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महिलाएं त्याग, संघर्ष और सफलता का आधार

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महिलाएं त्याग, संघर्ष और सफलता का आधार


अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) पर विशेष-डा.लोकेश कुमार

भारत की सनातन संस्कृति में महिलाओं की तुलना देवियों से की गई है। उन्हें लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती जैसा सर्वोच्च सम्मान, पवित्रता, शक्ति और मातृत्व का प्रतीक मानने की परिपाटी है। यह धारणा नारी को पूजनीय, त्याग-तपस्या की मूर्ति और परिवार की रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित करती है। यह केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते, तत्र देवता’ के अनुसार नारी शक्ति के आदर का प्रतीक माना जाता है। महिलाओं को देवी मानना उनके सम्मान की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है, जो भारतीय संस्कृति में शक्ति और सृजन के रूप में उनके महत्व को स्थापित करता है।

भारतीय संस्कृति में महिला को दुर्गा, काली का रूप माना है, क्योंकि वह परिवार की रक्षा, पोषण और नैतिक विकास की आधारशिला हैं। उसे लक्ष्मी का रूप भी माना है क्योंकि उसे लक्ष्मी का रूप मानकर घर-घर में सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। ज्ञान और सृजन के रूप सरस्वती भी माना है क्योंकि महिलाएं शिक्षा, सृजनात्मकता और ज्ञान की वाहक मानी जाती हैं। मातृत्व और ममता की प्रतिमूर्ति माना गया है।

विश्व में 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले 28 फरवरी, 1909 को न्यूयॉर्क शहर में अमेरिकी समाजवादी पार्टी की ओर से आयोजित ‘ महिला दिवस ’ मनाया गया था। उनके साथ एकजुटता दिखाते हुए, कम्युनिस्ट कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ क्लारा जेटकिन ने ‘कार्यशील महिला दिवस’ मनाने का प्रस्ताव रखा, जिसे 1910 में कोपेनहेगन में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी महिला सम्मेलन में मंजूरी प्रदान की गई, हालांकि इसकी कोई निश्चित तिथि तय नहीं की गई थी। व्लादिमीर लेनिन ने 1917 की रूसी क्रांति में महिलाओं की सक्रिय भूमिका को देखते हुए 8 मार्च, 1922 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस घोषित किया। इसके बाद समाजवादी आंदोलन और कम्युनिस्ट देशों की ओर से इसी तिथि पर महिला दिवस मनाया जाने लगा । 1975 में संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को आधिकारिक रूप से मनाना प्रारंभ किया। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर कई देशों में सार्वजनिक अवकाश घोषित कर रखा है।

संविधान निर्माता डा. भीमराव अम्बेडकर महिलाओं को सशक्त, शिक्षित और स्वतंत्र देखना चाहते थे, जिन्हें वे सामाजिक प्रगति का आधार मानते थे। उन्होंने हिंदू कोड बिल के माध्यम से महिलाओं को संपत्ति, विवाह, तलाक और शिक्षा में समानता दिलाने का ऐतिहासिक प्रयास किया। उनका मानना था कि किसी भी समाज की प्रगति महिलाओं की स्थिति से मापी जा सकती है। महिला सशक्तीकरण का अर्थ है- उन्हें अपने अधिकारों को समझने और समाज में निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करना, जिससे एक मजबूत और संतुलित समाज का निर्माण हो सके। 8 मार्च का दिन जो पूरी दुनिया में नारी शक्ति को समर्पित है। यह दिन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि समाज में महिलाओं के योगदान को पहचानने और समानता के लिए संघर्ष करने की याद दिलाता है।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाएं अपनी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उपलब्धियों का जश्न मनाती हैं और लैंगिक समानता की वकालत करती हैं। इस दिन वे रैलियों, सेमिनारों, नेटवर्किंग कार्यक्रमों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेती हैं। साथ ही, महिलाएं महिला-केंद्रित चौरिटी के लिए फंड जुटाने, स्वास्थ्य शिविरों में जाने और स्वयं सहायता समूहों के साथ मिलकर काम करने जैसी गतिविधियों में सक्रिय रूप से भागीदारी निभाती हैं।

अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने के पीछे महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक उपलब्धियों का जश्न मनाने, लैंगिक समानता को बढ़ावा देने और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने का दिन माना है। यह दिन महिलाओं के संघर्ष को याद करने और उन्हें सशक्त बनाने का संकल्प लेने का अवसर भी है। वैदिक काल से महिलाओं को पुरुषों के समान आदर और शिक्षा का अधिकार प्राप्त था, गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाएं भी थीं। यह तुलना नारी के प्रति सम्मान का प्रतीक है, लेकिन कभी-कभी यह महिलाओं को ईश्वरीय आदर्शों के तहत सीमित करने या रूढ़िवादी छवि (जैसे सिर्फ ममतामयी मां) में बांधने का कारण भी बन सकती है।

जहां एक ओर उन्हें देवी का रूप दिया जाता है, वहीं समाज में उनके खिलाफ हिंसा और सम्मान में कमी जैसे विरोधाभास भी देखने को मिलते हैं। समाज में महिलाओं की भूमिका अत्यंत बहुआयामी और महत्वपूर्ण मानी गई है। वे न केवल परिवार का पालन -पोषण कर रही है। बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और राजनीति जैसे क्षेत्रों में भी पीछे नहीं हैं। आधुनिक समय में भी वे पारंपरिक घरेलू जिम्मेदारियों के साथ-साथ कामकाजी जीवन में बखूबी निभा रही हैं, जो देश के सामाजिक-आर्थिक विकास में भरपूर योगदान है। महिला सशक्तीकरण का अर्थ है उन्हें अपने अधिकारों को समझने और समाज में निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करना, जिससे एक मजबूत और संतुलित समाज का निर्माण हो सके। 8 मार्च का दिन जो पूरी दुनिया में नारी शक्ति को समर्पित है।

यह दिन केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि समाज में महिलाओं के योगदान को पहचानने और समानता के लिए संघर्ष करने की याद दिलाता है। बहरहाल, हम यही कह सकते हैं कि महिलाओं को सशक्त बनाने, उन्हें उचित शिक्षा और समान अवसर प्रदान करने से समाज में न केवल विकास होता है, बल्कि एक समतामूलक और जागरूक समाज का निर्माण भी होता है। एक शिक्षित और सशक्त महिला न केवल अपने परिवार का, बल्कि पूरे राष्ट्र का भविष्य बदल सकती हैं। हम महिलाओं का सम्मान करेंगे, उन्हें समान अवसर देंगे और एक ऐसा समावेशी समाज बनाएंगे,जहां हर महिला निर्भय होकर अपने सपनों की उड़ान भर सकें। महिलाओं ने हर क्षेत्र में, चाहे वह शिक्षा हो, विज्ञान हो, राजनीति हो या खेल, अपनी सफलता का परचम लहराया है। आज की महिला किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं है, बल्कि कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / रोहित