गौहाटी विश्वविद्यालय में प्राचीन सांचिपात पांडुलिपि अध्ययन विषयक कार्यशाला आयोजित
असम, 07 मई (हि.स.)। असम की ज्ञान-संस्कृति और विरासत के महत्वपूर्ण प्रतीक सांचिपात पांडुलिपियों के संरक्षण तथा विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करने के उद्देश्य से गौहाटी विश्वविद्यालय के सहयोग से तथा कुमार भास्कर वर्मा संस्कृत और प्राचीन अध्ययन विश्वविद्यालय की पहल पर बुधवार को कृष्णकांत हैंडिक पुस्तकालय में ‘प्राचीन सांचिपात पांडुलिपि अध्ययन’ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई।
कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए गौहाटी विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रोफेसर उत्पल शर्मा ने सांचिपात पांडुलिपियों को असम की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्मृति का जीवंत दस्तावेज बताते हुए कहा कि, “सांचिपात केवल पुरानी पांडुलिपियां नहीं हैं, बल्कि यह हमारी सभ्यता, ज्ञान-परंपरा और संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं। इनके संरक्षण और अध्ययन के माध्यम से हम अपनी जड़ों से जुड़ सकते हैं तथा आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी विरासत के महत्व से परिचित करा सकते हैं। डिजिटल माध्यमों के जरिए इन अमूल्य साँचिपातों को भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है।”
कार्यशाला में उपस्थित कृष्णकांत हैंडिक पुस्तकालय के पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. प्रशांत कुमार डेका ने कहा कि, “सांचिपात पांडुलिपियाँ हमारे समाज की ज्ञान-परंपरा का अमूल्य भंडार हैं। इनके संरक्षण में नई पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। इस प्रकार की कार्यशालाएं विद्यार्थियों में सांस्कृतिक चेतना विकसित करने के साथ-साथ शोध के नए द्वार भी खोलती हैं।”
इस कार्यशाला में पचास से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया। पांडुलिपि विभाग के सह-संरक्षक धनजीत तालुकदार संसाधन व्यक्ति के रूप में उपस्थित रहे और उन्होंने सांचिपात पांडुलिपियों के इतिहास, संरक्षण की पद्धतियों तथा शोध संबंधी विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कार्यशाला में कुमार भास्कर वर्मा संस्कृत और प्राचीन अध्ययन विश्वविद्यालय के अध्यापकों, गौहाटी विश्वविद्यालय के शिक्षकों तथा छात्र-छात्राओं ने इस कार्यशाला में भाग लिया।
हिन्दुस्थान समाचार / देबजानी पतिकर

