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बंगाल की जनता ने उगाया भाग्योदय का नया सूर्य

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बंगाल की जनता ने उगाया भाग्योदय का नया सूर्य


-जितेन्द्र तिवारी

सुदूर अमरीका में जा बसे एक भारतवंशी मित्र ने मुझे कल रात (मतगणना से पूर्व) एक संदेश भेजा- ‘क्या मोदी-शाह भारतीय बंगाल को पुनः भारत में विलय करा पाएंगे?’ भारत भूमि से बहुत दूर एक भारतीय की चिंता ने पश्चिम बंगाल की वास्तविक स्थिति को एक लाइन में व्यक्त कर दिया था। मैंने उन्हें आश्वस्त किया था, बंगाल में भाजपा अभी नहीं तो कभी नहीं का आह्वान करके मैदान में उतरी थी। इससे अनुकूल परिस्थिति हो ही नहीं सकती। बाकी.. बंगाल और बंगाली समाज का भाग्य!

बंगाल की जनता का वंदन...साफ कहें तो बंगाल के हिन्दुओं का अभिनंदन कि उन्होंने अपने आत्मबोध को जगाया और जिस धरती ने पूरे भारत को क्रांति और अखंडता का संदेश दिया था, उसका स्वाभिमान फिर से जगाया। चार मई की शाम होते-होते बंगाल से आने वाले ढोल नगाड़ों के नाद और उड़ते गुलाल ने केवल एक राज्य ही नहीं बल्कि पूरे देश की राष्ट्रभक्त और रामभक्त लोगों के मन को भाव विभोर कर दिया, उल्लास से भर दिया। यह भले एक राज्य के शासन के लिए चुनाव हो पर इस परिणाम का बहुत दूरगामी प्रभाव होगा।

बंगाल की वह धरती जिसने इस देश की आजादी का महामंत्र वन्देमातरम् दिया, जहां से पैदा हुई क्रांति की ज्वाला ने देश में ज्वार पैदा किया, जिस धरती पर जन्मे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसे महान क्रांतिकारी ने आजाद हिन्द का सपना जन-जन की आखों में जगाया, मां काली के भक्त परमहंस रामकृष्ण दास के शिष्य स्वामी विवेकानंद ने विश्व गगन पर हिन्दुत्व की आध्यात्मिक शक्ति का नाद ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’ गुंजाया, उस बंगाल के बारे में यह संशय, यह चिंता, पिछले 33 साल के कम्युनिस्ट कुशासन और अब 15 साल में ममता बनर्जी के तुष्टीकरण शासन से उपजी थी।

मुझे अच्छे से याद है कि जब ममता बनर्जी कम्युनिस्टों की हिंसक और खूनी सरकार के खिलाफ संघर्ष कर रही थीं तब वे हिंसा के शिकार कुछ लोगों को दिल्ली लेकर आई थीं। दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के सभागार में हुए उस आयोजन का संचालन मैंने (इन पंक्तियों के लेखक) ही किया था, जिसमें उन लोगों को प्रदर्शित किया गया था जिनके हाथ कलाइयों से काट दिए गये थे। उनका कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने तृणमूल कांग्रेस को वोट दिया था। उस समय ममता बनर्जी कांग्रेस से अलग होकर केन्द्र में अटल जी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार का समर्थन कर रहीं थीं। ममता बनर्जी ने जो उन दिनों संघर्ष किया, उसके लिए उन्हें जितनी प्रताड़ना सहनी पड़ी, उसी के लिए मैंने उस दिन उन्हें बार-बार बंगाल की शेरनी कहकर संबोधित किया था।

उस संघर्ष के बल पर कम्युनिस्टों के खूनी राज को उखाड़ कर सत्ता में पहुंची बंगाल की वह शेरनी मात्र 5 साल बाद ही अपनों के लिए ही खूंखार होने लगी थी। सत्ता पाने के बाद ममता बनर्जी का एक दूसरा ही रूप सामने आया, जो तुष्टिकरण की पराकाष्ठा तक पहुंच गया था। मां, माटी और मानुष का नारा लगाकर सत्ता में पहुंचीं ममता बनर्जी के लिए अब मुल्ला, मुअज्जिन और मदरसा ही सब कुछ हो गए थे। यही वजह है कि कभी भारत की स्वतंत्रता की आवाज उठाने वाली धरती से यह सुनाई देने लगा था कि यह मिनी पाकिस्तान है या यह बांग्लादेश है। जो बाबर कभी बंगाल की धरती तक नहीं पहुंचा, उसके नाम पर बाबरी मस्जिद बनाने की कसम खाने वाले वहां पैदा होने लगे थे। बंगाली महिलाओं की इज्जत दांव पर लगी थी और एक महिला मुख्यमंत्री की यह निर्लज्ज टिप्पणी थी कि अगर सुरक्षित रहना है तो रात के अंधेरे में घर से न निकलो।

मां काली का भक्त हिन्दू समाज चुप रहकर, भौचक होकर आश्चर्य से देख रहा था कि वोट बैंक की राजनीति में अंधी हो गई ममता बनर्जी को उनकी पीड़ा क्यों नहीं दिख रही है। आखिर क्या वजह है कि हिन्दू स्वाभिमन का उद्घोष ‘जय श्रीराम’ का नारा ममता के कानों में शीशे के घोल सा महसूस होता है। बंग भंग के आंदोलन से लेकर नोआखली के दंगों और विभाजन की त्रासदी को सहकर भी जो बंगाली समाज परम्परागत रूप से राष्ट्रभक्ति के रस में सराबोर रहा, उसके लिए यह सारी परिस्थितियां असहनीय थीं।

ऐसे में भारतीय जनता पार्टी ने उनकी पीड़ा को समझा। उसने पाया कि ममता बनर्जी एक तरफ तुष्टिकरण, दूसरी तरफ भ्रष्टाचार और तीसरे परिवारवाद के चंगुल में पड़कर केवल बंगाल ही नहीं बल्कि एक प्रकार से राष्ट्रवाद और भारत का भी अहित करने लगीं हैं। तब नरेन्द्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व, अमित शाह की कुशल कूटनीति और पूरे भाजपा संगठन और उसके कार्यकर्ताओं के अनथक परिश्रम ने बंगाल की राष्ट्रभक्त जनता के मन में विश्वास पैदा किया। उस विश्वास को पाकर ही बंगाल की राष्ट्रभक्त जनता ने अपने ऊपर से उस शासन को उखाड़ फेंका जिसमें वे घुट-घुट कर जी रहे थे। वे खुलकर अपने राष्ट्रभक्त होने का, हिन्दू होने का, रामभक्त होने का और यहां तक कि भारतीय होने का गर्व नहीं व्यक्त कर पा रहे थे। वे एक प्रकार से अघोषित मुस्लिम व्यवस्था के तले पिसता हुआ सा महसूस कर रहे थे। चार मई को जो परिणाम आया है वह इस बात की आश्वस्ति प्रदान करता है कि भारत का बंगाल हमेशा भारत का ही बंगाल रहेगा। बंगाल की संघर्षशील, क्रांतिकारी और राष्ट्रभक्त जनता ने लगभग 50 साल तक तीन धाराओं (कांग्रेस, कम्युनिस्ट और तृणमूल) में चलकर देख लिया है। स्वतंत्रता के बाद पहली बार बंगाल की धरती पर राष्ट्रवाद का नया स्रोत फूटा है, जिससे निकली धारा में उस राज्य के भविष्य के बारे में कोई संशय नहीं रहेगा और भारत के भाग्योदय का सूर्य भी और प्रखरता से चमक उठेगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / जितेन्द्र तिवारी