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असम में यूसीसी लागू होने की राह साफ, सामाजिक और कानूनी व्यवस्था में बड़े बदलाव की संभावना

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असम में यूसीसी लागू होने की राह साफ, सामाजिक और कानूनी व्यवस्था में बड़े बदलाव की संभावना


गुवाहाटी, 30 मई, (हि.स.)। असम विधानसभा द्वारा समान नागरिक संहिता (यूसीसी) असम विधेयक-2026 पारित किए जाने के बाद राज्य में इसके लागू होने को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। संवैधानिक स्वीकृति मिलने के बाद यह कानून राज्य की नागरिक व्यवस्था, पारिवारिक कानूनों और प्रशासनिक ढांचे में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है।

प्रस्तावित कानून को असम में पिछले कई दशकों के सबसे महत्वपूर्ण नागरिक कानून सुधारों में से एक माना जा रहा है। सरकार और इसके समर्थकों का कहना है कि यूसीसी से लैंगिक न्याय को बढ़ावा मिलेगा, कानूनी पारदर्शिता बढ़ेगी और विवाह, तलाक तथा पारिवारिक मामलों के लिए एक समान नागरिक ढांचा स्थापित होगा।

विधेयक का सबसे बड़ा प्रभाव महिलाओं के अधिकारों और कानूनी सुरक्षा पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। सरकार का तर्क है कि एकपत्नी प्रथा लागू होने तथा विवाह और तलाक के अनिवार्य पंजीकरण से वैवाहिक विवाद, परित्याग, उत्तराधिकार और भरण-पोषण जैसे मामलों में महिलाओं को अधिक कानूनी सुरक्षा मिलेगी। इसके अलावा आधिकारिक दस्तावेजीकरण से अपंजीकृत विवाहों और उनसे जुड़े शोषण की घटनाओं में कमी आने की उम्मीद है।

विधेयक में लिव-इन संबंधों के अनिवार्य पंजीकरण का भी प्रावधान किया गया है। समर्थकों का कहना है कि इससे ऐसे संबंधों में रहने वाली महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित होगी। हालांकि आलोचकों ने इसे निजता के अधिकार और व्यक्तिगत संबंधों में सरकारी हस्तक्षेप से जोड़ते हुए चिंता व्यक्त की है।

कानून लागू होने के बाद राज्य सरकार को विवाह, तलाक और लिव-इन संबंधों के पंजीकरण के लिए जिला और ग्रामीण स्तर पर विशेष पंजीकरण प्रणाली विकसित करनी होगी। इसके साथ ही डिजिटल डेटाबेस, सत्यापन तंत्र और शिकायत निवारण व्यवस्था स्थापित करने की आवश्यकता पड़ेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे प्रशासनिक कार्यप्रणाली में व्यापक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

यूसीसी विधेयक समान नागरिक कानून और सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर नई कानूनी और संवैधानिक बहस को जन्म दे सकता है। हालांकि राज्य सरकार ने अनुसूचित जनजातियों और आदिवासी समुदायों को कानून के दायरे से बाहर रखा है, फिर भी पारंपरिक कानूनों और छूट की सीमा को लेकर चर्चा जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असम का यह कदम देशभर में समान नागरिक संहिता को लेकर चल रही बहस को नई दिशा दे सकता है। आगामी चुनावों के मद्देनजर यह मुद्दा राजनीतिक और वैचारिक विमर्श का केंद्र बन सकता है। समर्थक इसे कानून के समक्ष समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बता रहे हैं, जबकि विरोधी इसे व्यक्तिगत और सामुदायिक परंपराओं में हस्तक्षेप के रूप में देख रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआती चरण में वकीलों, पारिवारिक अदालतों, पंजीकरण कार्यालयों और स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं पर कार्यभार बढ़ सकता है। हालांकि दीर्घकाल में नागरिक अभिलेखों के डिजिटलीकरण से प्रशासनिक दक्षता बढ़ने और पारिवारिक विवादों में कानूनी अस्पष्टता कम होने की संभावना है।

मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्व सरमा ने कहा है कि यह कानून सामाजिक न्याय, पारदर्शिता और समान अधिकार सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य के स्वदेशी और जनजातीय समुदायों को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण यथावत बनाए रखा जाएगा।

फिलहाल यह विधेयक राज्यपाल और राष्ट्रपति की स्वीकृति की प्रतीक्षा में है। मंजूरी मिलने के बाद राज्य सरकार इसके क्रियान्वयन के लिए विस्तृत नियमावली और प्रक्रियाओं को अधिसूचित कर सकती है।------------------

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीप्रकाश