जीवन की सार्थकता उसकी लंबाई नहीं, मर्यादा में निहित
-हृदयनारायण दीक्षित
अमर रहने की महत्वाकांक्षा पुरानी है। पुराणों में हजारों वर्ष जीने वाले पात्रों के उल्लेख हैं। वैदिक ऋषि अमृत्व प्राप्त करने की स्तुतियां करते थे। ‘असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय।‘ -में अमृत्व की प्यास का उल्लेख है। आधुनिक विश्व में सभी देशों के वैज्ञानिक मनुष्य शरीर की उम्र को रोकने की योजना पर काम कर रहे हैं। वृद्धावस्था में शरीर की कोशिकाओं का क्षरण होता है। इसी को रोकने के लिए तमाम शोध कार्य जारी हैं। इस बीच रूस से महत्वाकांक्षी सूचनाएं आ रही हैं। रूस मनुष्य शरीर की कोशिकाओं के क्षरण को रोकने पर शोध कर रहा है। सूचना के अनुसार रूस वृद्धावस्था को रोकने की शोध पर काम कर रहा है।
सितंबर 2025 में पुतिन और चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग ने मनुष्य शरीर की उम्र 150 साल तक ले जाने की योजना पर शोध की बातें की थीं। पुतिन ने कहा था कि नियमित रूप से कोशिकाओं के क्षरण को रोक कर स्वस्थ बने रहने पर वैज्ञानिक शोध संभव हैं। रूसी वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि वे वृद्धावस्था रोकने की विश्व की पहली एंटी एजिंग वैक्सीन पर काम कर रहे हैं। वृद्धावस्था कोशिकाओं के क्षरण का ही परिणाम होता है। रूस के एक मंत्री डेनिस ने पीछे माह बताया है कि यह प्रायोजित उपचार रेज रिसेप्टर पर जोर देगा। वृद्धावस्था की स्वाभाविक प्रक्रिया को नियंत्रित कर कोशिकाओं को लंबे समय तक युवा बनाए रखा जा सकता है। उनका कहना है कि उनका लक्ष्य दुनिया की पहली जीन थेरेपी दवा बनाना है। इस परियोजना को इंस्टीट्यूट ऑफ एजिंग बायोलॉजी एंड मेडिसिन द्वारा विकसित किया जा रहा है।
रूस के उप प्रधानमंत्री ने कहा था कि रूस की योजना 2028 से 2030 के बीच एंटी एजिंग दवा का उत्पादन शुरु करने का है। बताया गया है कि तकनीक फिलहाल शोध की प्रक्रिया से गुजर रही है। इसका बजट 26 अरब डालर से भी ज्यादा है। उनका दावा है कि फिलहाल इस पर शोध जारी है। अगर यह सफल होता है तो भविष्य में वृद्धावस्था अनिवार्य प्रक्रिया नहीं रहेगी। यह नियंत्रित की जाने वाली स्थिति बन सकती है।
यह एक आश्चर्यजनक शोध की दिशा में मनुष्य जाति का पहला नियोजित अभियान होगा। मनुष्य की आयु 150 वर्ष तक ले जाने की यह महत्वाकांक्षी योजना आश्चर्यजनक है। दीर्घायु रहना-होना सामान्य बात है लेकिन पूरी आयु में स्वस्थ बने रहना वाकई बड़ी उपलब्धि होगी। ऋग्वेद में ‘जीवेत शरदः शतम्‘ की प्रार्थनाएं हैं। सौ साल जीने की इच्छा पर्याप्त नहीं है। इसलिए आगे कहते हैं कि हम 100 वर्ष तक स्वस्थ रहें। दीन-हीन न रहें। बहुत लोग 100 बरस या उससे ज्यादा का जीवन जीते हैं। लेकिन शरीर के क्षरण के कारण कष्ट और दुख में रहते हैं। तो क्या यह शोध मनुष्य के सभी अंगों और सोच विचार के तंत्र को स्वस्थ रखने का महत्वाकांक्षी अभियान बनेगा। इस शोध को लेकर बहुत प्रसन्न होने की आवश्यकता नहीं है। 80-90 वर्ष की आयु वाले वृद्ध परिवार की उपेक्षा के कष्ट भोगते हैं। परिजन बूढ़ों का ध्यान नहीं रखते।
इस शोध की सफलता-असफलता पर तमाम विचार हो सकते हैं। यह एक सांस्कृतिक समस्या है। दुनिया के सभी समाजों में अच्छे मानवीय संबंधों का आधार संस्कृति है। यहां जीवन को लंबा करने के प्रयास हैं। लेकिन दर्शन और विज्ञान काल की व्याख्या भी करता है। काल का पहिया घूम रहा है। हम सब काल रथ पर बैठे यात्री हैं। अथर्ववेद में भृगु ऋषि का सारवान वक्तव्य है- ”कालरथ पर ज्ञानी ही बैठते हैं।” मैं कालरथ को देख रहा हूँ। उस रथ का घर्घर नाद भी सुनता हूँ। वह प्रतिपल हमारे सामने से ही गुजरता है। मैं हाथ उठाता हूँ। रुकने की प्रार्थना करता हूँ। वह नहीं रुकता। मेरी परवाह नहीं करता। जानता हूँ कालरथ में ज्ञानी ही बैठते हैं। हमारे लिए उस रथ में जगह नहीं हो सकती। क्या विज्ञान में काल की समस्या का कोई समाधान है? काल निर्वचन कठिन काम है।
हमारे ग्रंथों में ऋषियों की आयु 100 वर्ष बताई गई है किंतु उनका मार्ग ‘बाहरी रसायनों‘ का नहीं बल्कि ‘भीतरी रूपांतरण‘ का था। प्राणायाम की विधियाँ शरीर की जैविक घड़ी को नियंत्रित करने की प्राचीन तकनीकें थीं। वैज्ञानिक शोध अब मान रहे हैं कि गहरी और लंबी सांसें हमारे जीवन-सूत्रों की रक्षा करती हैं। ऋषियों ने बिना किसी भारी-भरकम वित्तीय सहायता के, केवल अंतर्मुखी होकर उस ‘अमृत तत्व‘ को खोज लिया था। प्राचीन भारत में ‘कायाकल्प‘ की प्रक्रिया का वर्णन मिलता है, जहाँ विशेष जड़ी-बूटियों से वृद्ध शरीर को पुनः युवा किया जाता था। रूस का प्रयोग जहाँ अवरोधकों पर काम करता है, वहीं भारतीय पद्धति पंच तत्वों के संतुलन पर बल देती थी। यदि आधुनिक जीव-विज्ञान के साथ योग को जोड़ दिया जाए तो दीर्घायु एक पूर्ण स्वास्थ्य का मार्ग बन सकती है।
लंबी आयु का अर्थ अनुभवों का विशाल भंडार भी है। यदि कोई मनीषी एक सौ पचास वर्ष जीता है तो वह शोध को नई ऊँचाई दे सकता है। लेकिन क्या मानव मस्तिष्क एक शताब्दी से अधिक की स्मृतियों का बोझ सहने के लिए तैयार है? क्या हम विस्मृति जैसे विकारों के बिना इस दीर्घायु का आनंद ले पाएंगे? अक्सर पुरानी पीढ़ी नए विचारों का विरोध करती है। ऐसे में समाज का बौद्धिक जड़त्व बढ़ सकता है। पारिवारिक रिश्तों की मर्यादा भी इससे अछूती नहीं रहेगी। वैवाहिक संबंधों के स्थायित्व पर नए प्रश्न खड़े होंगे। माता-पिता और संतान के बीच जब एक सौ वर्ष का अंतर होगा तो संवाद लगभग समाप्त हो जाएगा। हम एक ऐसे अकेलेपन के युग में प्रवेश कर सकते हैं जहाँ शरीर स्वस्थ होगा, पर मन एकाकी। संबंधों में जो ताजगी आज है, वह शायद इस दीर्घ जीवन में न बचे। मनुष्य का अस्तित्व उसके संबंधों से परिभाषित होता है। जब संबंध बोझ बनने लगें तो लंबी आयु कारावास बन जाती है।
यह प्रयोग वैज्ञानिक जिज्ञासा की पराकाष्ठा है, किंतु इसे विवेक की कसौटी पर कसना अनिवार्य है। केवल आयु का बढ़ना पर्याप्त नहीं है बल्कि उसकी गुणवत्ता महत्वपूर्ण है। जैसा कि हमारा दर्शन मानता है, ‘जीवेम शरदः शतम‘ का अर्थ केवल सौ वर्ष जीना नहीं बल्कि सौ वर्ष तक चैतन्य रहकर योगदान देना है। रूस का यह शोध यदि मनुष्य को केवल एक अमर ‘उपभोक्ता‘ बनाता है, तो यह प्रकृति के विरुद्ध अपराध होगा। लेकिन यदि यह वृद्धों को पीड़ा से मुक्त कर उन्हें पुनः सृजनशील बनाता है तो यह विज्ञान का उपहार होगा। जीवन की सार्थकता उसकी लंबाई में नहीं, बल्कि उसकी गहराई और मर्यादा में निहित है।
(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

