुलिपियों को पढ़ने और शोध करने के प्रति रुचि दिखा रहे हैं। युवा पीढ़ी में इस रुचि के पैदा होने को वे अपने काम की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक मानते हैं।
हाल ही में असम सरकार ने उन्हें 'असम गौरव' सम्मान से सम्मानित करने के लिए चयनित किया है। शनिवार को हिन्दुस्थान समाचार के साथ बातचीत करते हुए कहा कि यह मान्यता उनके लंबे समय के काम के सफर में नई प्रेरणा देगी। उनके शब्दों में, सरकारी मान्यता उन्हें और अधिक उत्साह के साथ पांडुलिपियों के संरक्षण और अध्ययन के कार्य में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगी।
उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष भी कई प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण का कार्य पूरा किया गया है। वर्तमान में वे सुरक्षित रूप से संरक्षित हैं। उनको विश्वास है कि प्राचीन पांडुलिपियों के प्रति आम लोगों में जागरूकता और रुचि बढ़ने से असमिया जाति की परंपरा, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रहेगी। केवल पुस्तकें एकत्र करके रखना ही काफी नहीं है, बल्कि उनका अध्ययन किया जाना चाहिए और उनमें निहित ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना चाहिए। तभी इस अमूल्य विरासत का वास्तविक संरक्षण सार्थक होगा।
एक पांडुलिपि शोधकर्ता और प्रशिक्षक के रूप में, सांची के पत्तों की पांडुलिपियों से लेकर ब्रिटिश शासनकाल के दौरान कागज पर लिखी गई विभिन्न प्राचीन पांडुलिपियों जैसे अमूल्य धरोहरों का संरक्षण करना और इस ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाना उनका मुख्य उद्देश्य रहा है। इन पुस्तकों में इस्तेमाल किए गए कई शब्दों के अनेक अर्थ होने के कारण उनके वास्तविक महत्व को समझने के लिए विशेष अध्ययन और अभ्यास की आवश्यकता होती है। इस बात को समझते हुए, गौहाटी विश्वविद्यालय के पुस्तकालयाध्यक्ष (लाइब्रेरियन) धनजीत तालुकदार ने युवा पीढ़ी को प्राचीन पांडुलिपियों को पढ़ने और उनका अध्ययन करने के लिए प्रेरित करने की पहल की है।
इस कार्य के अलावा उन्होंने पांडुलिपियों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (नेशनल मैन्यूस्क्रिप्ट मिशन) की शुरुआत के समय से ही वे इस महायज्ञ से जुड़ गए थे। उन्होंने विभिन्न सत्रों और गांवों में जाकर लोगों के घरों में संरक्षित प्राचीन पांडुलिपियों की पहचान करने और उनके उचित संरक्षण की व्यवस्था करने के कार्य में हिस्सा लिया। उनके प्रयासों से पचास से अधिक सत्रों में पांडुलिपियों के संरक्षण का कार्य किया गया। उन्होंने निश्चित नियमों के अनुसार पुस्तकों की सफाई, धूल हटाना, उन्हें उपयुक्त वातावरण में रखना और अन्य संरक्षण संबंधी कदम उठाए।
हालांकि, विभिन्न सत्रों में काम करने के दौरान उन्होंने महसूस किया कि कई जगहों पर लोग प्राचीन पांडुलिपियों को पढ़ना नहीं जानते हैं। परिणामस्वरूप, पांडुलिपियों के प्रति उनकी रुचि भी कम है। यद्यपि कुछ सत्रों में पांडुलिपि अध्ययन की परंपरा आज भी बनी हुई है, लेकिन अधिकांश मामलों में यह अभ्यास सीमित हो गया है। इसलिए, उनका मानना है कि केवल पांडुलिपियों का संरक्षण करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें पढ़ना, समझना और उनमें निहित ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुँचाना भी आवश्यक है।
वे लगभग पंद्रह वर्षों से पांडुलिपि अध्ययन और अध्यापन से जुड़े हुए हैं। उनके प्रयासों के कारण आज कई छात्र-छात्राएं प्राचीन पांडुलिपियों को पढ़ने और शोध करने के प्रति रुचि दिखा रहे हैं। युवा पीढ़ी में इस रुचि के पैदा होने को वे अपने काम की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक मानते हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / देबजानी पतिकर

