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देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नई चुनौती

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देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नई चुनौती


डॉ. सत्यवान सौरभ

आज सोशल मीडिया हमारे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यू-ट्यूब, व्हाट्सऐप और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से लोग कुछ ही सेकंड में देश-दुनिया की जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। सोशल मीडिया ने सूचना के आदान-प्रदान को आसान बनाया है, लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी सामने आई हैं। अब सूचना का इस्तेमाल केवल लोगों को जानकारी देने के लिए नहीं, बल्कि उनकी सोच और भावनाओं को प्रभावित करने के लिए भी किया जा सकता है। इसी कारण सूचना युद्ध आज राष्ट्रीय सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है।

सूचना युद्ध का अर्थ है ऐसी सूचनाओं का इस्तेमाल करना, जिनके माध्यम से लोगों की सोच, भावनाओं, विश्वास और निर्णयों को प्रभावित किया जा सके। इसमें झूठी खबर, आधी-अधूरी जानकारी, पुरानी तस्वीर या वीडियो को नई घटना से जोड़ना, किसी सही जानकारी को गलत संदर्भ में प्रस्तुत करना और लगातार किसी विशेष संदेश को लोगों तक पहुंचाना शामिल हो सकता है। इसका उद्देश्य हमेशा किसी इमारत या सैन्य ठिकाने को नुकसान पहुंचाना नहीं होता। कई बार इसका उद्देश्य लोगों के मन में भ्रम, डर, गुस्सा या अविश्वास पैदा करना होता है।

सोशल मीडिया ने सूचना युद्ध को बहुत तेज कर दिया है। पहले किसी प्रचार को बड़े स्तर पर फैलाने के लिए अखबार, रेडियो, टेलीविजन या अन्य माध्यमों की आवश्यकता होती थी। आज एक मोबाइल फोन से तैयार किया गया वीडियो कुछ ही मिनटों में हजारों या लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। लोग किसी संदेश को बिना उसकी सच्चाई जाँचे आगे भेज देते हैं। इस कारण गलत सूचना को रोकना कठिन हो जाता है।

भारत जैसे बड़े और विविध देश में यह चुनौती और महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत में अलग-अलग धर्मों, जातियों, भाषाओं और क्षेत्रों के लोग रहते हैं। यदि किसी समुदाय से जुड़ी झूठी या भड़काऊ जानकारी सोशल मीडिया पर फैलती है, तो उसका प्रभाव समाज में तनाव के रूप में दिखाई दे सकता है। किसी छोटी स्थानीय घटना को गलत तरीके से प्रस्तुत करके उसे धार्मिक या सामुदायिक रंग दिया जा सकता है। इससे लोगों के बीच अविश्वास बढ़ सकता है और कानून-व्यवस्था की स्थिति भी बिगड़ सकती है।

सोशल मीडिया पर अफवाहों का प्रभाव कई बार बहुत गंभीर हो सकता है। किसी व्यक्ति पर गलत आरोप लगाने, किसी समुदाय के खिलाफ झूठी बात फैलाने या किसी घटना की गलत तस्वीर प्रस्तुत करने से भीड़ की भावनाएं भड़क सकती हैं। ऐसी स्थिति में पुलिस और प्रशासन को अचानक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ता है। इसलिए संवेदनशील घटनाओं के समय सही और आधिकारिक जानकारी जल्दी उपलब्ध कराना बहुत जरूरी है।

सूचना युद्ध का एक नया रूप डीपफेक है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से किसी व्यक्ति के चेहरे और आवाज को बदलकर नकली वीडियो बनाया जा सकता है। देखने वाले को पहली नजर में यह वास्तविक लग सकता है। यदि किसी नेता, अधिकारी, सेना के अधिकारी या किसी प्रसिद्ध व्यक्ति के नाम से गलत वीडियो प्रसारित किया जाए, तो इससे लोगों में भ्रम पैदा हो सकता है। चुनाव, युद्ध, आतंकवादी घटना या किसी बड़े संकट के समय ऐसी सामग्री विशेष रूप से नुकसानदायक हो सकती है।

सैन्य क्षेत्र में सूचना युद्ध की चुनौती और गंभीर हो जाती है। किसी सैन्य अभियान के दौरान सैनिकों की स्थिति, गतिविधियों, हथियारों या हताहतों से जुड़ी गलत जानकारी फैलाई जा सकती है। पुराने युद्ध के वीडियो को वर्तमान घटना का बताया जा सकता है। किसी नकली सैनिक वीडियो या झूठे बयान को वास्तविक बताकर लोगों के मनोबल को प्रभावित करने का प्रयास किया जा सकता है। इसलिए सुरक्षा से जुड़ी जानकारी को साझा करते समय विशेष सावधानी आवश्यक है।

सूचना युद्ध का संबंध केवल भारत के अंदर की घटनाओं से नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सोशल मीडिया का इस्तेमाल किसी देश की छवि और नीतियों को प्रभावित करने के लिए किया जा सकता है। विभिन्न संगठन या विदेशी नेटवर्क किसी घटना को अपने हित के अनुसार प्रस्तुत कर सकते हैं। सीमा विवाद, आतंकवाद, कश्मीर, आंतरिक अशांति और अन्य संवेदनशील विषयों पर लगातार एक विशेष प्रकार की जानकारी फैलाकर अंतरराष्ट्रीय जनमत को प्रभावित करने की कोशिश की जा सकती है।

सोशल मीडिया पर बॉट और नकली अकाउंट भी एक बड़ी चुनौती हैं। सामान्य व्यक्ति को लग सकता है कि किसी मुद्दे पर बहुत बड़ी संख्या में लोग एक जैसा विचार रख रहे हैं, जबकि वास्तव में कई अकाउंट एक ही समूह द्वारा चलाए जा सकते हैं। एक ही संदेश को बार-बार साझा करके उसे लोकप्रिय दिखाने की कोशिश की जा सकती है। इससे वास्तविक जनमत और कृत्रिम रूप से बनाए गए ऑनलाइन माहौल के बीच अंतर करना मुश्किल हो जाता है।

प्राकृतिक आपदा, महामारी या किसी बड़े संकट के समय भी गलत सूचना गंभीर समस्या बन सकती है। यदि किसी क्षेत्र में बाढ़, भूकंप या किसी अन्य आपदा के बारे में गलत जानकारी फैलती है, तो लोग गलत स्थान पर जा सकते हैं या जरूरी सहायता से वंचित हो सकते हैं। इसी प्रकार स्वास्थ्य से जुड़ी गलत जानकारी लोगों के व्यवहार को प्रभावित कर सकती है। इसलिए संकट के समय विश्वसनीय सूचना व्यवस्था बहुत जरूरी है।

भारत को इस चुनौती से निपटने के लिए तकनीक और संस्थागत क्षमता दोनों को मजबूत करना होगा। फर्जी खबरों, डीपफेक और बॉट नेटवर्क की पहचान के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से संदिग्ध सामग्री की पहचान की जा सकती है, लेकिन अंतिम सत्यापन विशेषज्ञों द्वारा किया जाना आवश्यक है। सरकारी विभागों के बीच बेहतर समन्वय भी जरूरी है ताकि किसी संकट के समय सही जानकारी तेजी से जनता तक पहुँच सके।

सरकार के साथ-साथ सोशल मीडिया कंपनियों की भी जिम्मेदारी है। उन्हें फर्जी अकाउंट, समन्वित गलत सूचना और खतरनाक फर्जी सामग्री की पहचान के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। साथ ही, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकों के अधिकारों का सम्मान करते हुए गलत सूचना से निपटने के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।

इस पूरी प्रक्रिया में आम नागरिक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। किसी भी तस्वीर, वीडियो या संदेश को देखकर तुरंत विश्वास नहीं करना चाहिए। विशेष रूप से धार्मिक, राजनीतिक, सैन्य और सामुदायिक विषयों से जुड़ी सामग्री को आगे भेजने से पहले उसके स्रोत की जांच करनी चाहिए। यदि किसी सूचना पर संदेह हो तो उसे साझा न करना ही सबसे सुरक्षित कदम है।

स्कूलों और विश्वविद्यालयों में डिजिटल और मीडिया साक्षरता को बढ़ावा देना भी आवश्यक है। बच्चों और युवाओं को यह सिखाया जाना चाहिए कि इंटरनेट पर उपलब्ध हर जानकारी सही नहीं होती। उन्हें स्रोत की जांच, तस्वीर और वीडियो की पहचान तथा फर्जी खबरों को समझने की बुनियादी जानकारी दी जानी चाहिए।

अंततः, सूचना युद्ध केवल सरकार, सेना या साइबर सुरक्षा एजेंसियों की समस्या नहीं है। यह पूरे समाज की चुनौती है। आधुनिक समय में देश की सुरक्षा केवल सीमाओं और सैन्य शक्ति से तय नहीं होती, बल्कि लोगों के विश्वास, सामाजिक एकता और सही सूचना तक उनकी पहुँच से भी जुड़ी है। तकनीकी क्षमता, तेज़ और विश्वसनीय सरकारी संचार, मजबूत साइबर सुरक्षा, जिम्मेदार सोशल मीडिया और जागरूक नागरिक मिलकर भारत को सूचना युद्ध की चुनौतियों से अधिक सुरक्षित बना सकते हैं।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद