home page

पूसीरे ने पुराने अमीनगांव हेरिटेज स्टेशन पर पारंपरिक खेल केंद्र का किया उद्घाटन

 | 
पूसीरे ने पुराने अमीनगांव हेरिटेज स्टेशन पर पारंपरिक खेल केंद्र का किया उद्घाटन


गुवाहाटी, 28 अक्टूबर (हि.स.)। पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (पूसीरे) के महाप्रबंधक चेतन कुमार श्रीवास्तव ने पुराने अमीनगांव रेलवे स्टेशन विरासत स्थल पर एक पारंपरिक खेल केंद्र का उद्घाटन किया। पूसीरे स्पोर्ट्स एसोसिएशन (एनएफआरएसए) के सौजन्य से विकसित यह अपनी तरह की पहली सुविधा है, जो एक ऐतिहासिक रेलवे प्लेटफॉर्म को पारंपरिक खेलों के लिए एक समर्पित केंद्र में बदल देती है। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'विकास' और 'विरासत' को साथ लेकर चलने के विजन को दर्शाता है।

पूसीरे के सीपीआरओ कपिंजल किशोर शर्मा ने बुधवार काे बताया कि खेल केंद्र का उद्घाटन पूसीरे के महाप्रबंधक ने 27 अक्टूबर की देर शाम को किया। केंद्र सरकार असम और पूर्वोत्तर के पारंपरिक खेलों जैसे धोपखेल, तांग-गुटी, पेंग खेल, कोरी-खेल, रोशी-ताना, मणिपुर के मुकना और युबी लाकपी तथा मिजोरम का इनसुकनावम शामिल हैं। इस क्षेत्र के विभिन्न समुदायों से जुड़े ये खेल शारीरिक फुर्ती, आपसी जुड़ाव और जीवन-रक्षा कौशल का प्रतीक हैं। हालांकि, आधुनिकीकरण, डिजिटलीकरण और मुख्यधारा के व्यावसायिक खेलों के बढ़ते दबदबे के कारण, इन खेलों में भाग लेने वालों की संख्या कम होती जा रही है।

एनएफआरएसए की योजना इस केंद्र में पारंपरिक खेल गतिविधियां आयोजित करने और पारंपरिक खेलों को संरक्षित करने के लिए काम कर रहे संगठनों के साथ समन्वय स्थापित करने की है। इस केंद्र का उद्देश्य इन खेलों के पुनरुद्धार के लिए एक समर्पित स्थान उपलब्ध कराना और राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं और आयोजनों को संभव बनाना है।

इस अवसर पर अपने विचार रखते हुए, महाप्रबंधक ने बच्चों और खिलाड़ियों द्वारा स्टेशन के सक्रिय उपयोग के माध्यम से इसे संरक्षित करने की एनएफआरएसए के पहल की सराहना की। उन्होंने विश्वास जताया कि यह केंद्र भावी पीढ़ियों के लिए इस स्थान को संरक्षित रखेगा, पारंपरिक खेलों को पुनर्जीवित करेगा और राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों को तैयार करने में मदद करेगा।

1908 में स्थापित, पुराना अमीनगांव रेलवे स्टेशन, स्वतंत्रता पूर्व भारत में गुवाहाटी और पूर्वोत्तर के लिए एक मुख्य प्रवेश द्वार था। लगभग आधा किलोमीटर लंबा और 25 मीटर चौड़ा इसका एकमात्र प्लेटफॉर्म, तत्कालीन समय में असम-बंगाल रेलवे के एक प्रमुख आर्थिक और माल-परिवहन केंद्र के रूप में कार्य करता था। ऐतिहासिक असम मेल के जरिए चाय बागान मालिक, मिशनरी, व्यापारी, स्वतंत्रता सेनानी और यात्री यहां आते थे, जो आगे ब्रह्मपुत्र नदी को फेरी से पार करते थे।

इस स्टेशन का स्वतंत्रता आंदोलन से गहरा नाता रहा है। महात्मा गांधी, जिन्हें प्यार से 'बापू' कहा जाता है, वर्ष 1921, 1926, 1934 और 1946 में असम यात्रा के दौरान यहां से गुज़रे थे। 1921 के असहयोग आंदोलन के समय अपनी यात्रा के दौरान, उनके साथ देशभक्त तरुण राम फूकन भी थे, जिन्होंने गांधीजी के भाषणों का अनुवाद किया था, जिससे हज़ारों लोग प्रेरित हुए। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, ब्रिटिश और अमेरिकी सैनिक भी इसी स्टेशन से होकर गुज़रे थे।

ईस्टर्न बंगाल रेलवे की अमीनगांव-पांडु ट्रेन फेरी उत्तरी और दक्षिणी किनारों को जोड़ती थी। इसमें विशेष बार्जेस का उपयोग होता था, जिन पर पूरी की पूरी ट्रेनें और माल लादा जाता था। इसके ज़रिए हर दिन दोनों दिशाओं में 250 वैगनों तक का आवागमन होता था। यह नेटवर्क कौनिया-धरला रूट से होते हुए तत्कालीन पूर्वी बंगाल के लालमोनिरहाट तक फैला हुआ था। 7 जून, 1963 को इस स्टेशन पर आखिरी ट्रेन पहुंची और 8 जून, 1963 से सरायघाट पुल पर रेल यातायात शुरू हो गया। इसके साथ ही, फेरी से जुड़े रेलवे के उस युग का अंत हो गया।

इस ऐतिहासिक जगह पर पारंपरिक खेलों को लाकर, एनएफआर पूर्वोत्तर की रेल विरासत और यहां की स्थानीय खेल परंपराओं दोनों को संरक्षित करने का प्रयास कर रहा है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द राय