हिमालय की आपदा और नेपाल-भारत के लिए चेतावनी
डाॅ. अरविंद नाथ तिवारी
नेपाल-तिब्बत सीमा के पास आई विनाशकारी बाढ़ ने एक बार फिर पूरे हिमालयी क्षेत्र को झकझोर दिया है। रसुवा क्षेत्र में ल्हेन्डे खोला, भोटेकोशी और त्रिशूली नदी तंत्र में अचानक आया पानी और मलबे का सैलाब अपने साथ घर, वाहन, सड़कें, पुल और इंसानी जिंदगियां बहा ले गया। 27 अगस्त 2026 तक उपलब्ध रिपोर्टों में नेपाल में 157 मौतों और चीन के तिब्बत क्षेत्र में तीन मौतों की जानकारी सामने आई है, जबकि 750 से अधिक लोग लापता बताए जा रहे हैं। लापता लोगों में 133 भारतीय नागरिक भी शामिल हैं।
इस त्रासदी की भयावहता इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह केवल नेपाल की समस्या नहीं है। हिमालय से निकलने वाली नदियां सीमाओं को नहीं पहचानतीं। नेपाल में आई आपदा का सीधा असर भारत, विशेषकर बिहार और उत्तर प्रदेश के नदी क्षेत्रों पर पड़ सकता है। इसलिए यह समय केवल राहत और बचाव का नहीं, बल्कि भविष्य की आपदाओं के लिए स्थायी रणनीति बनाने का है।
2025 की त्रासदी से क्या सीखा?
एक तथ्य को स्पष्ट करना जरूरी है। पिछली बड़ी रसुवा-भोटेकोशी आपदा 8 जुलाई 2025 को हुई थी। नेपाल सरकार की आपदा रिपोर्ट के अनुसार उस समय तिब्बत में एक सुप्राग्लेशियल झील के अचानक खाली होने से ल्हेन्डे नदी में फ्लैश फ्लड आया था। कम से कम नौ लोगों की मौत हुई और 19 लोग लापता हुए थे
यानी लगभग एक वर्ष के भीतर उसी व्यापक सीमा क्षेत्र में दो बड़ी घटनाएं सामने आ चुकी हैं। साल 2025 में भी नेपाल के अधिकारी और विशेषज्ञों ने सीमा पार ग्लेशियल झीलों के खतरे की ओर संकेत किया था।
लेकिन सवाल है कि क्या उस चेतावनी को पर्याप्त गंभीरता से लिया गया?
नेपाल के अपने आपदा रिकॉर्ड बताते हैं कि बाढ़ कोई नई चुनौती नहीं है। 1978 में तिनाऊ बेसिन, 1980 में कोसी, 1985 में तादी, 1987 में सुनकोशी और 1993 में मध्य नेपाल में भीषण बाढ़ ने तबाही मचाई थी। 1993 की आपदा में लगभग 1,336 लोगों की जान गई थी।
इसलिए लाव 2026 की त्रासदी को महज एक आकस्मिक प्राकृतिक घटना मानकर आगे बढ़ जाना सबसे बड़ी भूल होगी।
असली खतरा क्या है?
इस बार शुरुआत में भूकंप को बाढ़ का कारण माना गया लेकिन अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के विश्लेषण के अनुसार दर्ज हुआ भूकंपीय संकेत स्वयं एक बड़े बर्फ-पत्थर के भूस्खलन से पैदा हुआ था, यानी पहाड़ का विशाल हिस्सा खिसका, उसने नदी तंत्र को प्रभावित किया और फिर पानी, बर्फ, पत्थर तथा मलबे की विनाशकारी दीवार नीचे की ओर चली गई।
यही हिमालय की नई चुनौती है- भूकंप, ग्लेशियर, भूस्खलन और बाढ़ अब अलग-अलग खतरे नहीं रह गए हैं; वे एक-दूसरे को जन्म देने वाली आपदाओं की श्रृंखला बन सकते हैं।
साल 2025 में भी तिब्बत से निकलने वाली ग्लेशियल झील के अचानक फटने से भोटेकोशी में बाढ़ आई थी। वैज्ञानिक अध्ययनों ने चीन-नेपाल सीमा क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों के बढ़ते खतरे को पहले ही रेखांकित किया है। एक अध्ययन में 28 अत्यधिक संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई और अनुमान लगाया गया कि चरम स्थिति में हजारों इमारतें, दर्जनों पुल, जलविद्युत परियोजनाएं और सड़कें प्रभावित हो सकती हैं।
क्या चीन को पहले से पता था?
यही सबसे कठिन और संवेदनशील प्रश्न है।
यह कहना कि चीन को इस आपदा की पहले से पूरी जानकारी थी और उसने जानबूझकर नेपाल को तबाह होने दिया- बिना ठोस प्रमाण के एक गंभीर आरोप होगा। अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध प्रमाण इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
जब किसी नदी का उद्गम या उसका ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र एक देश में और आबादी वाला निचला हिस्सा दूसरे देश में हो, तब उपग्रह निगरानी, ग्लेशियल झीलों की स्थिति, जलस्तर और भूस्खलन की सूचना साझा करना केवल सद्भावना का विषय नहीं बल्कि मानवीय जिम्मेदारी का विषय होना चाहिए।
वैज्ञानिक शोध भी चीन-नेपाल सीमा के ग्लेशियल बेसिनों में क्रॉस-बॉर्डर अर्ली वार्निंग सिस्टम और संयुक्त आपदा प्रबंधन की जरूरत पर जोर देता है। इसलिए चीन से नेपाल को स्पष्ट जवाब मांगना चाहिए- क्या ऊपरी क्षेत्र में किसी असामान्य ग्लेशियल गतिविधि, झील के आकार में बदलाव, भूस्खलन या नदी अवरोध की जानकारी उपलब्ध थी? यदि थी, तो नेपाल को कब और किस माध्यम से चेतावनी दी गई? यह सवाल राजनीतिक आरोप की बजाय वैज्ञानिक पारदर्शिता और अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही के रूप में पूछा जाना चाहिए।
नेपाल को अब क्या करना चाहिए?
पहला कदम होना चाहिए- राष्ट्रीय ग्लेशियल डिजास्टर मॉनिटरिंग सिस्टम।
नेपाल को चीन और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थानों के साथ मिलकर सीमा क्षेत्र की प्रत्येक संवेदनशील ग्लेशियल झील की नियमित उपग्रह निगरानी करनी चाहिए। जहां खतरा अधिक हो, वहां सेंसर, कैमरा, जलस्तर मापक और सायरन आधारित चेतावनी तंत्र लगाया जाना चाहिए।
दूसरा, नदियों के किनारे बेतरतीब निर्माण रोकना होगा। जलविद्युत परियोजना, पुल, सड़क, होटल और बस्तियों के निर्माण में केवल आर्थिक लाभ नहीं बल्कि आपदा जोखिम मानचित्र को आधार बनाना होगा।
तीसरा, स्थानीय लोगों को केवल आपदा आने के बाद राहत देने की नीति से बाहर निकलना होगा। हर संवेदनशील गांव में नियमित मॉक ड्रिल, सुरक्षित ऊंचे स्थान, निकासी मार्ग और सामुदायिक आपदा दल होने चाहिए।
चौथा, नेपाल-चीन के बीच रियल-टाइम डेटा शेयरिंग समझौता होना चाहिए। किसी ग्लेशियल झील में असामान्य परिवर्तन दिखे तो उसकी सूचना कुछ घंटों में नहीं, कुछ मिनटों में नीचे के क्षेत्रों तक पहुंचे।
भारत को क्या तैयारी करनी चाहिए?
भारत के लिए यह खतरा और गंभीर है। नेपाल से निकलने वाली नदियां बिहार में प्रवेश करती हैं। इसलिए भारत को नेपाल में होने वाली प्रत्येक बड़ी हिमालयी घटना को संभावित सीमा-पार आपदा मानना चाहिए।
भारत को नेपाल के साथ मिलकर रियल-टाइम फ्लड अर्ली वार्निंग नेटवर्क बनाना चाहिए। बिहार के सीमावर्ती जिलों में सायरन, मोबाइल अलर्ट, पंचायत-स्तरीय चेतावनी केंद्र और नदी जलस्तर निगरानी प्रणाली को मजबूत करना चाहिए।
भारतीय मौसम विभाग, केंद्रीय जल आयोग, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और बिहार आपदा प्रबंधन विभाग को नेपाल से मिलने वाले आंकड़ों को एकीकृत करना चाहिए। विशेष रूप से गंडक और कोसी जैसी नदियों के लिए ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में होने वाली असामान्य घटनाओं की सूचना तत्काल निचले इलाकों तक पहुंचनी चाहिए।
भारत को अपने स्तर पर भी उपग्रहों और रिमोट सेंसिंग के माध्यम से हिमालयी क्षेत्र की निगरानी बढ़ानी होगी। साथ ही सेना, वायुसेना, एनडीआरएफ और एसडीआरएफ को हेलीकॉप्टर आधारित त्वरित बचाव की संयुक्त योजना तैयार रखनी चाहिए।
अहम सवाल
आज सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि यह आपदा प्राकृतिक थी या मानवीय चूक का परिणाम।
सबसे बड़ा सवाल है कि क्या अगली आपदा आने से पहले हम तैयार होंगे?
नेपाल को 1978 से लेकर 1993, 2008, 2017, 2025 और 2026 तक की आपदाओं को अलग-अलग घटनाओं के रूप में नहीं बल्कि एक लंबी चेतावनी श्रृंखला के रूप में देखना होगा। हिमालय तेजी से बदल रहा है और जलवायु परिवर्तन ग्लेशियरों तथा हिमनद झीलों के जोखिम को बढ़ा रहा है।
चीन को भी समझना होगा कि तिब्बत की नदियां केवल चीन की भौगोलिक संपत्ति नहीं हैं; उनका पानी नेपाल और भारत की करोड़ों आबादी के जीवन से जुड़ा है। पारदर्शी सूचना-साझाकरण किसी देश पर एहसान नहीं बल्कि सीमा पार मानवीय सुरक्षा की अनिवार्यता है।
और भारत को भी यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि नेपाल में आने वाली बाढ़ नेपाल की सीमा पर रुक जायेगी।
हिमालय की नदियां राजनीति से बड़ी हैं। उनका पानी सीमा नहीं देखता, इसलिए आपदा प्रबंधन भी सीमा में बंधा नहीं रह सकता।
अब समय है कि नेपाल, चीन और भारत आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर एक साझा हिमालयी आपदा चेतावनी तंत्र बनाएं। क्योंकि अगली बार चेतावनी के लिए हमारे पास शायद कुछ मिनट भी न हों।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द नाथ तिवारी

