home page

प्राकृतिक खेती को ग्रामीण समृद्धि और आत्मनिर्भरता का माध्यम बनाएं : राज्यपाल

 | 
प्राकृतिक खेती को ग्रामीण समृद्धि और आत्मनिर्भरता का माध्यम बनाएं : राज्यपाल


- पूर्वोत्तर प्राकृतिक एवं टिकाऊ खेती का मॉडल बनने की क्षमता रखता है

गुवाहाटी, 09 सितंबर (हि.स.)। असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने बुधवार को किसानों, वैज्ञानिकों, कृषि संस्थानों, उद्यमियों, नीति-निर्माताओं और सरकारों से समन्वित एवं सामूहिक प्रयास कर प्राकृतिक खेती को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने तथा इसे व्यापक जनआंदोलन में बदलने का आह्वान किया।

मेघालय के उमियाम स्थित कृषि विज्ञान के स्नातकोत्तर अध्ययन महाविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए राज्यपाल ने कहा कि प्राकृतिक खेती को केवल कृषि पद्धति तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसे ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने, रोजगार बढ़ाने और आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करने वाले टिकाऊ एवं आर्थिक रूप से लाभकारी कृषि मॉडल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

आचार्य ने कहा कि प्राकृतिक खेती भारत की पारंपरिक कृषि व्यवस्था और सभ्यतागत ज्ञान से गहराई से जुड़ी है। उन्होंने मिट्टी के स्वास्थ्य, जल संसाधनों और जैव विविधता के संरक्षण के साथ दीर्घकालिक कृषि उत्पादकता सुनिश्चित करने पर जोर दिया। उन्होंने पारंपरिक कृषि ज्ञान को आधुनिक विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार से जोड़ने की आवश्यकता बताई।

पूर्वोत्तर की कृषि क्षमता का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि समृद्ध जैव विविधता, प्राकृतिक संसाधनों और विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों के कारण यह क्षेत्र प्राकृतिक और टिकाऊ खेती का मॉडल बनने की क्षमता रखता है। उन्होंने असम के जोहा चावल, बोका चावल, काजी नेमू और कार्बी आंगलोंग अदरक सहित पूर्वोत्तर के विभिन्न विशिष्ट भौगोलिक संकेतक प्राप्त कृषि उत्पादों का उल्लेख किया।

उन्होंने पारंपरिक एवं प्राकृतिक उत्पादों को स्थानीय स्तर से वैश्विक बाजार तक पहुंचाने का आह्वान किया। इसके लिए उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन, पैकेजिंग, प्रमाणन, ब्रांडिंग तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच की एकीकृत व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इससे किसानों को बेहतर आय, ग्रामीण रोजगार और कृषि समुदायों को आर्थिक आत्मनिर्भरता मिल सकेगी।

राज्यपाल ने कृषि अनुसंधान और किसानों के बीच की दूरी कम करने पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी नवाचार किसानों तक व्यावहारिक एवं सरल तरीके से पहुंचने चाहिए, जबकि किसानों का अनुभव और पारंपरिक ज्ञान भी कृषि अनुसंधान को समृद्ध करना चाहिए।

युवाओं को कृषि से जोड़ने के लिए उन्होंने कृषि तकनीक, डिजिटल कृषि, ड्रोन, स्मार्ट सिंचाई, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ई-कॉमर्स और कृषि आधारित उद्यमों को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि तकनीक, उद्यमिता और कृषि का समन्वय ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार तथा नए उद्यम के अवसर पैदा कर सकता है।

‘विकसित भारत’ के लक्ष्य का उल्लेख करते हुए आचार्य ने कहा कि सशक्त किसान, समृद्ध ग्रामीण समुदाय और संरक्षित प्राकृतिक संसाधन विकसित एवं आत्मनिर्भर भारत की बुनियाद हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सम्मेलन में होने वाला विचार-विमर्श विशेषकर पूर्वोत्तर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती, ग्रामीण समृद्धि और टिकाऊ कृषि विकास के लिए व्यावहारिक मार्ग तैयार करने में सहायक होगा।

सम्मेलन का आयोजन केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, इम्फाल द्वारा किया गया। इसमें नीति आयोग के सदस्य डॉ. जोराम अनिया, केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अनुपम मिश्र, असम कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. दीपज्योति राजखोवा, वरिष्ठ वैज्ञानिकों, कृषि विशेषज्ञों और अन्य गणमान्य लोगों ने भाग लिया।

-----------

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीप्रकाश