भारतीय दर्शन और मानसिक स्वास्थ्य
डॉ. शिवानी कटारा
मानसिक स्वास्थ्यता क्या है? भारतीय दर्शन में मानसिक स्वास्थ्यता का मूल तत्व “धृति” माना गया है और धर्म के दस लक्षणों में प्रथम कहा गया है,
मनुस्मृति ७.९२–९३
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमार्जवमिति धर्मस्य लक्षणम् ॥
अर्थात् — “धैर्य (धृति), क्षमा, दमन (संयम), अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और आर्जव — यही धर्म के स्वरूप हैं।”
धृति केवल साधारण धैर्य नहीं, बल्कि जीवन की रीढ़ है। आज आधुनिक मस्तिष्क-विज्ञान और सकारात्मक मनोविज्ञान इसी धृति को नए नामों में पहचान रहे हैं — मानसिक लचीलापन, भावनात्मक स्थिरता, आत्म-नियंत्रण और आंतरिक शक्ति। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन ( 2022) के अनुसार, जिन लोगों में मानसिक सहनशक्ति अधिक होती है, उनमें तनाव हार्मोन का स्तर कम और हृदय की लय में विविधता (Heart Rate Variability) बेहतर होती है — यह मन और शरीर के संतुलन का संकेत है।
धृतिवान व्यक्ति वह है जो हर परिस्थिति में भावनात्मक स्थिरता बनाए रखता है, धैर्य और संयम से निर्णय लेता है, निराशा में भी आशा देखता है, और क्षणिक आवेगों पर नियंत्रण रखकर अपने मूल्यों पर अडिग रहता है। इसका अभाव ही आज के अधिकांश मानसिक विकारों — क्रोध संबंधी समस्या, आवेगशीलता, चिंता और निर्णय थकान — की जड़ है। अतः वास्तविक मानसिक स्वास्थ्य केवल दवाओं या परामर्शों से नहीं, बल्कि भीतर की धृति” के विकास से जन्म लेता है — और इसकी शुरुआत होती है आहार से।
आहार अनुशासन और मानसिक स्वास्थ्य
भारतीय दर्शन कहता है — “जैसा अन्न, वैसा मन।” और छांदोग्य उपनिषद् में उल्लेख है — “आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः,” अर्थात् जब भोजन शुद्ध होता है, तब मन और बुद्धि भी निर्मल हो जाते हैं। भोजन केवल पेट भरने का नहीं, बल्कि विचारों और भावनाओं को संतुलित करने का माध्यम है। सात्त्विक भोजन—ताज़ा, हल्का और पौष्टिक—मन को शांत व स्थिर बनाता है, जबकि तला-भुना व प्रसंस्कृत भोजन चिड़चिड़ापन बढ़ाता है। भोजन का तरीका भी महत्वपूर्ण है—धीरे, सजगता और कृतज्ञता के साथ खाना मन को संतुलित करता है, जिसे आधुनिक विज्ञान में “माइंडफुल ईटिंग” कहा जाता है।
विज्ञान अब मानता है कि हमारे पेट और दिमाग का गहरा संबंध है — जिसे आंत-मस्तिष्क संबंध (Gut-Brain Axis) कहा जाता है। हमारी आँतों में रहने वाले सूक्ष्म जीव सेरोटोनिन जैसे रसायन बनाते हैं, जो हमारे मनोभाव यानी खुशी और तनाव को नियंत्रित करते हैं। अगर आहार अस्वस्थ है, तो यह संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे चिंता, अवसाद और थकान बढ़ती है। हार्वर्ड पब्लिक हेल्थ (2024) के अध्ययन के अनुसार, जो लोग अधिक प्रसंस्कृत भोजन खाते हैं, उनमें अवसाद का जोखिम 35% अधिक होता है।
ध्यान, भक्ति, प्राणायाम और जप
ये सभी केवल धार्मिक साधन नहीं, बल्कि तनाव का जैविक शुद्धिकरण (Biological Detox of Stress) हैं। आधुनिक विज्ञान बताता है कि लगातार तनाव से मस्तिष्क का भय और चिंता नियंत्रक भाग (Amygdala) अत्यधिक सक्रिय हो जाता है, जबकि निर्णय और भावनात्मक संतुलन केंद्र (Prefrontal Cortex) की कार्यक्षमता घटती है। परिणामस्वरूप, चिंता, भय और अवसाद अब हर उम्र में सामान्य हो गए हैं।
लेकिन जहाँ विज्ञान कारण बताता है, वहीं अध्यात्म समाधान देता है। नियमित ध्यान से सुख हार्मोन तथा स्नेह हार्मोन बढ़ते हैं — जिससे व्यक्ति में शांति, करुणा और आत्म-नियंत्रण स्वाभाविक रूप से विकसित होता है। मस्तिष्क स्कैन अध्ययनों में पाया गया कि ध्यान करने वालों में शांति तरंगें (Alpha Waves) और गहरी विश्रांति तरंगें (Theta Waves) अधिक सक्रिय होती हैं। भारतीय दर्शन कहता है — “योगः चित्तवृत्ति निरोधः,” अर्थात् जब मन की चंचलता थमती है, तभी सच्चा योग और वास्तविक मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है।
अध्यात्म केवल ध्यान नहीं, बल्कि भक्ति का भी विज्ञान है। जब व्यक्ति यह समझता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में नहीं, और वह किसी विराट शक्ति का अंश है — तब मन में समर्पण का भाव आता है, जो तनाव को पिघला देता है। जैसा कहा गया है — “जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा हो रहा है, जो होगा अच्छा ही होगा।” यह कोई साधारण वाक्य नहीं, बल्कि मानसिक पुनर्व्यवस्था (Psychological Reframing) का सिद्धांत है — जब हम जीवन को नियंत्रण नहीं, बल्कि स्वीकार्यता से देखते हैं, तब मन हल्का हो जाता है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं — “तुम्हारा युद्ध दूसरों से नहीं, अपने ही संदेह से है।” यानी आत्म-संघर्ष ही सबसे बड़ा युद्ध है। आत्म-स्वीकृति केवल भावनात्मक निर्णय नहीं, बल्कि मस्तिष्कीय पुनर्संरचना (Brain Rewiring) की प्रक्रिया है। यह आत्म-प्रशंसा नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार है — “मैं पूर्ण नहीं, पर अपूर्ण भी अस्वीकार्य नहीं।”
श्वास, जो मन की धड़कन समान है, प्राणायाम के माध्यम से संयमित होती है। यह केवल श्वास-प्रश्वास का अभ्यास नहीं, बल्कि जीवन-ऊर्जा को संतुलित करने की प्रक्रिया है। अध्यात्म में “प्राण” शरीर, मन और आत्मा को जोड़ने वाला सेतु माना गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से प्राणायाम रक्त में ऑक्सीजन बढ़ाकर स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (Autonomic Nervous System) को संतुलित करता है और तनाव घटाता है। इसी प्रकार मंत्र-जप, विशेषकर ॐ का उच्चारण, मस्तिष्क में लयबद्ध शांति उत्पन्न करता है। यह वेगस तंत्रिका को सक्रिय कर गहरी विश्रांति, बेहतर एकाग्रता और संतुलित नींद में सहायक होता है।
मनुष्य जैसा संग रखे, वैसा बने
जैसे लोहे का टुकड़ा चुंबक के पास रहकर खुद चुंबकीय हो जाता है, वैसे ही हम भी अपने आस-पास के लोगों से ऊर्जा, दृष्टिकोण और संस्कार ग्रहण करते हैं। तुलसीदास जी ने कहा, “सत्संगति जो देई सुमति सोई।” अर्थात् — अच्छे संग से ही शुभ विचारों की प्राप्ति होती है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार हमारे मस्तिष्क में प्रतिबिंब कोशिकाएँ (Mirror Neurons) होती हैं — जो सामने वाले की भावनाएँ देखकर वैसी ही अनुभूति जगाती हैं। इसलिए सकारात्मक संगति मन को शांत करती है, जबकि नकारात्मक संगति तनाव और चिड़चिड़ापन बढ़ाती है। इसे भावनात्मक संक्रमण (Emotional Contagion) कहा जाता है, जिसे सेवा अपने उच्चतर स्वरूप में पवित्र कर देती है — जहाँ दूसरों के दुःख से जुड़कर मन उदासी नहीं, बल्कि करुणा का स्रोत बन जाता है।
युवा और ब्रह्मचर्य
भारत आज अश्लील सामग्री (Pornography) देखने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है, जहाँ लगभग 70% दर्शक 18–34 वर्ष के बीच हैं। इसका प्रभाव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी दिख रहा है — महिलाओं के प्रति असम्मान, विवाहेतर संबंधों में वृद्धि और बलात्कार जैसे अपराधों में बढ़ोतरी। अश्लील सामग्री देखने से आनंद हार्मोन (Dopamine) का अत्यधिक स्राव होता है, जिससे मस्तिष्क कृत्रिम सुख का आदी बन जाता है। धीरे-धीरे व्यक्ति भावनात्मक थकान (Emotional Fatigue) और असंतोष का अनुभव करने लगता है.
NIMH (2022) के अनुसार, जिन परिवारों में खुला संवाद और स्नेहपूर्ण माहौल होता है, वहाँ युवाओं में आत्म-नियंत्रण अधिक पाई। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में— ब्रह्मचर्य केवल काम-त्याग नहीं, बल्कि ऊर्जा के पुनर्निर्देशन (redirection of life-force) की प्रक्रिया है।
गीता (6.16–17) में श्रीकृष्ण कहते हैं —
“युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।”
अर्थात् — “जो व्यक्ति अपने आहार-विहार और कर्मों में संयमित है, वही जीवन में स्थिरता प्राप्त करता है।” Stanford Neuroscience (2017) के अनुसार, ब्रह्मचर्य से मानसिक स्पष्टता, एकाग्रता और इच्छाशक्ति बढ़ती है। परंतु इसका सबसे गहरा अर्थ आत्म-स्वीकृति में निहित है — जब युवा यह समझता है कि उसकी ऊर्जा अपराध नहीं, बल्कि सृजन का स्रोत है, तब वह अपराधबोध से मुक्त होकर सजगता की ओर बढ़ता है।
आधुनिक युग में “धृति” ही मानसिक स्वास्थ्य का मर्म है, जो संगति से दिशा, सेवा से उद्देश्य, संवाद से सहारा, और संयम से गरिमा पाकर धीरे-धीरे संवर्धित होती है — और अंततः व्यक्ति को आत्मिक स्थिरता, मानसिक पुष्टता और जीवन-संतुलन प्रदान करती है।
(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

