बीमा से क्यों दूर है आम भारतीय
- डॉ. सत्यवान सौरभ
भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है। ऊंची विकास दर, डिजिटल क्रांति, बढ़ती आय और वैश्विक मंच पर मजबूत होती स्थिति- ये सब संकेत देते हैं कि देश आर्थिक रूप से आगे बढ़ रहा है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक सच्चाई ऐसी भी है, जो अक्सर नजरों से ओझल रह जाती है- भारत का आम नागरिक अब भी आर्थिक सुरक्षा के सबसे बुनियादी साधन यानी बीमा से दूर है। विडंबना यह है कि जिस देश में अनिश्चितताओं की भरमार है- बीमारी, दुर्घटना, प्राकृतिक आपदाएं, रोजगार की अस्थिरता- वहीं बीमा को अब भी अतिरिक्त खर्च समझा जाता है, न कि जरूरी सुरक्षा कवच।
भारत में बीमा कवरेज की स्थिति संतोषजनक नहीं है। बीमा घनत्व और पैठ दोनों वैश्विक औसत से नीचे हैं। ग्रामीण भारत, जो देश की बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, वहां बीमा की पहुंच बेहद सीमित है। जीवन बीमा के कुछ प्रसार के बावजूद स्वास्थ्य, फसल और संपत्ति बीमा की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्यों है कि विकास की रफ्तार के साथ बीमा का दायरा नहीं बढ़ पा रहा?
इसका पहला और सबसे बड़ा कारण है- जागरूकता की कमी। देश के बड़े हिस्से को आज भी यह समझ नहीं है कि बीमा आखिर है क्या और यह उनके जीवन में किस तरह सुरक्षा प्रदान कर सकता है। गांवों में तो बीमा को अक्सर ठगी या धोखे के रूप में देखा जाता है। एजेंटों द्वारा गलत जानकारी देना, पॉलिसी की शर्तों को स्पष्ट न करना और क्लेम के समय होने वाली परेशानियां लोगों के मन में अविश्वास पैदा करती हैं। परिणामस्वरूप, लोग बीमा से दूरी बनाए रखना बेहतर समझते हैं।
दूसरा बड़ा कारण है, आर्थिक प्राथमिकताएं। जब किसी परिवार की आय सीमित हो और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करना ही चुनौती हो, तब बीमा जैसी चीज उनके लिए प्राथमिकता में नहीं आती। आम भारतीय के लिए पहले भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास की जरूरतें हैं; बीमा उसके बाद आता है। यह सोच गलत नहीं है लेकिन यह भी सच है कि एक छोटी-सी दुर्घटना या बीमारी पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति को हिला सकती है और यही वह जगह है जहां बीमा की जरूरत सबसे ज्यादा होती है।
तीसरा कारण है, बीमा उत्पादों की जटिलता। बीमा कंपनियों द्वारा पेश किए जाने वाले उत्पाद आम लोगों की समझ से परे होते हैं। लंबी-चौड़ी शर्तें, तकनीकी भाषा और अस्पष्ट लाभ- ये सब मिलकर बीमा को एक कठिन और उलझा हुआ उत्पाद बना देते हैं। एक साधारण व्यक्ति के लिए यह समझना मुश्किल होता है कि कौन-सी पॉलिसी उसके लिए सही है। इस जटिलता का फायदा कई बार एजेंट उठाते हैं और ग्राहक को ऐसी पॉलिसी बेच दी जाती है, जो उसकी जरूरतों के अनुकूल नहीं होती।
इसके साथ ही, दावा निपटान की प्रक्रिया भी बीमा से आमजनों की दूरी का एक बड़ा कारण है। अक्सर सुनने को मिलता है कि क्लेम के समय कंपनियां तकनीकी कारणों का हवाला देकर दावे खारिज कर देती हैं या प्रक्रिया को इतना लंबा कर देती हैं कि ग्राहक थक हार कर पीछे हट जाता है। इस तरह के अनुभव समाज में तेजी से फैलते हैं और लोगों के मन में धारणा बन जाती है कि बीमा केवल पैसे वसूलने का माध्यम है, न कि संकट के समय सहायता का।
वितरण प्रणाली की कमजोरी भी अहम कारण है। बीमा अब भी बड़े पैमाने पर एजेंट आधारित मॉडल पर निर्भर है, जिसकी पहुंच सीमित है। ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में एजेंटों की कमी है और जहां हैं भी, वहां उनकी प्राथमिकता कमीशन कमाना होता है, न कि ग्राहक को सही सलाह देना। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के आने से स्थिति में कुछ सुधार जरूर हुआ है लेकिन डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण इसका लाभ हर वर्ग तक नहीं पहुंच पा रहा।
इन सबके बीच सामाजिक और सांस्कृतिक कारक भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। भारतीय समाज में अक्सर भविष्य की अनिश्चितताओं को “भगवान की मर्जी” मान लिया जाता है। जोखिम प्रबंधन की सोच अभी भी व्यापक नहीं हो पाई है। लोग यह मानते हैं कि बुरा वक्त आएगा तो किसी न किसी तरह संभाल लिया जाएगा- पर यह सोच कई बार भारी पड़ जाती है।
हालांकि, हाल के वर्षों में सरकार ने बीमा को बढ़ावा देने के लिए कई पहलें की हैं। प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (पीएमजेजेबीवाई), प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (पीएमएसबीवाई) और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने गरीब और निम्न आय वर्ग को बीमा के दायरे में लाने की कोशिश की है। इन योजनाओं ने यह साबित किया है कि यदि बीमा सस्ता, सरल और सुलभ हो तो लोग इसे अपनाने के लिए तैयार हैं। लेकिन इन योजनाओं का दायरा अभी भी सीमित है और व्यापक स्तर पर बदलाव लाने के लिए और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है।
हाल ही में पारित ‘बीमा कानून संशोधन विधेयक, 2025’ इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेष रूप से प्रबंध महाधिवक्ता (एमजीए) की अवधारणा बीमा क्षेत्र में नई संभावनाएं खोल सकती है। एमजीए स्थानीय स्तर पर काम करते हुए बीमा उत्पादों को अधिक प्रासंगिक और सुलभ बना सकते हैं। इससे वितरण प्रणाली मजबूत होगी, उत्पादों में नवाचार आएगा और दावा निपटान की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बन सकती है। यदि इसे सही ढंग से लागू किया गया तो यह बीमा क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।
केवल नीतिगत सुधार पर्याप्त नहीं हैं। असली चुनौती इन सुधारों को जमीन पर उतारने की है। इसके लिए सबसे पहले बीमा को उत्पाद नहीं, बल्कि अधिकार के रूप में स्थापित करना होगा। जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य को मौलिक जरूरत माना जाता है, वैसे ही बीमा को भी सामाजिक सुरक्षा के एक अनिवार्य हिस्से के रूप में स्वीकार करना होगा।
जागरूकता अभियान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। स्कूलों और कॉलेजों में वित्तीय साक्षरता को बढ़ावा देना, मीडिया के माध्यम से सरल भाषा में बीमा की जानकारी देना और स्थानीय स्तर पर जागरूकता कार्यक्रम चलाना जरूरी है। इसके साथ ही, बीमा उत्पादों को सरल और पारदर्शी बनाना होगा, ताकि आम व्यक्ति बिना किसी भ्रम के सही निर्णय ले सके।
नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि बीमा कंपनियां ग्राहकों के हितों को प्राथमिकता दें, दावा निपटान की प्रक्रिया को सरल और समयबद्ध बनाएं और किसी भी प्रकार के दुरुपयोग पर सख्त कार्रवाई करें। डिजिटल तकनीक का उपयोग इस दिशा में सहायक हो सकता है, लेकिन इसके साथ डेटा सुरक्षा और गोपनीयता का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।
अंततः, यह समझना होगा कि बीमा केवल एक वित्तीय उत्पाद नहीं, बल्कि एक सामाजिक सुरक्षा तंत्र है। यह उस भरोसे का नाम है, जो व्यक्ति को अनिश्चितताओं के बीच भी स्थिर रहने की शक्ति देता है। जब तक यह भरोसा मजबूत नहीं होगा, तब तक बीमा का दायरा सीमित ही रहेगा।
भारत के लिए “सबका बीमा, सबकी रक्षा” केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक आवश्यकता है। अगर देश को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है तो हर नागरिक को आर्थिक रूप से सुरक्षित करना होगा। यह तभी संभव है, जब बीमा को आम भारतीय के जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए। वरना विकास की यह दौड़ अधूरी रह जाएगी, जहां चमक तो होगी लेकिन सुरक्षा का साया नहीं।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

