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भारतीय मजदूर संघ : श्रमिक चेतना का राष्ट्रवादी अध्याय

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विपिन बिहारी पाठक

श्रम का राष्ट्रीयकरण करें, उद्योग का श्रमिकीकरण करें और राष्ट्र का औद्योगीकरण करें।-दत्तोपंत ठेंगड़ी

यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी के श्रम-दर्शन का सार है। उन्होंने भारतीय श्रमिक आंदोलन को वर्ग संघर्ष की संकीर्ण सोच से निकालकर राष्ट्रनिर्माण की व्यापक अवधारणा से जोड़ा। यही कारण है कि आज भी भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) केवल एक ट्रेड यूनियन नहीं, बल्कि राष्ट्रहित, श्रमिकहित और उद्योगहित के संतुलन का एक विशिष्ट मॉडल माना जाता है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत वैचारिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा था। विश्व का बड़ा हिस्सा साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित था और भारतीय श्रमिक आंदोलन पर भी वामपंथी संगठनों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता था। उस समय श्रमिक आंदोलनों में वर्ग संघर्ष की अवधारणा प्रमुख थी। दत्तोपंत ठेंगड़ी ने इस सोच को भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं माना। उनका विश्वास था कि श्रमिक, उद्योग और समाज एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही राष्ट्रीय परिवार के पूरक अंग हैं। इसलिए संघर्ष नहीं, सहयोग ही स्थायी विकास का मार्ग हो सकता है।

इसी विचार को व्यवहार में उतारने के लिए 23 जुलाई 1955 को, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की जयंती के दिन, भोपाल में भारतीय मजदूर संघ की स्थापना हुई। इसकी शुरुआत अत्यंत साधारण परिस्थितियों में हुई। न कोई बड़ा संगठन, न सदस्यता, न कार्यालय और न ही आर्थिक संसाधन। केवल 35 कार्यकर्ताओं के साथ प्रारंभ हुआ यह प्रयास आज देश के सबसे बड़े श्रमिक संगठनों में गिना जाता है।

दत्तोपंत ठेंगड़ी का जन्म 10 नवंबर 1920 को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के अरवी में हुआ। छात्र जीवन से ही उनमें राष्ट्र और समाज के प्रति गहरी संवेदनशीलता थी। आगे चलकर वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बने और संगठन निर्माण को अपना जीवन समर्पित कर दिया। भारतीय मजदूर संघ के अतिरिक्त उन्होंने भारतीय किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच और सामाजिक समरसता मंच जैसे अनेक संगठनों की स्थापना की। उल्लेखनीय है कि उन्हें पद्मभूषण सम्मान की घोषणा भी हुई, किंतु उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया।

ठेंगड़ी जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने श्रमिक आंदोलन को राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा से अलग रखने का प्रयास किया। उनका मानना था कि ट्रेड यूनियन का मूल उद्देश्य श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करना है, न कि किसी राजनीतिक दल का विस्तार बनना। यही कारण है कि भारतीय मजदूर संघ ने स्वयं को दलगत राजनीति से अलग रखते हुए श्रमिकों के संगठन के रूप में विकसित किया।

बीएमएस की वैचारिक पृष्ठभूमि भारतीय संस्कृति और 'एकात्म मानववाद' पर आधारित है। यह मानती है कि जीवन में विविधता अवश्य है, किंतु उसके मूल में एकता निहित है। इसलिए श्रमिक और उद्योगपति परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास यात्रा के सहभागी हैं। यदि दोनों के बीच विश्वास और सहयोग का वातावरण बने तो उत्पादन भी बढ़ेगा और श्रमिकों का सम्मान भी सुरक्षित रहेगा।

इसी सोच से प्रेरित होकर दत्तोपंत ठेंगड़ी ने अधिकतम उत्पादन और समान वितरण का सिद्धांत दिया। उन्होंने पूंजीवाद की केवल उत्पादन-केंद्रित सोच और समाजवाद की केवल वितरण-केंद्रित सोच के स्थान पर संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उनका मानना था कि अधिक उत्पादन राष्ट्र का कर्तव्य है और उत्पादन के लाभ का न्यायपूर्ण वितरण श्रमिक का अधिकार।

भारतीय मजदूर संघ का प्रसिद्ध आदर्श वाक्य—हम राष्ट्रहित में काम करेंगे और पूर्ण वेतन की मांग करेंगे—आज भी श्रम और राष्ट्र के बीच संतुलन का संदेश देता है। यह नारा बताता है कि श्रमिक का संघर्ष केवल अधिकारों के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय समृद्धि के लिए भी होना चाहिए।

दत्तोपंत ठेंगड़ी ने श्रमिक आंदोलन में राष्ट्रवादी नारों की भी नई परंपरा विकसित की। उन्होंने उस दौर के अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी नारों के स्थान पर भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप विचार प्रस्तुत किए। श्रम का राष्ट्रीयकरण, उद्योग का श्रमिकीकरण और राष्ट्र का औद्योगीकरण का उनका संदेश श्रमिक को केवल मजदूर नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माता के रूप में स्थापित करता है। बीएमएस ने औद्योगिक परिवार की अवधारणा भी दी, जिसमें श्रमिक, प्रबंधन और समाज तीनों को विकास की साझी इकाई माना गया।

ठेंगड़ी जी ने स्व-रोजगार और पारंपरिक कारीगरों के महत्व को भी समय रहते पहचान लिया था। उन्होंने सुनार, लोहार, कुम्हार, दर्जी, नाई, धोबी जैसे पारंपरिक व्यवसायों को विश्वकर्मा क्षेत्र की संज्ञा दी और इसे जनता का क्षेत्र बताया। यह दृष्टि आज 'आत्मनिर्भर भारत', 'मेक इन इंडिया' और कौशल विकास जैसे अभियानों के संदर्भ में और भी प्रासंगिक प्रतीत होती है।

दत्तोपंत ठेंगड़ी केवल संगठनकर्ता ही नहीं, बल्कि गंभीर चिंतक और विपुल लेखक भी थे। उन्होंने हिंदी, अंग्रेज़ी और मराठी में अनेक पुस्तकों के माध्यम से श्रम, अर्थनीति, स्वदेशी और राष्ट्रवाद पर अपने विचार प्रस्तुत किए। उनका मानना था कि आधुनिकीकरण आवश्यक है, परंतु उसका अर्थ पश्चिमीकरण नहीं हो सकता। विकास का भारतीय मॉडल भारतीय समाज, संस्कृति और परिस्थितियों के अनुरूप ही होना चाहिए।

आज भारतीय मजदूर संघ देशभर में हजारों संबद्ध यूनियनों और व्यापक सदस्य आधार के साथ श्रमिक हितों की आवाज़ बन चुका है। समय-समय पर उसने विभिन्न सरकारों की उन नीतियों का भी विरोध किया जिन्हें उसने श्रमिक हितों के प्रतिकूल माना। इससे स्पष्ट होता है कि उसका मूल आग्रह श्रमिक हित और राष्ट्रीय हित के संतुलन पर रहा है।

दत्तोपंत ठेंगड़ी का जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्रनिर्माण केवल सरकारों का कार्य नहीं, बल्कि श्रमिक, किसान, उद्योग, समाज और संस्कृति-सभी के समन्वित प्रयास का परिणाम है। उन्होंने भारतीय श्रमिक आंदोलन को वैचारिक दिशा दी और यह विश्वास जगाया कि श्रम केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा का सर्वोच्च माध्यम भी हो सकता है। आज, जब भारत आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर है, तब ठेंगड़ी जी का श्रम-दर्शन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक और प्रेरणास्पद दिखाई देता है।

(लेखक, भारतीय मजदूर संघ, उत्तर प्रदेश के मंत्री हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद