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बीटीसी समझौते की भावना और ज़मीनी हकीकत के बीच बढ़ता विवाद

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बीटीसी समझौते की भावना और ज़मीनी हकीकत के बीच बढ़ता विवाद


-भूमि पंजीकरण प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल, 2003 से पहले के निवासियों को भी हो रही परेशानी

कोकराझार (असम), 10 मई (हि.स.)। बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद (बीटीसी) समझौते की मूल भावना क्षेत्र में वर्षों से रह रहे सभी वैध निवासियों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। 10 फरवरी, 2003 तक बोडोलैंड क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों को स्थायी निवासी मानने का प्रावधान के उद्देश्य के तहत किया गया था। लेकिन वर्तमान समय में भूमि पंजीकरण प्रक्रिया को लेकर जिस प्रकार के आरोप सामने आ रहे हैं, उसने प्रशासनिक व्यवस्था और समझौते के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आम जनता और अखिल हिंदीभाषी विकास परिषद फकीराग्राम आंचलिक इकाई ने आज बताया है कि भूमि पंजीकरण के दौरान बीटीसी समझौते की वास्तविक भावना का पालन नहीं किया जा रहा है। नियमों के अनुसार वर्ष 2003 अथवा उससे पहले की मतदाता सूची में नाम होना क्षेत्रीय निवास का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाना चाहिए, क्योंकि बीटीसी प्रमुख हग्रमा मोहिलारी हमेशा यह कहते हैं कि 10 फरवरी, 2003 तक जो भी बीटीसी में रह रहे थे वे सभी बीटीसी के निवासी हैं लेकिन कई मामलों में लोगों को अतिरिक्त दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए कहा जा रहा है। इससे आम नागरिकों को लगातार प्रशासनिक जटिलताओं और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ शहरी इलाकों से भी ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं, जहां परिवार दशकों से बोडोलैंड क्षेत्र में रह रहे हैं। उनके पास पुराने वोटर लिस्ट, राजस्व रसीद, भूमि संबंधी दस्तावेज और अन्य प्रमाण मौजूद हैं, फिर भी भूमि पंजीकरण की प्रक्रिया सरल नहीं हो पा रही है। लोगों का आरोप है कि बार-बार नए प्रमाण मांगे जाने से प्रक्रिया लंबी और जटिल बनती जा रही है।

सामाजिक संगठनों और क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यदि 2003 से पहले के दस्तावेजों को पर्याप्त आधार नहीं माना जाता, तो यह बीटीसी समझौते की मूल भावना के विपरीत है। उनका कहना है कि समझौते का उद्देश्य क्षेत्र के सभी वैध निवासियों को समान अधिकार और सुरक्षा प्रदान करना था, न कि उन्हें अनावश्यक प्रशासनिक कठिनाइयों में उलझाना।

इस मुद्दे को लेकर अब राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी बहस तेज हो गई है। विभिन्न संगठनों ने सरकार और प्रशासन से मांग की है कि भूमि पंजीकरण को लेकर स्पष्ट, पारदर्शी और एक समान नीति लागू की जाए ताकि वास्तविक निवासियों को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि भूमि केवल संपत्ति का विषय नहीं है, बल्कि यह लोगों की पहचान, अस्तित्व और भविष्य से जुड़ा मामला है। ऐसे में प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह बीटीसी समझौते की भावना का सम्मान करते हुए भूमि पंजीकरण प्रक्रिया को न्यायसंगत, पारदर्शी और सरल बनाए, ताकि लोगों का भरोसा व्यवस्था पर कायम रह सके। अब देखना है कि बीटीसी प्रशासन इस मामले में कौन सा कदम उठाता है।

हिन्दुस्थान समाचार / किशोर मिश्रा