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तैंतीस हजार फीट की ऊँचाई पर कैप्टन स्मित का ऐतिहासिक शौर्य

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तैंतीस हजार फीट की ऊँचाई पर कैप्टन स्मित का ऐतिहासिक शौर्य


- डॉ दीपक कोहली

दुबई से तेल अवीव की ओर उड़ान भरते फ्लाईदुबई के विमान संख्या एफजेड 1073 के भीतर तैंतीस हजार फीट की अभूतपूर्व ऊँचाई पर जो दिल नहला देने वाली अप्रत्याशित घटना घटी, उसने न केवल समूचे वैश्विक विमानन जगत की सुरक्षा व्यवस्था की चूलें हिला दी हैं, बल्कि मानव इतिहास में अदम्य साहस, असाधारण प्रत्युत्पन्नमति और सर्वोच्च कर्तव्यनिष्ठा की एक ऐसी स्वर्णिम इबारत भी लिख दी है जिसे आने वाली सदियाँ अत्यंत गर्व के साथ याद रखेंगी।

शून्य से कई डिग्री नीचे के तापमान और हवा के प्रचंड दबाव के बीच जब कॉकपिट की संकीर्ण परिधि में मृत्यु साक्षात अट्टहास कर रही थी, तब भारतीय पायलट कैप्टन स्मित मच्छार ने जिस तरह लहूलुहान अवस्था में भी अपने जीवन की अंतिम सांस तक संघर्ष करते हुए एक भीषण त्रासदी को टाला, उसने यह साबित कर दिया कि जब इंसान का संकल्प और कर्तव्यबोध अटूट हो, तो भयानक से भयानक विपत्ति भी उसके आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो जाती है। सह-पायलट के रूप में साथ बैठे व्यक्ति द्वारा अचानक किए गए हिंसक जानलेवा हमले और विमान को जानबूझकर तेज गति से नीचे की ओर धकेल कर भीषण तबाही में बदलने की आत्मघाती साजिश के बीच कैप्टन स्मित ने जिस अद्वितीय वीरता का परिचय दिया, उसने विमान में सवार एक सौ चौहत्तर से अधिक निर्दोष यात्रियों और क्रू सदस्यों के जीवन की रक्षा तो की ही, साथ ही गगन की गहराइयों में मानवता की विजय का एक अमर जयघोष भी किया।

इस समूचे घटनाक्रम को यदि दैनिक जीवन और अंतरराष्ट्रीय उड्डयन सुरक्षा के बहुआयामी परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह केवल एक सनकी व्यक्ति की आपराधिक करतूत या एक पायलट के त्वरित प्रत्युत्तर का सामान्य विवरण भर नहीं है, बल्कि यह संकट प्रबंधन, असीम शारीरिक व मानसिक सहनशक्ति और अंतर-सांस्कृतिक एकजुटता का वह अनुपम उदाहरण है जो यदा-कदा ही देखने को मिलता है। मध्य आकाश में जब विमान पूरी तरह स्वचालित या अर्ध-स्वचालित प्रणालियों के सहारे अपनी निर्धारित गति से बढ़ रहा था, तब किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कॉकपिट की सुरक्षा के लिए बने अभेद्य सुरक्षा किलों के भीतर से ही कोई काल बनकर उभर आएगा। सह-पायलट के सिर पर सवार हुए चरमपंथी अथवा विक्षिप्तता के भूत ने जिस क्षण विमान का नियंत्रण अपने हाथ में लेकर उसे जानबूझकर गहरी गिरावट की ओर मोड़ा, उसी क्षण कॉकपिट के भीतर का वातावरण किसी भयावह दुःस्वप्न में बदल गया।

अचानक हुए इस तीखे हमले में कैप्टन स्मित गंभीर रूप से घायल हो चुके थे, उनके शरीर से अत्यधिक रक्तस्राव हो रहा था और शारीरिक वेदना अपने चरम पर थी, किंतु ऐसे संकट के समय में भी उनका मस्तिष्क और विवेक पूरी तरह जागृत था। एक सामान्य मानव स्वभाव ऐसी स्थिति में भयभीत होकर आत्मसमर्पण कर सकता था या अपनी जान बचाने के लिए रक्षात्मक मुद्रा में आ सकता था, लेकिन कैप्टन स्मित ने अपने व्यक्तिगत अस्तित्व और पीड़ा को एक तरफ रखते हुए केवल उन सैकड़ों जिंदगियों के बारे में सोचा जो उनके निर्णयों पर टिकी हुई थीं।

कैप्टन स्मित द्वारा लहूलुहान अवस्था में भी हमलावर सह-पायलट से लगातार जूझते रहना और उसी घमासान के बीच एक-एक सेकंड का सही उपयोग करते हुए कॉकपिट का सुरक्षित लॉक खोल देना, उनकी रणनीतिक दूरदर्शिता और असाधारण सूझबूझ को दर्शाता है। ग्यारह सितंबर के कुख्यात आतंकवादी हमलों के पश्चात दुनिया भर में नागरिक विमानन के नियमों को सख्त करते हुए कॉकपिट के दरवाजों को इस तरह डिजाइन किया गया था कि बाहर से कोई भी अवांछित व्यक्ति या उपद्रवी किसी भी सूरत में अंदर प्रवेश न कर सके। लेकिन सुरक्षा की यही अभेद्य दीवार उस दिन एक दोधारी तलवार बन चुकी थी, क्योंकि खतरा बाहर से नहीं बल्कि अंदर से पैदा हुआ था।

ऐसे में यदि कैप्टन स्मित अंतिम क्षणों में साहस का परिचय देकर कॉकपिट का आपातकालीन दरवाजा न अनलॉक करते, तो बाहर मौजूद केबिन क्रू और यात्रियों को कभी भी यह अहसास नहीं हो पाता कि कॉकपिट के भीतर कितना भयानक खेल खेला जा रहा है और विमान तेजी से ज़मीन की ओर क्यों गिर रहा है। उनके द्वारा खोले गए उस एक दरवाजे ने बाहर मौजूद ऑफ-ड्यूटी पायलटों, सजग क्रू मेंबर्स और यात्रियों को अंदर घुसने और हमलावर को काबू में करने का वह जीवनरक्षक मार्ग प्रदान किया जिसने इतिहास की एक सबसे दर्दनाक हवाई दुर्घटना को एक अभूतपूर्व विजय गाथा में तब्दील कर दिया।

इस पूरी घटना का एक अत्यंत सुंदर और प्रेरणादायक पहलू वह वैश्विक मानवीय एकजुटता भी है जो संकट के उस महा-समुद्र में स्वतःस्फूर्त होकर उभरी। जब कॉकपिट का दरवाजा खुला और भीतर का भयावह दृश्य सामने आया, तब जातीय, राष्ट्रीय, धार्मिक और वैचारिक सीमाओं से परे हटकर यात्रियों और क्रू मेंबर्स ने एक जैसा साहस दिखाया। भारतीय कैप्टन के बहते खून और उनके अदम्य संघर्ष को देखकर इज़राइली, यूरोपीय और अन्य देशों के यात्रियों ने बिना एक पल की देरी किए कॉकपिट में प्रवेश किया और हमलावर सह-पायलट को दबोच लिया। यह दृश्य इस बात का सजीव प्रमाण है कि जब मानवता पर कोई बड़ा संकट मंडराता है, तो मनुष्य की अंतरात्मा में छिपा भ्रातृत्व और साहस का भाव जागृत हो जाता है और वह हर प्रकार के पूर्वाग्रहों को भुलाकर एक दूसरे की ढाल बन जाता है। सऊदी अरब के तबूक हवाई अड्डे पर विमान की जो सुरक्षित इमरजेंसी लैंडिंग कराई गई, वह केवल यांत्रिक सफलता नहीं थी, बल्कि विभिन्न देशों के पायलटों, एटीसी कंट्रोलर्स और केबिन क्रू के बीच के उस उत्कृष्ट समन्वय का प्रतिफल थी, जिसकी नींव कैप्टन स्मित मच्छार के प्रारंभिक प्रतिकार और बलिदान ने रखी थी।

हालाँकि, इस साहसिक प्रकरण की अपार सफलता और कैप्टन स्मित की वैश्विक प्रशंसा के बीच, यह घटना विश्व भर की विमानन सुरक्षा एजेंसियों और नीति-निर्माताओं के सामने कई यक्ष प्रश्न भी खड़े करती है जिनका उत्तर ढूँढना अब अनिवार्य हो गया है। दशकों से उड्डयन उद्योग का पूरा ध्यान यात्रियों की सघन चेकिंग, सामान की स्कैनिंग और बाहरी खतरों को रोकने पर केंद्रित रहा है। लेकिन जब खतरा खुद उस व्यक्ति से हो जिसे सैकड़ों लोगों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया है, तो फिर सुरक्षा के पैमाने क्या होने चाहिए? उड़ान से पूर्व पायलटों और सह-पायलटों की केवल शारीरिक फिटनेस ही काफी नहीं है, बल्कि उनके मानसिक स्वास्थ्य, उनके अवсад के स्तर, उनके उग्रवादी या चरमपंथी झुकाव और उनके व्यक्तिगत तनावों की निरंतर और वैज्ञानिक जाँच किया जाना समय की सबसे बड़ी माँग बन चुकी है। 'मेंटल हेल्थ स्क्रीनिंग' और 'साइकोलॉजिकल प्रोफाइलिंग' को अब केवल औपचारिकता न मानकर एक अनिवार्य, पारदर्शी और कठोर सुरक्षा मानक के रूप में लागू करना होगा। इसके साथ ही, कॉकपिट के भीतर आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए क्रू ट्रेनिंग के नए प्रोटोकॉल विकसित करने होंगे ताकि भविष्य में यदि कभी कोई सह-पायलट या पायलट अचानक हिंसक या असामान्य आचरण करे, तो उसे तुरंत बेअसर करने की तकनीकी व्यवस्था मौजूद हो।

कैप्टन स्मित मच्छार के इस अद्भुत पराक्रम ने संपूर्ण भारतवर्ष को वैश्विक मंच पर एक बार फिर गर्व से भर दिया है। भारत के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के शीर्ष नेताओं द्वारा उनकी मुक्तकंठ से की गई सराहना केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं है, बल्कि यह उस भारतीय जीवन-मूल्य और संस्कृति का सम्मान है जो 'आत्मनः मोक्षार्थं जगद्धिताय च' तथा 'परोपकारार्थं इदं शरीरम्' के सिद्धांतों पर आधारित है। विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य न खोना, अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी दूसरों के जीवन की रक्षा करना और अपने पद तथा दायित्व के प्रति पूर्णतः निष्ठावान रहना ही एक सच्चे सैनिक और नायक की पहचान होती है। कैप्टन स्मित ने आकाश की असीम ऊँचाइयों में भारतीय चरित्र के इसी उज्ज्वल पक्ष को अपनी निष्ठा और रक्त से रेखांकित किया है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि एक सच्चा लीडर वही होता है जो सबसे विकट परिस्थिति में भी अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर खतरे का सामना करता है और अपने सहयोगियों तथा आश्रितों के लिए एक सुरक्षित मार्ग का निर्माण करता है।

समय के साथ यह घटना पुरानी हो जाएगी, उड़ानों का सिलसिला इसी प्रकार जारी रहेगा और दुनिया अपनी रफ्तार से चलते रहेगी, लेकिन कैप्टन स्मित मच्छार द्वारा कॉकपिट के भीतर दिखाया गया वह साहसिक प्रतिकार उड्डयन इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर हमेशा-हमेशा के लिए अंकित रहेगा। यह गाथा केवल एक दुर्घटना से बचाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर छिपी उस अनंत क्षमता, अदम्य जीजीविषा और निस्वार्थ कर्तव्य-चेतना का एक ऐसा महाकाव्य है जो आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता रहेगा कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी भयावह क्यों न हों, संकट कितना भी विशाल क्यों न हो और मृत्यु कितनी भी निकट क्यों न खड़ी हो, यदि मनुष्य का संकल्प सुदृढ़ है और उसका ध्येय पवित्र है, तो वह अंधकार के सबसे गहरे समंदर को चीरकर भी विजय का उजाला बिखेर सकता है।

कैप्टन स्मित का यह प्रयास आने वाले युगों तक हर उस इंसान के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा जो अपने जीवन में किसी भी प्रकार के भारी संकट, भय या अनिश्चितता का सामना कर रहा होगा, क्योंकि गगन के उस योद्धा ने हमें सिखाया है कि असली नायक वह नहीं जो कभी गिरता नहीं, बल्कि वह है जो गंभीर रूप से घायल होकर भी दूसरों को बचाने के लिए दोबारा खड़ा होता है और इतिहास का रुख मोड़ देता है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश