केजरीवाल के लिए अंतिम अवसर
मनोज कुमार मिश्र
अगले साल देश के सात राज्यों के विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। यह हैं-पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा, गुजरात और हिमाचल प्रदेश। इनमें से पंजाब और हिमाचल प्रदेश के अलावा सभी पांचों राज्यों में अभी भाजपा की सरकार है। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में है और दिल्ली में सत्ता जाने के बाद आम आदमी पार्टी(आआपा) केवल पंजाब में सत्ता में है। भाजपा तो हर राज्य में चुनाव लड़ने और जीतने की रणनीति में लगी हुई है लेकिन इस बार उसका फोकस पंजाब जीतने पर होने वाला है। एक तो हिमाचल प्रदेश वैसे ही भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है, दूसरे हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार शुरू से ही गिरते-पड़ते चल रही है। इसलिए आम धारणा है कि जब भी चुनाव होंगे भाजपा आसानी से चुनाव जीत जाएगी।
भाजपा पंजाब चुनाव को उसी तरह लड़ने वाली है जिस तरह से उसने पश्चिम बंगाल का चुनाव लड़ा और ममता बनर्जी जैसी जमीन से जुड़ी और लड़ाकू महिला को पराजित करके पहली बार जीत हासिल की। चुनाव तो पिछले महीने भी पांच राज्यों के विधानसभा के हुए थे। भाजपा पहले से सत्ता में काबिज असम और पुडुचेरी में जीत हासिल की। केरल में वोट औसत बढ़ने के साथ भाजपा को तीन सीटें मिली। तमिलनाडु में भी भाजपा को वोट औसत बढ़ा। भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए बड़ी उपलब्धि यह रही कि देश में विपक्षी राजनीति का झंडा थामने वाले नेताओं में से ममता बनर्जी की तरह तमिलनाडु मुख्यमंत्री रहे एम के स्टालिन सत्ता से बाहर हो गए। पंजाब चुनाव नतीजे आआपा के पक्ष में न आने पर न केवल आआपा के बिखरने के साथ-साथ बल्कि आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक पारी का समापन भी होने का खतरा है।
आआपा और उसके सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल सत्ता के लिए बने हैं इसे इस राजनीतिक पार्टी के 14 साल के इतिहास ने साबित किया है। समाजसेवी अन्ना हजारे की अगुवाई में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के सहारे राजनीति में आने वाले केजरीवाल ने वह सभी काम किए जो इस देश के आम राजनेता करते रहे हैं या इसके लिए राजनेता बदनाम हैं। कई मामलों में तो केजरीवाल ने परंपरागत दलों के नेताओं को भी पीछे छोड़ दिया है। सत्ता में आने के लिए उन्होंने जो वादे किए थे, सत्ता में आने के बाद सारे आचरण उसके उलट किए। दिल्ली की सत्ता से बाहर होने के बाद भी उनका व्यवहार नहीं बदला। 2025 के विधानसभा चुनाव में जो आरोप मुद्दे बने उसमें शराब घोटाला से लेकर अपने सरकारी आवास को करोड़ों खर्च करके शीश महल बनवाना प्रमुख रहे। बावजूद इसके पूर्व मुख्यमंत्री के नाते मिले सरकारी आवास में उन पर फिर से लाखों रुपये लगाने का आरोप लगा है।
2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने 1974 के बिहार छात्र आंदोलन और उससे लगे आपातकाल के खिलाफ देश भर में हुए आंदोलन को फिर से दोहरा दिया था। पहला विवाद को अन्ना हजारे के मना करने के बावजूद 26 नवंबर,2012 को राजनीतिक पार्टी आआपा बनाने पर हुआ। हजारों पढ़े-लिखे नौजवान देश-विदेश की नौकरी छोड़कर और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में ऊंची हैसियत और मानदंड रखने वालों ने उस आंदोलन में अपना सभी कुछ न्योछावर कर दिया था। सत्ता में आने और अपना असली रंग दिखाने के बाद वही लोग एक-एक करके लोग अलग होने लगे। कुछ को केजरीवाल ने अपमानित करके निकाला। इसकी लंबी शृंखला बनती जा रही है। अभी सबसे बड़ा झटका आआपा के बड़े नाम राघव चड्ढा और संदीप पाठक के साथ दस में से सात राज्य सभा सदस्यों का पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल होने से लगा है। उनमें से एक स्वाति मालीवाल तो काफी समय से तो केवल तकनीकी तौर पर आआपा में थी वे अपने साथ मुख्यमंत्री केजरीवाल के सरकारी आवास में मारापीट होने के बाद से ही अलग हो गई थी। अब आआपा के साथ तीन राज्यसभा और तीन लोकसभा सदस्य हैं।
इन चौदह सालों के घटनाक्रम ने एक बात तो साबित कर दी कि अरविंद केजरीवाल सत्ता के बिना नहीं रह सकते हैं और उनकी महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री बनने की है। भाजपा और कांग्रेस विरोधी अनेक बुद्धिजीवियों के प्रभाव में आकर केजरीवाल ने 2014 में देश भर में लोकसभा चुनाव लड़ना तय किया। भारी पराजय के बाद अपने लोगों के गुस्सा से बचने के लिए जमानत तुड़वाकर जेल गए। 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारी सफलता के बावजूद रामलीला मैदान में दूसरी बार मुख्यमंत्री की सफल लेते हुए कहा कि उन्हें दिल्ली की जनता से जनादेश उनकी सेवा करने के लिए मिला है, वे दिल्ली से बाहर नहीं जाएंगे। तब से लेकर अब तक उनके बयान और दावों में लगातार बदलाव होते ही गए। जो हालात बनते जा रहे हैं उसमें केजरीवाल की तुलना विदेशी घुसपैठ के खिलाफ आंदोलन चलाकर सीधे छात्र आंदोलन से असम गण परिषद राजनीतिक दल बनाकर विधानसभा चुनाव जीतकर 1985 में असम के मुख्यमंत्री बने प्रफुल्ल कुमार महंत से की जाने लगी है।
आज की तारीख में महंत की असम की राजनीति में कोई चर्चा तक नहीं होती है। केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के नाम से राजनीतिक दल बनाकर 2013 में होने वाले दिल्ली विधान सभा चुनाव लड़ना तय किया। पहले ही चुनाव में ही बिजली-पानी फ्री का मुद्दा कारगर हुआ। आआपा को 70 सदस्यों वाली विधानसभा में करीब 30 फीसद वोट और 28 सीटें मिली। भाजपा करीब 34 फीसद वोट के साथ 32 सीटें जीती और दिल्ली में 15 साल तक शासन करने वाली कांग्रेस को 24.50 फीसद वोट के साथ केवल आठ सीटें मिली। भाजपा के मना करने पर आआपा ने कांग्रेस से बिना मांगे समर्थन से सरकार बनाई और नियम का पालन किए बिना लोकपाल विधेयक विधानसभा में पेश करने से रोके जाने के खिलाफ 49 दिन पुरानी सरकार ने इस्तीफा दिया।
2014 के लोकसभा चुनाव में आआपा ने देश भर में चुनाव लड़ना तय किया। खुद केजरीवाल भाजपा के प्रधानमंत्री के घोषित उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बनारस चुनाव लड़ने पहुंच गए। वे तो बुरी तरह से हारे ही आआपा के ज्यादातर प्रमुख नेता लोकसभा चुनाव लड़े और पराजित हुए। केवल पंजाब में चार सीट आआपा जीत पाई। बाद में उसमें से दो सांसद आआपा से अलग हो गए और 2019 के लोकसभा चुनाव में केवल अभी के मुख्यमंत्री भगवंत मान चुनाव जीते। 2024 में उसे केवल पंजाब में ही तीन सीटें मिली। 2014 के चुनाव में केजरीवाल ने बड़ा सपना देखा था, वे परिणाम से इतने आहत हुए थे कि कार्यकर्ताओं का गुस्सा शांत करने के लिए जबरन जमानत तुड़वाकर जेल गए। इतना ही नहीं एक-एक करके पार्टी के दिग्गजों-पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण, वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव, प्रो. आनंद कुमार इत्यादि को पार्टी से बाहर किया। बाद में कुमार विश्वास समेत अनेक दिग्गज नेता बाहर हुए। यह सिलसिला आज भी जारी है। कहा जाता कि आआपा में वही रह सकता है जो केजरीवाल के किसी फैसले पर सवाल न उठाए। बावजूद इसके आआपा को कई बड़ी सफलता मिल गई।
कांग्रेस की कमजोरी और भाजपा की अधूरी तैयारी के चलते और बिजली-पानी फ्री करने के वादे ने आप को 2015 के चुनाव में दिल्ली विधानसभा में रिकार्ड 54 फीसदी वोट के साथ 67 सीटों पर जीत दिलवा दी। उस चुनाव के बाद पार्टी में अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक कद और बढ़ गया। दोबारा मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने दिल्ली से बाहर पार्टी को न ले जाने का घोषणा कर दी। उन्होंने यह साबित कर दिया कि पार्टी को वोट उनके नाम से मिलते हैं। 2020 के दिल्ली विधान सभाचुनाव में फिर उन्होंने रिकार्ड 54 फीसद वोट के साथ 62 सीटें जीती। 2017 के गोवा विधानसभा चुनाव में तो आआपा को कोई सफलता नहीं मिली लेकिन पंजाब में बेहतर नतीजे मिले। 2017 के चुनाव में 117 सीटों की विधानसभा में आआपा को 20 सीटें मिली। 2022 में उसे न केवल 92 सीटें मिली और उसकी दिल्ली से बाहर सरकार बनी। गुजरात और गोवा में चुनाव लड़कर आआपा 10 अप्रैल,2023 को अखिल भारतीय पार्टी बन गई।
सत्ता ने उन्हें आम आदमी से खास आदमी बना दिया। सुरक्षा के भारी तामझाम से उनकी लोगों से दूरी बढ़ी और जिस वीआईपी कल्चर का विरोध करके राजनीति में आए उसी कल्चर के प्रतीक बन गए। शराब घोटाले में कई बड़े नेताओं के जेल जाने के बाद खुद केजरीवाल जेल गए। 2024 का लोकसभा चुनाव और 2015 के विधानसभा चुनाव में केजरीवाल ने अपने को प्रताड़ित करने का मुद्दा बनाने की असफल कोशिश की। 70 सदस्यों वाली विधानसभा चुनाव में भाजपा 48 सीटों के साथ 27 साल बाद सत्ता में लौटी। आआपा को 22 सीटें मिली। मतों का अंतर केवल दो फीसद का था। पहली बार आआपा 2022 के दिल्ली नगर निगम चुनाव जीती थी। उसे 250 में से134 सीटें मिली थी। भाजपा को 104 सीटें मिली थी। केन्द्र में भाजपा की सरकार होने का लाभ उसे मिलता रहा। बहुमत के बावजूद महीनों कवायद के बाद आआपा का मेयर बना। इन ढाई सालों में आआपा के पार्षद भाजपा में आते रहे। इतना ही नहीं आआपा में जाकर पार्षद बने 16 निगम पार्षद अलग दल बनाकर आप से अलग हो गए। निगम में दलबदल विरोधी कानून नहीं लागू है। अब निगम में भी भाजपा बहुमत में है।
आआपा पूरी तरह से अरविंद केजरीवाल की पार्टी है । वह न तो किसी विचारधारा से जुड़ी है, न जाति आधारित या कैडर आधारित पार्टी है। दिल्ली में सरकार जाने के बाद को पार्टी के साथ मुट्ठी भर लोग दिखते हैं। अब केवल पंजाब में आआपा की सरकार है। पंजाब सरकार के खिलाफ भी पार्टी में आवाज उठने लगी है। आआपा के विधायक जेल गए। मंत्री संजीव अरोड़ा पर केन्द्रीय एजेंसियों का छापा पड़ा है। जो हालात दिख रहे हैं उसमें तो यही लग रहा है कि शराब घोटाले की आंच अभी इस पार्टी को और झुलसाएगी। जो नेता जमानत पर जेल से बाहर हैं, वे वापस कब जेल चले जाएं कहा नहीं जा सकता है। अगर ऐसा हुआ और अन्य नेताओं के साथ केजरीवाल जेल गए तो आआपा का हाल असम गण परिषद से भी बुरा होगा। दो फीसद मतों के अंतर से सरकार बनाने वाली भाजपा दिल्ली में अपनी राजनीतिक हैसियत बढ़ाने में लगी है।
राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा देश के करीब ज्यादातर राज्यों में सत्ता में आ गई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में केन्द्र की सरकार लगातार रिकार्ड बना रही है। इस सरकार की धमक ऐसी है कि एक के बाद एक करके विपक्ष के बड़े-बड़े दिग्गज पराजित होते जा रहे हैं। कभी विपक्ष की राजनीति के प्रभावशाली नेता रहे कई नाम अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का हिस्सा बन चुके हैं। कई बड़े नेता बढ़ते उम्र या बिगड़ते समीकरण के चलते अप्रासंगिक हो चुके हैं। वामपंथी दल इतिहास बनते जा रहे हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की अपनी सीमा है। जो पढ़े-लिखे असरदार नेताओं में ममता बनर्जी और एमके स्टालिन अप्रैल,2026 के विधानसभा चुनाव में खुद अपना चुनाव हार कर अपने राज्य की सत्ता से बाहर हो चुके हैं। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और मायावती जैसे नेता अभी सत्ता से बाहर हैं और अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इनके सत्ता में आने की उम्मीद नहीं है। कई और नेताओं के भी यही हाल हैं।
अरविंद केजरीवाल भी खुद अपने विधानसभा क्षेत्र से पराजित होकर खुद वे और उनकी पार्टी दिल्ली की सत्ता से बाहर हैं। आआपा उनकी पार्टी है। इसलिए वे पंजाब के अघोषित मुख्यमंत्री माने जाते हैं। जिन सात राज्यों के विधानसभा चुनाव अगले साल होंगे उसमें पंजाब ही अकेला राज्य है जहां सत्ता पाने के लिए भाजपा को पश्चिम बंगाल जीतने जैसी मेहनत करनी पड़ेगी। प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में गृहमंत्री अमित शाह जिन्हें आधुनिक चाणक्य कहा जाता है, इसे संभव कर सकते हैं। उन्होंने भाजपा के लिए कठिन माने जाने वाले राज्यों भाजपा की सरकार बनवाकर यह साबित कर दिया है। अगर ऐसा हुआ तो विपक्ष का एक और महत्वाकांक्षी नेता इतिहास के पन्नों में समा जाएगा।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद

