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पूसीरे और आईआईटी, रुड़की के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर

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पूसीरे और आईआईटी, रुड़की के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर


गुवाहाटी, 30 अक्टूबर (हि.स.)। पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (पूसीरे) ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), रूड़की के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किया। इसका उद्देश्य रेलवे के स्टील पुलों में दरारों का पता लगाने की हाइब्रिड पद्धति विकसित करना और उसकी बची हुई आयु का आकलन करना है। इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक निरीक्षण तकनीकों, नॉन-डिस्ट्रक्टिव इवैल्यूएशन (एनडीई), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), मटेरियल टेस्टिंग और एडवांस्ड स्ट्रक्चरल एनालिसिस का उपयोग करपुराने हो रहे स्टील पुलों के वैज्ञानिक मूल्यांकन को मजबूत करना है।

पूसीरे के सीपीआरओ कपिंजल किशोर शर्मा ने शुक्रवार काे बताया कि एमओयू बीते 27 अक्टूबर को हुआ। यह पहल भारतीय रेल के पुराने हो रहे स्टील पुलों की संरचना को देखते हुए काफी महत्वपूर्ण है। इसमें पूसीरे के वे पुल भी शामिल हैं, जो 50 वर्षों से अधिक समय से उपयोग में हैं। ट्रेनों की बढ़ती गति, भारी बोझ और निरंतर आवाजाही के कारण फटीग एनालिसिस की जरूरत है। इसके तहत, आईआईटी रुड़की पुल के सभी वेल्डेड ज्वाइंट्स, होल्स और अन्य संवेदनशील हिस्सों का विस्तार से अध्ययन करेगा। हालांकि, रेलवे के तय मानकों के अनुसार नियमित जांच की जाती है, लेकिन सामान्य तौर पर देखकर की जाने वाली जांच या पारंपरिक परीक्षण तरीकों से अक्सर काफी बारीक या छिपी हुई दरारें पकड़ में नहीं आतीं। इस परियोजना का उद्देश्य विजुअल निरीक्षण, आधुनिक परीक्षण और एआई-आधारित तकनीक के संयोजन के माध्यम से मौजूदा निरीक्षण प्रक्रियाओं को और अधिक मजबूत बनाना है।

इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य दो प्रमुख क्षेत्रों - दरारों का पता लगाने की क्षमता में सुधार करना और स्टील पुलों के शेष सेवा काल का आकलन करनेपर ध्यान केंद्रित करना है। निरीक्षण के दौरान ली गई उच्च-रिज़ॉल्यूशन छवियों का विश्लेषण परियोजना टीम द्वारा विकसित एआई-आधारित उपकरण इन्फ्राडॉकटी का उपयोग करके किया जाएगा, जिससे दरारों और क्षति के अन्य संकेतों की प्रारंभिक अवस्था में ही पहचान करने में मदद मिलेगी। इन निष्कर्षों को उपयुक्त नॉन-डेस्ट्रक्टिव इवेल्यूएशन (एनडीई) तकनीकों के साथ संयोजित किया जाएगा, जो संरचना को नुकसान पहुंचाए बिना त्रुटियों की पहचान करने में सहायक होती हैं। परियोजना में कंप्यूटर-आधारित मॉडलिंग और प्रयोगशाला परीक्षणों का उपयोग करके स्टील ट्रस और गर्डर पुलों के कमजोर हिस्सों की पहचान की जाएगी और यह समझा जाएगा कि विभिन्न प्रकार के स्टील और वेल्डेड ज्वाइंट्स बार-बार भार पड़ने पर कैसे प्रतिक्रिया करते हैं। ड्रोन पर लगे 4के कैमरों से ली गई तस्वीरों सहित उच्च-रिज़ॉल्यूशन छवियों का भी उपयोग किया जाएगा। इन निरीक्षणों और उपकरणों से एकत्रित जानकारी कंप्यूटर-आधारित मॉडलों को सत्यापित करने और चयनित पुलों के शेष फटीक लाइफ का आकलन करने में सहायक होगी।

प्रयोगशाला परीक्षणों में स्टील की मजबूती और टिकाऊ संबंधी व्यवहार की जांच की जाएगी, जिसमें उसका मूल पदार्थ, वेल्डेड ज्वाइंट्स और वेल्डिंग से प्रभावित हिस्से शामिल होंगे। यह अध्ययन इस बात का आकलन करेगा कि जंग, तापमान में बदलाव, नमी और बार-बार पड़ने वाला भार जैसी चीजें किस तरह कमियों के बनने और बढ़ने पर असर डालती हैं। इन नतीजों का उपयोग एक ऐसे वैज्ञानिक मॉडल बनाने के लिए किया जाएगा, जिससे बार-बार पड़ने वाले भार के तहत पुल के हिस्सों की सर्विस लाइफ का अनुमान लगाया जा सके।इससे यह बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलेगी कि पुराने और कमजोर हो रहे स्टील की संरचनाओंनिरंतर उपयोग किए जाने पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।

इस परियोजना का उद्देश्य एक ऐसा रियल-टाइम सिस्टम विकसित करना है जो उपयोग के कारण होने वाले नुकसान का आकलन कर सके और अलर्ट के जरिए निर्णय लेने में मदद दे सके। निरीक्षण के नतीजों, प्रयोगशाला के निष्कर्षों और पुल से जुटाए गए डेटा को एक साथ मिलाकर, यह प्रणाली धीरे-धीरे बढ़ते नुकसान का आकलन करने में मदद करेगा और समय रहते रखरखाव से जुड़े फैसले लेने के लिए अलर्ट देगा। इससे रेल अधिकारियों को संवेदनशील इलाकों की पहचान करने, निरीक्षणों को प्राथमिकता देने और रखरखाव की योजना को अधिक प्रभावी ढंग से बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

आईआईटी रुड़की के साथ इस सहयोग के जरिए, पूसीरे का लक्ष्य शोध, एआई-आधारित तकनीक और वैज्ञानिक मूल्यांकन के माध्यम से पुलों के निरीक्षण और रखरखाव को मजबूत करना है। उम्मीद है कि यह पहल मौजूदा निरीक्षण प्रक्रियाओं को और बेहतर बनाएगी, कमियों का जल्द पता लगाने में मदद करेगी, और स्टील के पुलों की स्थिति तथा उनके बचे हुए जीवनकाल का सटीक आकलन करने में सहायक होगी। इससे रेलवे के बुनियादी ढांचे की दीर्घकालिक विश्वसनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द राय