सरकारी स्कूलों पर गहराता संकट, निजीकरण का बोलबाला
- डॉ. सत्यवान सौरभ
भारत की शिक्षा व्यवस्था गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। पिछले एक दशक में लगभग 94 हजार सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं, जबकि इसी अवधि में 51 हजार से अधिक निजी स्कूल खुल गए हैं। यह स्थिति न केवल सरकारी शिक्षा प्रणाली की कमजोरियों को उजागर करती है बल्कि बढ़ते निजीकरण के कारण उत्पन्न सामाजिक असमानता को भी सामने लाती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A के तहत प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यह अधिकार धीरे-धीरे कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। साल 2014-15 से 2023-24 के बीच सरकारी स्कूलों की संख्या 11,07,101 से घटकर 10,17,660 रह गई, यानी लगभग 89,441 स्कूल कम हो गए, जबकि निजी स्कूलों की संख्या 2,88,164 से बढ़कर 3,31,108 हो गई। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से ग्रामीण भारत के लिए चिंताजनक है, जहां गरीब और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए शिक्षा तक पहुंच लगातार कठिन होती जा रही है।
सरकारी स्कूलों के संकट का एक प्रमुख कारण स्कूल मर्जर नीति है, जिसके तहत कम नामांकन वाले छोटे स्कूलों को बड़े स्कूलों में मिला दिया जाता है। इससे ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में बच्चों के लिए स्कूल तक पहुंच कठिन हो गई। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में हजारों स्कूल बंद हुए हैं, जो कुल बंदी का बड़ा हिस्सा हैं। इसके अलावा, शिक्षकों की कमी, कमजोर आधारभूत संरचना और मिड-डे मील जैसी योजनाओं का सही ढंग से क्रियान्वयन न होना भी नामांकन में गिरावट के प्रमुख कारण हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के कुछ प्रावधान, जैसे एकल शिक्षक स्कूलों को हतोत्साहित करना भी इस प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सरकारी स्कूलों में नामांकन में भारी कमी आई है। जबकि निजी स्कूलों में छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ी है। गरीब परिवारों के बच्चे अब मजबूरन निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं लेकिन ऊंची फीस उनके लिए बड़ी बाधा बन जाती है।
निजी स्कूलों की संख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है और शहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। हालांकि यह वृद्धि कई चिंताएं भी पैदा करती है। निजी स्कूलों में फीस में भारी वृद्धि देखी जा रही है, जिससे निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए शिक्षा प्राप्त करना कठिन होता जा रहा है। शिक्षा का यह बढ़ता निजीकरण उसे एक सामाजिक सेवा से अधिक एक व्यापार में बदलता जा रहा है। शिक्षा का अधिकार कानून के तहत 25 प्रतिशत सीटें गरीब बच्चों के लिए आरक्षित हैं, लेकिन इसका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है, जिससे सामाजिक असमानता और गहरी हो रही है। एक ओर संपन्न वर्ग बेहतर संसाधनों और सुविधाओं वाले निजी स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करता है, वहीं दूसरी ओर गरीब वर्ग सीमित संसाधनों वाले सरकारी स्कूलों तक ही सीमित रह जाता है।
इस असंतुलन का सीधा प्रभाव ड्रॉपआउट दर पर भी पड़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में लाखों बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया है, जिनमें बड़ी संख्या किशोरियों की है। इसके पीछे गरीबी, बाल श्रम, परिवार का प्रवास, स्कूलों की दूरी और सुरक्षा की कमी जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों के लिए शिक्षा प्राप्त करना अधिक कठिन हो जाता है। जब परिवार निजी स्कूलों की फीस वहन नहीं कर पाते और आसपास सरकारी स्कूल उपलब्ध नहीं होते तो बच्चों का शिक्षा से बाहर होना लगभग तय हो जाता है। यह स्थिति आने वाले समय में बेरोजगारी और सामाजिक असमानता को और अधिक बढ़ा सकती है।
शिक्षा का निजीकरण केवल शैक्षिक समस्या नहीं है बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक असमानता को भी गहराता है। जब सभी वर्गों को समान शिक्षा के अवसर नहीं मिलते, तो समाज में अवसरों का असंतुलन बढ़ता जाता है। भारत में शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का केवल लगभग 3 प्रतिशत ही खर्च किया जाता है, जबकि इसे 6 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य अभी भी अधूरा है। इसका प्रभाव महिलाओं के सशक्तिकरण, रोजगार के अवसरों और देश के समग्र आर्थिक विकास पर पड़ता है। यदि यह स्थिति बनी रही, तो यह लोकतंत्र के लिए भी खतरा बन सकती है क्योंकि एक शिक्षित समाज ही जागरूक और जिम्मेदार नागरिक तैयार करता है।
इस संकट से निपटने के लिए सरकार को ठोस और प्रभावी कदम उठाने होंगे।
स्कूल मर्जर नीति पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए और ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे स्कूलों को संरक्षित किया जाना चाहिए। रिक्त शिक्षक पदों को शीघ्र भरा जाए और शिक्षकों के प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाए। सभी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं जैसे शौचालय, स्वच्छ पेयजल और डिजिटल संसाधन सुनिश्चित किए जाएं। मिड-डे मील योजना की गुणवत्ता में सुधार किया जाए और निजी स्कूलों की फीस पर नियंत्रण तथा निगरानी बढ़ाई जाए। शिक्षा का अधिकार कानून के प्रावधानों को सख्ती से लागू किया जाए और शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाकर इसे सकल घरेलू उत्पाद के 6 प्रतिशत तक पहुंचाया जाए।
निजीकरण का बढ़ता प्रभाव सरकारी स्कूलों के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। सरकारी स्कूलों की घटती संख्या और निजी स्कूलों की बढ़ती संख्या यह संकेत देती है कि शिक्षा धीरे-धीरे एक मौलिक अधिकार से हटकर एक व्यापार का रूप लेती जा रही है। इसका सबसे अधिक प्रभाव गरीब और वंचित वर्गों पर पड़ रहा है। यदि समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो यह असमानता समाज को गहराई तक प्रभावित करेगी। शिक्षा को बाजार की वस्तु नहीं, बल्कि सामाजिक विकास का आधार मानते हुए इसे मजबूत करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य इसी पर निर्भर करता है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

