खादी का वैश्विक पुनर्जागरण
मनोज गोयल
“कुछ नेता सत्ता तक पहुँचते हैं, कुछ को इतिहास इसके लिए चुनता है।” भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसे क्षण विरले आते हैं, जब किसी व्यक्ति का नेतृत्व केवल राजनीतिक घटना नहीं रह जाता बल्कि वह राष्ट्र के सामूहिक संकल्प और राष्ट्रीय परिवर्तन का माध्यम बन जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व ऐसे ही परिवर्तनकारी दौर का प्रतिनिधित्व करता है; एक ऐसा नेतृत्व जिसने भारत की आत्मा, आत्मविश्वास और वैश्विक पहचान को नई दिशा देने का प्रयास किया है।
नियति का नेतृत्व केवल सरकार चलाने का नाम नहीं होता; यह किसी राष्ट्र की सुप्त, अंतर्निहित और अप्रकट संभावनाओं को पहचान कर उन्हें जन-आंदोलन में बदलने की क्षमता है। मोदी के नेतृत्व की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक यह रही है कि उन्होंने भारत की परंपराओं को अतीत की स्मृतियों के रूप में नहीं बल्कि भविष्य की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक शक्ति के रूप में देखा है। इस विचार को मोदी ने ‘वोकल फॉर लोकल’ के माध्यम से जन-आंदोलन का स्वरूप दिया। यह केवल स्थानीय उत्पाद खरीदने का आह्वान नहीं था बल्कि भारत के कारीगर, किसान, उद्यमी और निर्माता के श्रम पर गर्व करने का आह्वान था। यदि इस परिवर्तन की सबसे सशक्त अभिव्यक्तियों में किसी एक का नाम लिया जाए तो वह है- खादी। बापू की विरासत- खादी।
15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने पिछले 12 वर्षों में भारत की परिवर्तन यात्रा का रिपोर्ट कार्ड प्रस्तुत किया। इस अवसर पर उन्होंने खादी एवं ग्रामोद्योग क्षेत्र की वृद्धि को लगभग पाँच गुना बताते हुए इसे भारत की बढ़ती क्षमता और आत्मनिर्भरता के व्यापक परिवर्तन के साथ जोड़ा। यह उल्लेख सिर्फ एक आर्थिक उपलब्धि का उल्लेख नहीं था। इसके पीछे एक बड़ी सोच दिखाई देती है; जब राष्ट्र अपनी क्षमता पर विश्वास करता है, अपने श्रम का सम्मान करता है और अपने उत्पादों को अपनाता है तो वही विश्वास आर्थिक शक्ति में बदलता है। यही प्रधानमंत्री के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘विकसित भारत’ के संकल्प का मूल भाव है।
कभी खादी स्वतंत्रता आंदोलन में स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक थी। आज मोदी के नेतृत्व में वही खादी नवभारत की आकांक्षाओं, आत्मनिर्भरता, रोजगार, महिला सशक्तिकरण, सतत विकास और स्थानीय से वैश्विक बनने की यात्रा की सशक्त पहचान बन रही है। खादी का यह पुनर्जागरण किसी एक योजना या किसी एक बाजार की सफलता की कहानी नहीं है। यह प्रधानमंत्री मोदी के अद्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय नेतृत्व की कहानी है जिसने एक लगभग भुला दी गई आर्थिक और सामाजिक शक्ति ‘खादी और ग्रामोद्योग’ में फिर से विश्वास जगाया और उसे करोड़ों भारतीयों की भागीदारी से एक नए आंदोलन में बदल दिया।
प्रधानमंत्री मोदी के ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘लोकल टू ग्लोबल’ और ‘विकसित भारत’ के व्यापक दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए अब आवश्यकता इस बात की है कि भारत की प्रत्येक स्थानीय विरासत को उसकी आर्थिक शक्ति में बदला जाए। इसी सोच के साथ मैं EZEV—“एक ज़िला, एक विरासत” की अवधारणा प्रस्तुत करता हूँ। EZEV केवल एक योजना नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय सोच का विस्तार है जिसमें भारत के प्रत्येक जिले की विशिष्ट कला, खादी, ग्रामोद्योग, पारंपरिक कौशल और स्थानीय उद्यमिता को उसकी आर्थिक पहचान बनाया जा सकता है। आधुनिक डिजाइन, डिजिटल तकनीक, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, ब्रांडिंग, ई-कॉमर्स और वैश्विक बाजार से जोड़कर स्थानीय विरासत को वैश्विक अवसर में बदला जा सकता है।
EZEV का मूल मंत्र है- “हर ज़िले की पहचान, हर कारीगर का सम्मान और हर विरासत को वैश्विक बाज़ार।” जब किसी जिले की विरासत विश्व के बाजार तक पहुँचती है, तब केवल किसी उत्पाद का निर्यात नहीं होता; उसके साथ भारत की संस्कृति, सृजनशीलता, श्रम और आत्मविश्वास भी दुनिया तक पहुँचता है। यही ‘लोकल टू ग्लोबल’ का वास्तविक अर्थ है और यही विकसित भारत की नई आर्थिक शक्ति का आधार बन सकता है। इस परिवर्तन को स्थायी और भविष्य उन्मुख बनाने के लिए खादी क्षेत्र में संस्थागत एवं तकनीकी आधारभूत संरचना को भी सुदृढ़ किया जा रहा है। देशभर में पूनी संयंत्रों के आधुनिकीकरण एवं नवीनीकरण के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी अवसंरचना में व्यापक सुधार किए जा रहे हैं, जिससे उत्पादन, गुणवत्ता, पारदर्शिता और विपणन व्यवस्था को नई गति मिल रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने अनेक अवसरों पर खादी को स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत के व्यापक विचार से जोड़ा है। ‘मन की बात’ से लेकर राष्ट्रीय मंचों तक उन्होंने नागरिकों से खादी और स्थानीय उत्पादों को अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने खादी को केवल पहनने की वस्तु के रूप में नहीं, बल्कि भारत के कारीगरों के श्रम और देश की आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के साथ जोड़कर देखने का आग्रह किया। प्रधानमंत्री की ब्रांड शक्ति से आज खादी एवं ग्रामोद्योग क्षेत्र का कारोबार 1.87 लाख करोड़ रुपये के ऐतिहासिक स्तर तक पहुँच चुका है और हमारा अगला लक्ष्य इसे 2.51 लाख करोड़ रुपये तक ले जाना है। यह क्षेत्र 2 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार उपलब्ध करा रहा है। लगभग 12 वर्ष पहले चरखे पर सूत कातने पर प्रति हैंक मजदूरी जहाँ मात्र 4 रुपये हुआ करती थी, वहीं आज इसे बढ़ाकर 15 रुपये प्रति हैंक किया जा चुका है। यह परिवर्तन केवल आय में वृद्धि नहीं, बल्कि उस नेतृत्व की प्राथमिकता का परिणाम है जिसे नियति ने खादी के लिए तय किया है। जिसके केंद्र में अंतिम व्यक्ति और कारीगर है।
प्रधानमंत्री के नेतृत्व में स्वदेशी की यह नई सोच केवल बाजार तक सीमित नहीं है। यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, महिला शक्ति को आर्थिक अवसर देने, युवाओं को उद्यमिता से जोड़ने और पारंपरिक कौशल को आधुनिक तकनीक से जोड़ने का व्यापक प्रयास है। यही कारण है कि आज खादी केवल चरखे तक सीमित नहीं है। यह आधुनिक फैशन, डिजाइन, डिजिटल कॉमर्स, नवाचार और वैश्विक बाजार की भाषा बोल रही है। परंपरा और प्रौद्योगिकी के बीच जो दूरी कभी दिखाई देती थी, वह धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। प्रधानमंत्री मोदी के आह्वान, ‘खादी फॉर फैशन’, ने खादी को नई पीढ़ी की आकांक्षाओं और आधुनिक जीवनशैली से जोड़ने का एक नया आयाम दिया है। ‘नए भारत की नई खादी’ आज भारत के जेन-जी (Gen-Z) के बीच अपनी अलग पहचान बना रही है। जो पीढ़ी फैशन, डिजिटल संस्कृति, नवाचार और आत्म-अभिव्यक्ति को महत्व देती है, उसके लिए खादी अब केवल विरासत नहीं बल्कि आधुनिक भारतीय पहचान, स्वदेशी गौरव और सतत जीवनशैली का नया प्रतीक बन रही है।
भारत के कारीगर केवल वस्तुएँ नहीं बनाते; वे भारत की सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं को अपने श्रम से जीवंत रखते हैं। उनके हाथों में केवल कौशल नहीं, बल्कि पीढ़ियों का अनुभव, धैर्य, समर्पण और राष्ट्र निर्माण की शक्ति निहित है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में स्वदेशी का पुनर्जागरण तभी पूर्ण होगा, जब इस शक्ति को सम्मान, बाजार और आधुनिक अवसरों से जोड़ा जाएगा।
खादी का हर धागा केवल कपास से नहीं बल्कि किसी कारीगर के परिश्रम, किसी परिवार की आशा और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प से बुना जाता है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में खादी ने जिस पुनर्जागरण की यात्रा शुरू की है, उसका अगला चरण ‘नई खादी’ है। नई खादी केवल नए रंग, नए वस्त्र या नए बाजार का नाम नहीं है। यह उस सोच का विस्तार है जिसमें परंपरा में नवाचार, विरासत में उद्यमिता, कौशल में तकनीक और स्थानीय उत्पादों में वैश्विक संभावनाएँ दिखाई देती हैं। आज आवश्यकता केवल खादी खरीदने की नहीं, बल्कि उस विचार को अपनाने की है जिसके पीछे खादी खड़ी है- आत्मनिर्भरता, रोजगार सृजन, महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण संरक्षण और राष्ट्र निर्माण।
नई खादी की इसी अवधारणा को साकार करने के लिए राष्ट्रीय फैशन प्रौद्योगिकी संस्थान (NIFT) के सहयोग से ‘Centre of Excellence for Khadi 2.0’ (CoEK 2.0) के माध्यम से आधुनिक खादी वस्त्रों के निर्माण की व्यवस्था की गई है। यह केंद्र आधुनिक डिजाइन, अनुसंधान, उत्पाद विकास और फैशन नवाचार के माध्यम से खादी को नई पीढ़ी और नए बाजारों से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
यह परिवर्तन हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देता है; परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। सही नेतृत्व और सही दृष्टि उन्हें एक-दूसरे की शक्ति बना सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने इसी दृष्टि से भारत की विरासत को भविष्य की शक्ति के रूप में देखने का आग्रह किया है। आज खादी का पुनर्जागरण केवल एक आर्थिक उपलब्धि नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जो अपनी जड़ों से जुड़कर दुनिया का नेतृत्व करने का आत्मविश्वास रखता है। यह उस भारत की कहानी है जो अपने कारीगर के श्रम को सम्मान देता है, अपने उत्पाद पर विश्वास करता है और अपने बाजार को अपनी शक्ति में बदलना जानता है।
15 अगस्त को प्रधानमंत्री ने विकसित भारत के संकल्प को दोहराते हुए कहा कि भारत अपने सपनों, संकल्प और सामर्थ्य के बल पर आगे बढ़ेगा। उन्होंने भारत की बढ़ती क्षमताओं और आत्मनिर्भरता को विकसित भारत की यात्रा का आधार बताया। खादी इसी राष्ट्रीय सामर्थ्य का एक जीवंत उदाहरण है। जिस खादी को कभी केवल स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति माना जाता था, वह आज आत्मनिर्भर भारत के आर्थिक आत्मविश्वास की पहचान बन रही है। जिस चरखे को कभी केवल अतीत का प्रतीक समझा जाता था, वही आज कारीगर, तकनीक, डिजाइन, उद्यमिता और वैश्विक बाजार को जोड़ने वाली एक नई कहानी का केंद्र बन सकता है।
मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि हम प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में विकसित हुई स्वदेशी की इस नई चेतना को आगे बढ़ाते हुए परंपरा और प्रौद्योगिकी, विरासत और नवाचार, कारीगर और बाजार को एक सूत्र में पिरो दें, तो भारत केवल विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि विश्व की सबसे बड़ी रचनात्मक, सांस्कृतिक और सतत अर्थव्यवस्था का अगुवा बन सकता है।
नई खादी का भविष्य संग्रहालयों में नहीं, बल्कि युवाओं की सोच, आधुनिक जीवनशैली, वैश्विक फैशन, डिजिटल बाजारों और विकसित भारत के संकल्प में है। इतिहास यह तय करेगा कि इस युग की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ क्या थीं। लेकिन यह निर्विवाद है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में स्वदेशी की भावना ने नए भारत में फिर से जन-आंदोलन का रूप ग्रहण किया है और खादी इस नए स्वदेशी आंदोलन की सबसे सशक्त पहचान बनकर उभरी है।
जब नेतृत्व दूरदर्शी हो तो परंपराएँ भी भविष्य लिखती हैं। और जब राष्ट्र अपनी पहचान पर गर्व करता है, अपने कारीगर पर विश्वास करता है और अपने उत्पाद को दुनिया के सामने आत्मविश्वास से रखता है, तब खादी केवल कपड़ा नहीं रहती; वह भारत के आत्मविश्वास, स्वदेशी चेतना और नवभारत की पहचान बन जाती है। खादी केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकसित भारत के भविष्य की एक सशक्त संभावना है।
(लेखक, खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के अध्यक्ष हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

