हर बोतल के पीछे छिपी है एक परिवार की त्रासदी
-पीयूष कुमार कश्यप
भारत एक ऐसा देश है जहाँ प्रधानमंत्री की एक अपील करोड़ों लोगों के व्यवहार को बदलने की ताकत रखती है। जब देश के प्रधानमंत्री ने पेट्रोल और डीजल की खपत कम करने की बात कही, तब लोगों ने इसे केवल एक सरकारी बयान नहीं माना, बल्कि राष्ट्रहित से जुड़ा संदेश समझा। लोगों ने अनावश्यक यात्रा कम करने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने और ईंधन बचाने की चर्चा शुरू कर दी। क्योंकि लोगों को लगा कि पेट्रोल बचाना देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए जरूरी है। लेकिन इसी देश में एक प्रश्न लगातार खड़ा रहता है और व्यवस्था से जवाब मांगता है कि यदि सरकार पेट्रोल कम खर्च करने की अपील कर सकती है तो शराब न पीने या शराब छोड़ने की राष्ट्रीय अपील क्यों नहीं कर सकती? आखिर शराब भी तो केवल व्यक्ति का निजी मामला नहीं है। शराब भी समाज, परिवार, स्वास्थ्य व्यवस्था और अर्थव्यवस्था पर उतना ही गहरा असर डालती है, जितना कोई आर्थिक संकट डाल सकता है।
सच तो यह है कि शराब केवल एक बोतल में बंद नशा नहीं है, बल्कि यह धीरे-धीरे लाखों परिवारों के जीवन को निगल जाने वाली सामाजिक त्रासदी बन चुकी है। पेट्रोल महंगा होता है तो जेब पर असर पड़ता है, लेकिन शराब घर में प्रवेश करती है तो पूरा परिवार टूटने लगता है। शराब केवल शरीर को नहीं जलाती, यह रिश्तों को भी राख कर देती है। देश के गाँवों से लेकर महानगरों तक हजारों महिलाएँ ऐसी हैं जो हर रात शराबी पति की गालियाँ सुनती हैं, मारपीट सहती हैं, अपमान झेलती हैं और फिर भी सुबह अपने बच्चों के लिए जीने को मजबूर होती हैं। कितनी महिलाएँ ऐसी हैं जिनके पति शराब की लत में अपनी पूरी कमाई ठेके पर छोड़ आते हैं और घर में बच्चों के लिए दूध तक नहीं बचता। कितनी लड़कियाँ ऐसी हैं जिनकी पढ़ाई इसलिए छूट जाती है क्योंकि पिता की कमाई शराब में खत्म हो जाती है। कितने बच्चे ऐसे हैं जो अपने पिता को पिता नहीं बल्कि डर के रूप में देखते हैं। लेकिन इन आँसुओं का कोई सरकारी डेटा नहीं होता।
सरकारें शराब से मिलने वाले राजस्व का हिसाब तो हर साल बड़े गर्व से पेश करती हैं, लेकिन शराब से बर्बाद हुए परिवारों का हिसाब कोई नहीं रखता। राज्य सरकारों की आय का बड़ा हिस्सा शराब बिक्री से आता है, इसलिए शराब को अक्सर आर्थिक मजबूरी की तरह प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन क्या कोई सरकार यह बता सकती है कि शराब से जो राजस्व आता है, उससे कहीं ज्यादा पैसा अस्पतालों, अपराध नियंत्रण, सड़क दुर्घटनाओं और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर खर्च नहीं होता? क्या सरकार यह बता सकती है कि शराब की वजह से टूटे परिवारों की आर्थिक कीमत कितनी है? क्या कोई विभाग यह बता सकता है कि शराब के कारण कितनी महिलाओं ने आत्महत्या की, कितने बच्चे मानसिक तनाव के शिकार हुए और कितने लोग समय से पहले मौत के मुँह में चले गए? शायद नहीं। क्योंकि व्यवस्था ने कभी इन सवालों को गंभीरता से पूछने की कोशिश ही नहीं की।
उत्तर प्रदेश में सूचना के अधिकार के तहत जो तथ्य सामने आए, वे केवल चौंकाने वाले नहीं बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करने वाले हैं। मद्य निषेध विभाग, जिसका उद्देश्य शराब के दुष्प्रभावों को रोकना और जनजागरूकता फैलाना है, उसके पास यह आंकड़ा ही नहीं है कि शराब के कारण प्रदेश में कितनी मौतें हुईं या कितने लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हुए। सोचिए, एक विभाग करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है, रैलियाँ निकाल रहा है, होर्डिंग्स लगवा रहा है, दीवारों पर नारे लिखवा रहा है, लेकिन उसे यह तक नहीं पता कि समस्या कितनी बड़ी है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर बिना जांच किए इलाज करता रहे और फिर यह भी न जाने कि मरीज जिंदा है या नहीं। जब विभाग के पास शराब से होने वाली मौतों और बीमारियों का कोई वैज्ञानिक डेटा ही नहीं है, तब करोड़ों रुपये के जागरूकता अभियानों का आधार क्या है? आखिर जनता का पैसा किस परिणाम के लिए खर्च किया जा रहा है?
सबसे अधिक पीड़ा की बात यह है कि इस पूरे विमर्श में महिलाओं का दर्द हमेशा हाशिये पर छोड़ दिया जाता है। शायद ही कभी किसी विधानसभा या संसद में उन महिलाओं की जिंदगी पर गंभीर चर्चा होती हो जिनकी पूरी जवानी शराबी पति की हिंसा झेलते हुए गुजर जाती है। कितनी महिलाएँ ऐसी हैं जो पति की शराब की आदत के कारण हर दिन मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करती हैं। कई महिलाएँ कम उम्र में विधवा हो जाती हैं क्योंकि शराब धीरे-धीरे शरीर को अंदर से खत्म कर देती है। यदि सरकार ईमानदारी से अध्ययन कराए तो संभव है कि विधवा पेंशन पाने वाली बड़ी संख्या में महिलाओं के पति की मृत्यु कहीं न कहीं शराब से जुड़ी बीमारी, दुर्घटना या हिंसा के कारण हुई हो। लेकिन क्या कभी किसी मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री ने उन महिलाओं के बीच बैठकर उनका दर्द समझने की कोशिश की? क्या कभी किसी राष्ट्रीय मंच से यह कहा गया कि शराब केवल राजस्व नहीं, बल्कि लाखों महिलाओं के जीवन का अभिशाप बन चुकी है?
अस्पतालों की वास्तविकता भी किसी से छिपी नहीं है। सरकारी अस्पतालों में लीवर खराब होने, ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज, मानसिक रोग और सड़क दुर्घटनाओं के अनगिनत मामलों के पीछे शराब एक बड़ा कारण बनती है। डॉक्टर अनौपचारिक बातचीत में यह स्वीकार करते हैं कि शराब से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। एक व्यक्ति शराब पीकर बीमार पड़ता है, लेकिन उसकी कीमत पूरा परिवार चुकाता है। घर की जमा पूंजी इलाज में खत्म हो जाती है। बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं। परिवार कर्ज में डूब जाता है। फिर भी शराब को “व्यक्तिगत स्वतंत्रता” का मामला कहकर चर्चा खत्म कर दी जाती है। जबकि सच्चाई यह है कि शराब का प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, वह पूरे समाज पर पड़ता है।
शराब और अपराध का संबंध भी किसी से छिपा नहीं है। घरेलू हिंसा, सड़क दुर्घटनाएँ, हत्या, छेड़छाड़ और दुष्कर्म जैसे अनेक अपराधों में शराब की भूमिका सामने आती है। शराब इंसान की सोचने-समझने की क्षमता को खत्म कर देती है और क्षणिक उत्तेजना में वह ऐसा अपराध कर बैठता है जिसका पछतावा जिंदगी भर रहता है। यदि सरकार सच में महिलाओं की सुरक्षा और अपराध नियंत्रण को लेकर गंभीर है, तो शराब नीति पर कठोर और ईमानदार चर्चा क्यों नहीं होती? आखिर क्यों शराब को केवल “राजस्व” के चश्मे से देखा जाता है?
सरकारें अक्सर शराब की बोतलों पर लिख देती हैं कि “शराब पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है”, लेकिन क्या केवल चेतावनी लिख देने से समाज बदल जाता है? यदि केवल चेतावनी ही पर्याप्त होती, तो सड़क दुर्घटनाएँ रुक जातीं, तंबाकू का सेवन खत्म हो जाता और नशे की समस्या कभी की समाप्त हो चुकी होती। असली सवाल सरकार की नीयत और राजनीतिक इच्छाशक्ति का है। यदि सरकार सच में शराब कम करना चाहती है, तो वह स्कूलों में नशा विरोधी शिक्षा अनिवार्य कर सकती है, शराब दुकानों की संख्या सीमित कर सकती है, रात में बिक्री पर सख्ती कर सकती है और चरणबद्ध तरीके से शराबबंदी की दिशा में आगे बढ़ सकती है। लेकिन समस्या यह है कि शराब सरकारों के लिए राजस्व का बड़ा स्रोत बन चुकी है, इसलिए सामाजिक नुकसान को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
यह भी सच है कि पूर्ण शराबबंदी आसान नहीं है। कई राज्यों में शराबबंदी के बाद अवैध शराब का कारोबार बढ़ा और जहरीली शराब से मौतों की घटनाएँ सामने आईं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाए। यदि पूर्ण प्रतिबंध संभव नहीं है, तो कम से कम शराब को सामाजिक रूप से हतोत्साहित करने की ईमानदार कोशिश तो हो सकती है। जिस तरह स्वच्छता अभियान को जन आंदोलन बनाया गया, जिस तरह “बेटी बचाओ” एक राष्ट्रीय संदेश बना, उसी तरह “नशा छोड़ो, परिवार बचाओ” भी एक राष्ट्रीय अभियान बन सकता है। भारत जैसे देश में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की बात का गहरा असर होता है। जब वे किसी विषय पर बोलते हैं, तो समाज उसे गंभीरता से लेता है। फिर यदि प्रधानमंत्री राष्ट्र के नाम संबोधन में यह कहें कि “शराब छोड़िए, अपने परिवार को बचाइए”, तो क्या उसका असर नहीं होगा? निश्चित रूप से होगा। लाखों लोग प्रेरित होंगे। परिवारों में चर्चा होगी। समाज में एक सकारात्मक संदेश जाएगा कि सरकार केवल राजस्व नहीं, बल्कि समाज की खुशहाली की भी चिंता करती है।
सबसे बड़ा प्रश्न आज भी यही है कि यदि सरकार के पास शराब से होने वाली मौतों, बीमारियों और सामाजिक नुकसान का सही डेटा ही नहीं है, तो नीति किस आधार पर बनाई जा रही है? क्या केवल राजस्व के आंकड़े पर्याप्त हैं? क्या सरकार यह जानना ही नहीं चाहती कि शराब समाज को कितना खोखला कर रही है? यदि मद्य निषेध विभाग करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद यह नहीं बता पा रहा कि उसके अभियान से शराब की खपत कितनी घटी, तो क्या यह सार्वजनिक धन का सही उपयोग है? यह सवाल केवल एक विभाग पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर खड़ा होता है।
समाज को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। शराब को आधुनिकता, स्टेटस और मनोरंजन का प्रतीक मानने वाली मानसिकता बदलनी होगी। युवाओं को यह समझना होगा कि शराब धीरे-धीरे इंसान को अंदर से खत्म कर देती है। फिल्मों और सोशल मीडिया में शराब को ग्लैमर की तरह प्रस्तुत करना भी चिंता का विषय है। जरूरत इस बात की है कि समाज शराब न पीने वालों को कमजोर समझना बंद करे और नशा छोड़ने वालों का सम्मान करे।
आज देश को केवल पेट्रोल बचाने की नहीं, परिवार बचाने की भी जरूरत है। क्योंकि पेट्रोल खत्म होने से केवल वाहन रुकते हैं, लेकिन शराब बढ़ने से घर उजड़ जाते हैं। पेट्रोल से अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है, लेकिन शराब से इंसानियत प्रभावित होती है। सरकार यदि सच में जनहित की राजनीति करना चाहती है, तो उसे शराब नीति पर ईमानदारी से विचार करना होगा। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की असली ताकत उसके खजाने में नहीं, बल्कि उसके परिवारों की खुशहाली में होती है और जब तक लाखों घर शराब की आग में जलते रहेंगे, तब तक विकास के बड़े-बड़े दावे अधूरे ही रहेंगे।
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

