राजस्व न्यायालयों में लाखों वाद निस्तारण को लेकर राजस्थान की पहल
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
देश में राजस्व विवादों से संबंधित लाखों की संख्या में प्रकरण राजस्व न्यायालयों में निस्तारण के अभाव में पेंडिंग पड़े हैं। इनमें से हजारों की संख्या में ऐसे प्रकरण भी मिल जाएंगे जो तीस साल से भी अधिक समय से निर्णय के इंतजार में हैं। राजस्व न्यायालयों में विवाद के ये प्रकरण केवल राजस्व रेकार्ड में संशोधन कर सुधार के हैं क्योंकि मालिकाना हक तय करने के मामले तो सिविल कोर्ट द्वारा निर्णित किये जाते हैं। रेवेन्यू कोर्ट में मुख्यतः म्यूटेशन, भूमि का बंटवारा, जमीन के सीमांकन, भूमि पर अतिक्रमण, दस्तावेजों में सुधार, लगान या इस तरह के विवाद या फिर पट्टेदारी के विवाद से संबंधित विवाद निर्णय के लिए आते हैं। आरसीसीएमएस जैसी कम्प्यूटरीकृत व्यवस्था होने के बावजूद इसमें कोई खास सुधार नहीं देखा जा रहा है। होता यह है कि इस तरह के विवादों या प्रकरणों के निर्णित होने में भी पीढ़ी दर पीढ़ी निर्णय के लिए तारीख दर तारीख न्यायालयों के चक्कर लगाते रहते हैं। यह अपने आप में गंभीर समस्या है पर इसका निराकरण सरकारों की इच्छा शक्ति और व्यवस्था में सुधार से आसानी से किया जा सकता है।
खास बात यह कि इस तरह के लाखों की संख्या में विवाद निर्णय के अभाव में पेंडिंग पड़े हैं। राजस्थान की सरकार ने लंबित प्रकरणों को लेकर महत्वपूर्ण पहल की है। अब पीठासीन अधिकारियों को प्रातः 10 बजे से 2 बजे तक नियमित सुनवाई करने के साथ ही प्रकरणों के निष्पादन की टाइम लाइन और मॉनेटरिंग व्यवस्था को सुदृढ़ किया है। यह कोई अकेले राजस्थान का ही मुद्दा नहीं है अपितु सभी राज्यों में इस तरह के विचाराधीन प्रकरणों की संख्या बहुत चिंतनीय स्थिति में है। गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है और ऐसे भी उदाहरण देखने को मिलता है कि कई राजस्व न्यायालयों में तो सालभर में एक-एक केस का निस्तारण तक देखने को मिलता है। यह अपने आप में गंभीर होने के साथ कहीं-ना-कहीं हमारी व्यवस्था के लिए भी चुनौती से कम नहीं है।
राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के अनुसार राजस्व न्यायालयों के सुदृढ़ीकरण और लंबित वादों का निस्तारण सरकार की प्राथमिकता है। अकेले राजस्थान की ही आंकड़ों में बात की जाए तो इस तरह के 6 लाख 72 हजार वाद रेवेन्यू न्यायालयों में विचाराधीन चल रहे हैं। इनमें से करीब 64 प्रतिशत 4.31 लाख के वाद उपखण्ड अधिकारी के न्यायालयों में निर्णयाधीन है। चिंतनीय यह है कि 6 हजार के करीब वाद तो ऐसे हैं जो 20 से 30 साल के बीच निर्णय के प्रतीक्षा में हैं। राजस्थान के प्रमुख सचिव राजस्व टी. रविकान्त ने इस तरह के प्रकरणों को लेकर गंभीरता दिखाई और रिव्यू के बाद इस तरह की व्यवस्था चाक-चौबंद करने के निर्देश जारी कराने की पहल की है कि राजस्व न्यायालयों में विचाराधीन वादों की समयबद्ध नियमित सुनवाई हो, तारीखों पर तारीखें नहीं दी जाएं और प़क्ष-प्रतिपक्ष को समुचित अवसर देते हुए वादों का प्राथमिकता से निस्तारण किया जाएं। प्रमुख सचिव राजस्व राजस्थान टी. रविकान्त ने व्यवस्था में सुधार और संवेदनशील प्रशासन का परिचय देते हुए मुख्य सचिव राजस्थान वी. श्रीनिवास ने परिपत्र जारी कर आवश्यक दिशा-निर्देश भी जारी किये हैं। यह कोई राजस्थान की नहीं अपितु इस तरह की पहल की सभी राज्य सरकारों द्वारा किये जाने की आवश्यकता है।
राजस्व न्यायालयों में विचाराधीन वादों के निस्तारण में मुख्यतः तीन कारण सामने आते हैं। इनमें भी सबसे प्रमुख कारण संबंधित पटवारी, गिरदावर, तहसीलदार द्वारा मौका रिपोर्ट सालों तक प्रस्तुत नहीं करना देखा गया है। एक अन्य कारण राजस्व न्यायालयों से जुड़े कार्मिकों को न्यायिक प्रक्रिया के संबंध में प्रशिक्षित किया जाना आवश्यक हो जाता है। आवश्यक न्यायिक प्रक्रिया की जानकारी के अभाव में भी देरी होती है। इसके अलावा एक अन्य कारण जो कि सर्वविदित है और वह है न्यायालय के नोटिस का तामील नहीं होना भी है। तामीली के अभाव में समय अधिक लग जाता है। इसके अलावा तारीख-पर-तारीख और लंबी तारीख देने की परपंरा भी वादों के निस्तारण की बड़ी बाधा है।
राजस्थान का संदर्भ इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि इन कारणों को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट निर्देश जारी किये गये हैं। अब राजस्व पीठासीन अधिकारियों को कार्य दिवस में प्रातः 10 बजे से 2 बजे तक आवश्यक रुप से न्यायालय आयोजित करेंगे। इसमें किसी तरह का अवरोध ना हो इसके लिए यह भी निर्देशित किया गया है कि आवश्यक कार्यों से आयोजित होने वाली वर्चुअल बैठकें वीसी आदि 2 बजे बाद ही आयोजित की जाएगी। यह अपने आप में महत्वपूर्ण और सकारात्मक पहल मानी जानी चाहिए। इसके साथ ही मॉनेटरिंग व्यवस्था को चाक-चौबंद करते हुए संभाग स्तरीय स्थाई एरियर रिव्यू कमेटी का गठन, रिव्यू हेतु 100-100 प्रकरण तय कर विभिन्न स्तर पर निस्तारण प्रगति रिव्यू आदि तय किया गया है।
संभागीय आयुक्त से लेकर जिला कलक्टर आदि द्वारा मासिक बैठकों व दौरों के दौरान समीक्षा की व्यवस्था की गई है। पटवारी, गिरदावर या तहसीलदार द्वारा तीन अवसर देने पर भी मौका रिपोर्ट नहीं भेजने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रस्तावित करने जैसी व्यवस्था की गई है। इसी तरह से तामील व्यवस्था में एक समय बाद समाचार पत्र में प्रकाशन तक का विकल्प दिया गया है। 15 दिन से अधिक की तारीख भी नहीं देने को कहा गया है। निश्चित रुप से यह व्यवस्था इस तरह के वादों के निस्तारण में क्रांतिकारी बदलाव लाने में सफल हो सकती है।
राजस्थान सरकार की सकारात्मक पहल अन्य राज्यों के लिए भी सुधारात्मक पहल हो सकती है। इससे जहां लाखों की संख्या में राजस्व न्यायालयों में निर्णय की प्रतीक्षा के वादों के निस्तारण की राह प्रशस्त हो सकेगी वहीं अनावश्यक विवादों का निस्तारण होने से ग्रामीण माहौल में भी सकारात्मक बदलाव आएगा। अनावश्यक विवाद समाप्त होंगे और एक संवेदनशील प्रशासनिक व्यवस्था का संदेश जाएगा। हो सकता है कि अन्य प्रदेशों द्वारा भी इस दिशा में पहल की जा रही हो तो इस तरह की पहल को अपनाने में किसी तरह का संकोच नहीं किया जाना चाहिए ताकि लाखों की संख्या में इस तरह के विवादों के निस्तारण की पहल सही दिशा में सही कदम हो सके।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

