पत्रकारिता केवल माइक या कैमरे का खेल नहीं
डॉ. प्रियंका सौरभ
आज डिजिटल युग में सूचना का प्रवाह पहले से कहीं अधिक तेज और व्यापक हो चुका है। स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट ने हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति का मंच दे दिया है। एक ओर यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत है, वहीं दूसरी ओर यह स्थिति कई गंभीर चुनौतियां भी लेकर आई है। विशेषकर तब, जब कुछ लोग मात्र 100–200 रुपये के माइक और कैमरे के सहारे स्वयं को पत्रकार घोषित कर लेते हैं और बिना किसी जिम्मेदारी के सूचनाएं प्रसारित करने लगते हैं। यह समस्या केवल व्यक्तियों की नहीं, बल्कि उस सोच की है, जो पत्रकारिता को एक जिम्मेदार सामाजिक दायित्व की बजाय व्यूज और लाइक्स के खेल में बदल देती है।
डिजिटल मीडिया ने पत्रकारिता को लोकतांत्रिक बनाया है। अब केवल बड़े मीडिया हाउस ही सूचना के वाहक नहीं रहे, बल्कि आम नागरिक भी घटनाओं को रिकॉर्ड कर समाज के सामने ला सकते हैं। कई बार यही नागरिक पत्रकारिता उन मुद्दों को उजागर करती है, जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया नजरअंदाज कर देता है। यह बदलाव लोकतंत्र के लिए शक्ति का स्रोत भी है, क्योंकि इससे आवाजों की विविधता बढ़ती है और सत्ता के हर स्तर पर जवाबदेही की मांग मजबूत होती है। लेकिन यही खुलापन जब बिना जिम्मेदारी के इस्तेमाल होता है, तो यही ताकत कमजोरी में बदल जाती है।
आज सोशल मीडिया पर वायरल होना ही सफलता का पैमाना बन गया है। इस दौड़ में कुछ लोग विवाद, सनसनी और अधूरी जानकारी के सहारे लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश करते हैं। वे जानते हैं कि तीखी भाषा, आरोप और उत्तेजना लोगों का ध्यान खींचती है, इसलिए वे तथ्यों की बजाय भावनाओं को उकसाने पर अधिक जोर देते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि समाज में भ्रम फैलता है और सच-झूठ के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। लोग बिना पुष्टि किए ही किसी भी सूचना को सच मान लेते हैं, जिससे अफवाहें तेजी से फैलती हैं और उनका प्रभाव गहरा होता जाता है।
इसका सीधा असर सरकारी संस्थाओं पर भी पड़ता है। सरकारी संस्थाएं किसी भी राष्ट्र की प्रशासनिक रीढ़ होती हैं और उनका उद्देश्य जनसेवा है। यदि उनके बारे में गलत या भ्रामक जानकारी फैलती है, तो जनता का विश्वास कमजोर होता है। यह विश्वास किसी एक खबर से नहीं, बल्कि लगातार फैलती अधूरी या भ्रामक सूचनाओं से धीरे-धीरे क्षीण होता है। परिणामस्वरूप, लोग व्यवस्था पर संदेह करने लगते हैं, जो अनावश्यक टकराव और असंतोष को जन्म दे सकता है। यह भी उतना ही सच है कि सरकारी संस्थाएँ त्रुटिहीन नहीं हैं, लेकिन उनकी कमियों को उजागर करने का तरीका तथ्यपूर्ण और जिम्मेदार होना चाहिए, न कि केवल सनसनी के लिए।
हर छोटे माइक वाले व्यक्ति को नकली पत्रकार कहना भी उतना ही गलत है, जितना हर वायरल खबर को सच मान लेना। पत्रकारिता का मूल्य उपकरणों से नहीं, बल्कि दृष्टिकोण, ईमानदारी और जिम्मेदारी से तय होता है। कई बार छोटे और स्वतंत्र पत्रकार ही जमीनी सच्चाई सामने लाते हैं, जबकि बड़े संस्थान भी कभी-कभी दबावों में चूक कर बैठते हैं। इसलिए समस्या को “छोटे बनाम बड़े” के रूप में देखने के बजाय “जिम्मेदार बनाम गैर-जिम्मेदार” के रूप में समझना अधिक उचित है। असली संकट पत्रकारिता के मूल्यों में गिरावट का है, जहाँ नैतिकता और तथ्य-जांच की जगह जल्दबाजी और लोकप्रियता ने ले ली है।
समाधान किसी एक कदम में नहीं छिपा है, यह सामूहिक प्रयास से ही संभव है। सबसे पहले समाज को मीडिया साक्षर बनना होगा, ताकि लोग हर सूचना को बिना जांचे-परखे स्वीकार न करें। उन्हें समझना होगा कि किसी खबर की विश्वसनीयता उसके स्रोत, प्रमाण और संदर्भ से तय होती है, न कि उसके वायरल होने से। साथ ही, फर्जी खबर फैलाने वालों पर सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई भी जरूरी है, ताकि यह स्पष्ट संदेश जाए कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ अराजकता नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और भ्रामक कंटेंट पर नियंत्रण के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करना होगा।
पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रशिक्षण और नैतिक मानकों की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है। पत्रकार बनने के लिए औपचारिक डिग्री अनिवार्य नहीं हो सकती, लेकिन बुनियादी समझ, तथ्य-जांच की प्रक्रिया और समाज के प्रति जिम्मेदारी का बोध होना आवश्यक है। इसके साथ ही, जो लोग ईमानदारी और संतुलन के साथ काम कर रहे हैं, उन्हें प्रोत्साहित करना भी उतना ही जरूरी है, ताकि सकारात्मक उदाहरण स्थापित हो सकें।
आज की सबसे बड़ी आवश्यकता संतुलन की है। न तो हर छोटे पत्रकार को खारिज करना उचित है, और न ही हर खबर पर आंख मूंदकर विश्वास करना। हमें यह स्वीकार करना होगा कि सूचना का यह नया युग अवसर और खतरे दोनों लेकर आया है। इसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन इसे सही दिशा जरूर दी जा सकती है—और यह दिशा तभी संभव है जब समाज, मीडिया और शासन तीनों अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को समझें।
अंततः पत्रकारिता केवल माइक या कैमरे का खेल नहीं है, बल्कि यह सत्य के प्रति प्रतिबद्धता है। यदि यह प्रतिबद्धता कमजोर पड़ती है, तो पूरी व्यवस्था प्रभावित होती है। सरकारी संस्थाओं की आलोचना जरूरी है, लेकिन वह तथ्य और संतुलन पर आधारित होनी चाहिए। वहीं, समाज को भी यह समझना होगा कि हर आवाज़ को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता। असली संघर्ष “नकली बनाम असली” का नहीं, बल्कि “सत्य बनाम सनसनी” का है—और इस संघर्ष में वही आगे बढ़ेगा, जो जिम्मेदारी, ईमानदारी और विवेक को अपना आधार बनाएगा।
(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद

