सत्ता में महिलाओं की भागीदारी, आठ देश सबसे आगे
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
संसद में महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण का विधेयक गिरने के साथ ही देश में सत्ता में महिलाओं की भागीदारी को लेकर नई बहस छिड़ गई है। जहां एक और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश के माध्यम से महिलाओं से माफी मांगी है तो दूसरी और विपक्ष ने इसे अपनी बड़ी जीत और सरकार की हार बताई है। हालांकि विपक्ष यह भी कह रहा है कि उनका विरोध सीटों के परिसीमन से अधिक है। खैर, यह अलग बहस का विषय हो सकता है। पर एक बात साफ हो जानी चाहिए कि सत्ता में महिलाओं की हिस्सेदारी के मामले में हम दुनिया के देशों से अभी काफी पीछे चल रहे हैं। दुनिया के 190 देशों के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो हमारे देश का स्थान 147 वां आता है। दुनिया के देशों में सत्ता में महिलाओं की भागीदारी की बात करें तो वैश्विक स्तर औसत 27.5 फीसदी है। 30 राष्ट्राध्यक्ष महिलाएं है तो दुनिया के केवल आठ देश ही ऐसे हैं जहां महिलाओं की भागीदारी 50 फीसदी से अधिक है। रवांडा, क्यूबा, निकारागुआ, कोस्टारिका, बोलिविया, मैक्सिको, एंडोरा और संयुक्त अरब अमीरात में 50 प्रतिशत से अधिक भागीदारी है। न्यूजीलैंड, डेनमार्क और आइसलैंड 45 से 50 प्रतिशत महिलाओं का प्रतिनिधित्व है। आज हम महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी की बात कर रहे हैं वहीं इस समय दुनिया के 56 देश ऐसे हैं जहां सत्ता में महिलाओं का 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व है।
एक मोटे अनुमान के अनुसार हालिया चुनाव में 14 राज्यों में महिलाओं की निर्णायक भूमिका रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी 19 राज्यों केन्द्र शासित प्रदेशों में महिलाओं ने निर्णायक भूमिका निभाई। इसके साथ ही पिछले कुछ सालों के चुनाव परिणामों का विश्लेषण करें तो यह भी साफ हो जाता है कि लगभग सभी पार्टियों ने महिलाओं को केन्द्र में रखकर चुनाव घोषणा पत्र बनाये और महिलाओं को किसी भी नाम से योजना रखते हुए एक निश्चित राशि देने की बात प्रमुखता से की। बिहार, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश या अन्य प्रदेशों में लखपति दीदी या इसी तरह के नाम से मिलती जुलती योजनाओं में राशि उपलब्ध कराने की रणनीति महिला वोटों को अपनी और करने की रही है, यह दूसरी बात है कि इसका लाभ किस पार्टी को अधिक मिला। एक बात साफ हो जानी चाहिए राजनीतिक पार्टियां कहने को कुछ भी कहें पर विधानसभा और संसद में महिलाओं की भागीदारी अभी तक बढ़ नहीं पाई है।
महिला प्रतिनिधित्व का वैश्विक औसत जहां 27.5 प्रतिशत है वहीं हमारे देश में अभी तक यह 14-15 प्रतिशत तक पहुंच पाया है। रोचक बात यह है कि 2009 की 15 वीं लोकसभा के पहले तक तो हमारे देश में लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व दहाई की संख्या में भी नहीं पहुंचा था। 15 वीं लोकसभा में पहली बार 10.9 प्रतिशत प्रतिनिधित्व हो सका। हालांकि 1977 में आपातकाल के ठीक बाद की लोकसभा में सबसे कम भागीदारी केवल 3.5 प्रतिशत ही रह गई थी। पर 1977 के हालात अलग थे और उनको अलग करके देखा जाना चाहिए। उस समय आपातकाल के बाद की स्थितियां थीं। 18 वीं लोकसभा में 17 वीं लोकसभा की तुलना में 3 महिला सांसद कम है। इस तरह से 17वीं लोकसभा में महिलाओं की सर्वाधिक 14.4 प्रतिशत भागीदारी रही।
जहां तक राजनीतिक दलों की बात है तो भले ही महिला आरक्षण बिल का अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण कांग्रेस व अन्य विपक्षियों के साथ तृणमूल कांग्रेस ने भी विपक्ष में मतदान किया पर लोकसभा और राज्यसभा में टीएमसी की महिलाओं की हिस्सेदारी अधिक है। जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है तो कांग्रेस की भागीदारी 14.3 प्रतिशत और बीजेपी की भागीदारी 12.9 प्रतिशत है। अन्य दलों की भी कमोबेश यही स्थिति है। जहां तक राज्यों का प्रश्न है तो इस समय देश में सर्वाधिक महिला सदस्य छत्तीसगढ़ विधानसभा में है। छत्तीसगढ़ में कुल सदस्यों में 21.1 प्रतिशत महिला सदस्य है। त्रिपुरा में 15 प्रतिशत महिला सदस्य हैं। बाकी देश के अन्य राज्यों में 15 प्रतिशत महिलाएं भी विधानसभा की सदस्य नहीं है। नागालैंड देश का ऐसा प्रदेश है जहां सबसे कम महिला सदस्य हैं। कर्नाटक जैसे राज्य में भी पांच प्रतिशत से कम महिला विधानसभा सदस्य हैं।
खैर इससे यह तस्वीर साफ हो जानी चाहिए कि जब तक संवैधानिक बाध्यता नहीं होगी तब तक महिलाओं की भागीदारी लाख प्रयासों के बावजूद नहीं बढ़ने वाली है। इसके लिए एक सीमा तक सीटों का आरक्षण करना ही होगा। इसका जीता जागता उदाहरण पंचायतीराज व स्थानीय स्वशासन संस्थाएं है। जहां महिलाओं की सीटे आरक्षित होने से आज तस्वीर ही बदल गई है। आज सरपंच पति या प्रधान पति वाली बात भी नहीं रही है। पिछले चुनाव परिणाम भी यह साफ कर चुके हैं कि आज महिलाएं अपने निर्णय स्वयं लेती हैं। यही कारण है कि सरकार बनने और बनाने में महिलाओं मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रही है। आने वाले समय में इसमें और अधिक सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा। ऐसे में एक बात साफ हो जानी चाहिए कि बिना आरक्षित सीटों के विधानसभाओं या संसद में महिला सदस्यों की हिस्सेदारी बढ़ने की कल्पना करना बेमानी होगी। यह तो संवैधानिक बाध्यता से ही संभव हो पाएगा। यह सभी राजनीतिक दलों को समझना होगा। यदि महिलाओं की सत्ता में सहभागिता बढ़ानी है तो महिला सीटों का आरक्षण करना ही होगा। यह अवश्य है कि आरक्षण की सीमा आपसी समन्वय व विचार-विमर्श से सर्वसम्मति से तय होता है तो यह बेहतर लोकतांत्रिक परंपरा होगी। राजनीतिक दलों को आपसी आग्रह दुराग्रहों से हटकर इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। गैरसरकारी संगठनों को भी इस दिशा में देश में माहौल बनाना चाहिए। यह साफ है कि अब समय आ गया है जब महिलाओं की हिस्सेदारी तय होनी ही चाहिए।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद

