महिला सुरक्षा की मुहिम में टकराव की जगह साझेदारी की जरूरत
डाॅ. अरविंद नाथ तिवारी
दिल्ली में महिला सुरक्षा को लेकर हाल के प्रदर्शनों के दौरान लगे कुछ नारों ने सामाजिक विमर्श को एकबार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है। ‘‘एक कचौड़ी, दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा’’, ‘‘नारी अपने आप की, नहीं किसी के बाप की’’, ‘‘फूल नहीं, चिंगारी है, ये भारत की नारी है’’ और ‘‘ठंडे समोसे गर्म करो, मर्द जात शर्म करो’’ जैसे नारे अपने अंदाज में नये और व्यंग्यात्मक जरूर हैं लेकिन इनके भीतर छिपे संदेश पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
महिला सुरक्षा आज समाज की सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है। महिलाओं के साथ हिंसा, छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और सार्वजनिक स्थानों पर असुरक्षा जैसी घटनाएं किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय हैं। ऐसी घटनाओं के खिलाफ आवाज उठाना महिलाओं का अधिकार है और समाज तथा शासन की जिम्मेदारी भी है। किसी महिला के साथ अपराध के लिए उसके पहनावे, व्यवहार या स्वतंत्रता को जिम्मेदार ठहराना न केवल गलत है बल्कि अपराधी के कृत्य से ध्यान भटकाने वाला तर्क भी है। महिला चाहे किसी भी पोशाक में हो, किसी भी समय घर से बाहर निकले या अपनी पसंद के अनुसार जीवन जिये, उसकी सुरक्षा उसका मूल अधिकार है।
महिला सुरक्षा की लड़ाई को पुरुष बनाम महिला के संघर्ष में बदल देना भी समाधान नहीं हो सकता, यदि कुछ नारों में ‘‘मर्द जात’’ को सामूहिक रूप से संदेह या शर्म का पात्र बनाया जाता है तो इससे समाज में संवाद की जगह टकराव बढ़ने का खतरा रहता है। किसी व्यक्ति के अपराध के लिए लिंग के आधार पर जिम्मेदार ठहराना उतना ही अनुचित है, जितना किसी महिला के साथ हुई घटना के लिए उसके पहनावे या जीवनशैली को दोष देना।
महिला सुरक्षा का प्रश्न पूरे समाज का प्रश्न है। अपराध करने वाला पुरुष हो सकता है लेकिन अपराध के खिलाफ आवाज उठाने वाला भी पुरुष हो सकता है। पिता अपनी बेटी की सुरक्षा और सम्मान के लिए चिंतित होता है, भाई अपनी बहन के लिए खड़ा होता है, पति अपनी पत्नी के अधिकारों का सम्मान करता है और बेटा अपनी मां के सम्मान की रक्षा करता है। दूसरी ओर, महिलायें भी सामाजिक बदलाव की महत्वपूर्ण साझेदार हैं। इसलिए इस लड़ाई को स्त्री और पुरुष के बीच खाई पैदा करने वाली लड़ाई नहीं बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक समाज बनाने का साझा अभियान बनाना चाहिए।
यह भी समझना जरूरी है कि महिलाओं के कपड़े, रहन-सहन या उनकी स्वतंत्रता को महिला असुरक्षा का कारण बताना उचित नहीं है। किसी भी परिस्थिति में अपराध का उत्तरदायित्व अपराधी का ही होना चाहिए। साथ ही, स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी व्यक्ति- चाहे वह पुरुष हो या महिला, को सामाजिक मर्यादा, कानून और दूसरे व्यक्ति के अधिकारों की अनदेखी करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। समाज में शालीनता और जिम्मेदारी की अपेक्षा दोनों से समान रूप से होनी चाहिए।
भारत का सामाजिक इतिहास इस बात का प्रमाण है कि बड़े परिवर्तन कभी केवल एक वर्ग के संघर्ष से संभव नहीं हुए। स्वतंत्रता आंदोलन में पुरुषों के साथ महिलाओं ने भी कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष किया। देश की आजादी किसी एक वर्ग की उपलब्धि नहीं बल्कि सामूहिक संघर्ष का परिणाम थी। इसी तरह सामाजिक कुरीतियां, अशिक्षा, गरीबी, हिंसा और अपराध के खिलाफ लड़ाई भी सामूहिक प्रयास से ही सफल होगी।
महिला सुरक्षा के लिए कानूनों का कठोर और निष्पक्ष पालन जरूरी है। पुलिस व्यवस्था को संवेदनशील बनाया जाना चाहिए। शिकायत दर्ज कराने से लेकर न्याय मिलने तक की प्रक्रिया आसान और तेज होनी चाहिए। सार्वजनिक परिवहन, बाजार, कार्यस्थल, शिक्षण संस्थानों और डिजिटल माध्यमों में महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। इसके साथ ही बच्चों और युवाओं में बचपन से ही लैंगिक सम्मान, सहमति, संवेदनशीलता और जिम्मेदार व्यवहार की शिक्षा दी जानी चाहिए।
सिर्फ कानून बनाकर समाज नहीं बदलेगा। घर, विद्यालय, परिवार, मीडिया और सामाजिक संस्थाओं को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। जिस प्रकार लड़कियों को सावधानी और आत्मरक्षा सिखाई जाती है, उसी प्रकार लड़कों को भी यह सिखाना होगा कि किसी महिला की इच्छा, गरिमा और व्यक्तिगत सीमा का सम्मान करना उनकी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है।
महिला आंदोलन की ताकत उसकी व्यापकता में है। यदि यह आंदोलन पुरुषों के प्रति नफरत का संदेश देने लगेगा तो उसका दायरा सीमित हो सकता है लेकिन यदि इसका संदेश यह हो कि ‘‘हर महिला सुरक्षित हो, हर पुरुष जिम्मेदार हो और हर अपराधी कानून के सामने जवाबदेह हो’’, तो समाज के अधिकांश लोग इसके साथ खड़े होंगे।
नारे आंदोलन की आवाज होते हैं लेकिन नारे समाज की दिशा भी तय करते हैं। इसलिए नारों में आक्रोश के साथ विवेक और संवाद की जगह भी होनी चाहिए। महिला को कमजोर समझना गलत है लेकिन पुरुष को जन्म से अपराधी मान लेना भी गलत है। जरूरत किसी एक वर्ग को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की नहीं बल्कि दोनों को समान जिम्मेदारी के साथ खड़ा करने की है।
महिला सुरक्षा की असली लड़ाई तब जीती जायेगी, जब समाज में यह भावना मजबूत होगी कि महिला की स्वतंत्रता सम्मान के साथ सुरक्षित है, पुरुष की जिम्मेदारी कानून और नैतिकता से तय होती है और अपराधी की पहचान उसके लिंग से नहीं, उसके कृत्य से होती है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि ‘‘मर्दों पर लगाम कैसे लगे?’’ बल्कि सवाल यह भी होना चाहिए कि ऐसा समाज कैसे बने, जहां किसी महिला को असुरक्षित महसूस न करना पड़े और किसी पुरुष को केवल पुरुष होने के कारण संदेह की नजर से न देखा जाय, यही संतुलित दृष्टिकोण महिला सुरक्षा को वास्तविक सामाजिक आंदोलन में बदल सकता है।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / अरविन्द नाथ तिवारी

