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कचरा प्रबंधन और भारत के प्रयास

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कचरा प्रबंधन और भारत के प्रयास


कुलभूषण उपमन्यु

विश्व की पर्यावरणीय व्यवस्था में विभिन्न प्रकार के कचरे के कारण बड़ी समस्याएं पैदा होती जा रही हैं। न केवल मनुष्य समाज बल्कि समस्त जीव-जगत और वनस्पतियां भी कचरा जनित प्रदूषण का दंश झेलने को अभीशप्त हैं। हवा, पानी और जमीन सब इस प्रदूषण की चपेट में है। इससे वनस्पति और सारा जीव-जगत बीमारियों और जीवन संकट से गुजर रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। भारत में विश्व की 18 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है और वैश्विक नागरिक अपशिष्ट में भारत की हिस्सेदारी 12 फीसद है। भारत प्रतिवर्ष 620 लाख टन कचरा पैदा करता है। इसमें से केवल 430 लाख टन ही एकत्रित होता है और 120 लाख टन ही उपचारित होता है। 310 लाख टन लैंड फिल में डाल दिया जाता है। शेष यहां-वहां पड़ा रहता है और जंगलों, ढलानों, खेतों, जल संसाधनों को प्रदूषित करता रहता है। उसमें से कुछ खुले में जलाया जाता है। यहविषैली गैसों को स्थानीय स्तर पर फैला कर गंभीर बीमारियों का कारण बनता है।

हालांकि सरकार इसके लिए समय-समय पर नियम बनाती है। इनके खराब क्रियान्वयन के चलते स्थिति में कोई सुधार आता दिखाई नहीं देता है। गरीब बस्तियों के नजदीक डंपिंग, प्रबंधन और लापरवाही से संबंधी डेटा के अभाव के चलते नीति निर्माण और क्रियान्वयन में बाधा होती है। उच्चतम न्यायालय ने इस स्थिति का संज्ञान लेते हुए निर्देश जारी किए कि ठोस कचरा प्रबंधन नियम 2026 सख्ती से लागू किए जाएं और लापरवाही करने वालों को दंडित करने के भी प्रावधान किए गए। मुख्य निर्देश निम्न हैं- ठोस कचरा चार भागों में अलग करके एकत्र किया जाए। 1. गीला कचरा, जिसमें रसोई अपशिष्ट, भोजन,फल,सब्जियां आदि शामिल हैं। 2. सूखा कचरा, जिसमें प्लास्टिक,कागज़, धातु, कांच शामिल हैं। 3. सैनिटरी, नैपकिन, डायपर आदि के अलग अलग निपटारे की व्यवस्था करनी होगी। 4. विशेष, श्रेणी में बल्ब, बैटरी, दवाइयां आदि के लिए विशेष अधिकृत इकाइयों को ही संशोधित करने के लिए देना होगा। गीले कचरे से मीथेन बना कर ईंधन के लिए प्रयोग करना। खास कर 100 किलो दैनिक सूखा अपशिष्ट, 40,000 लीटर दैनिक पानी उपयोग करने वाली और 20,000 वर्ग मीटर में फैली इकाइयां थोक अपशिष्ट उत्पादक घोषित की गई हैं, जिन्हें गीला कचरा अपने परिसर में ही प्रसंस्कृत करना पड़ेगा।

सूखा कचरा रिकवरी फैसिलिटी को पुन: चक्रीकरण के लिए देना होगा। सूखे कचरे में से जिसका पुन: चक्रीकरण संभव नहीं होगा उसके पेलेट्स बना कर सीमेंट प्लांट और उर्जा उत्पादक इकाइयों को ईंधन के रूप में देना होगा, जिसकी मात्रा 5 फीसद से बढ़ा कर 15 फीसद की गई है। किसी भी तरह के पुन: चक्रीकरण या उपयोग के योग्य कचरे को ही लैंड फिल में डालने की अनुमति होगी। आम कचरा वहां डालने पर अतिरिक्त शुल्क देना होगा। पुराने संचित अपशिष्ट को धीरे-धीरे खत्म करने के लिए योजना बनानी होगी। पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। वे स्थानीय निकायों के माध्यम से पर्यटक शुल्क लगा सकते हैं और पर्यटक संख्या नियंत्रित कर सकते हैं। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नियम बनाएगा और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व निगरानी समितियों के माध्यम से नियम लागू किए जाएंगे। एक केंद्रीकृत पोर्टल कचरा उत्पादन, संग्रह,और निपटारे की निगरानी करेगा और भौतिक सूचनाओं को डिजिटल ऑडिट में बदलेगा। प्रबंधन के लिए अपशिष्ट से धन और उर्जा के रास्ते पर काम हो रहा है। प्लास्टिक कचरे का अलग से प्रसंस्करण करना और प्रोजेक्ट री प्लान के तहत कैरी बैग निर्माण में 20 फीसद कपास के रेशे मिलाने की योजना है।

पैकिंग सामग्री के निर्माताओं, आयातकों, और खुदरा विक्रेताओं की जिम्मेदारियां निर्धारित की गई हैं। स्थानीय स्वशासन के सभी निकायों नगर निकायों और पंचायतों के सदस्यों, प्रधानों, मेयर और काउंसल विशेष रूप से नियमों को लागू करने और जागरुकता फ़ैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराए गए हैं। नियमों को लागू करने में विफलता या ढील के चलते इन चुने हुए स्थानीय स्वशासन के जिम्मेदार लोगों और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को दंडित करने का प्रावधान किया गया है। कचरा पैदा करने वाले और प्रबंधन की जिम्मेदारी में ढील बरतने वाले, दोनों को ही दंड के दायरे में रखा गया है। यह नियम पहली अप्रैल 2026 से लागू हो गए हैं। किन्तु मुख्य चुनौती तो इन प्रावधानों को सही से लागू करने करवाने की है। कचरा प्रबंधन नियम तो 2016 से ही लागू हो गए हैं। वर्तमान में उनको अधिक सख्त बनाने का निर्णय स्वागत योग्य है। फिर भी जब तक गंभीरता पूर्वक लागू करने की व्यवस्था खड़ी नहीं की जाती, समस्या बनी ही रहेगी। जागरुकता इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण भाग है।

हर नागरिक को लगना चाहिए कि वह इन नियमों का पालन करके अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य की रक्षा कर रहा है। पर्यावरण की रक्षा कोई दया परोपकार का काम नहीं है बल्कि अपने ही वर्तमान और दीर्घकालीन जीवन व्यवस्था को सुरक्षित बनाने का काम है। इसके लिए विकेन्द्रित प्रबन्धन प्रणालियां बना कर पंचायत स्तर तक व्यवस्था खड़ी करनी होगी। विश्वविद्यालयों और स्कूलों में अनुसंधान और व्यवहारिक पुन: चक्रीकरण कार्यक्रमों के द्वारा जागरुकता फैलाई जानी चाहिए होगी। वरना यह कचरा समुद्री जीवों के विनाश से ले कर जमीन की उपजाऊ शक्ति का ह्रास और वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण से जीवन को अधिकाधिक कठिन और रोगी बनाता जाएगा। सचेत होने का समय है, क्योंकि औद्योगिक स्वार्थ और हमारी लापरवाही जीव जगत पर भारी पड़ने वाली है।

(लेखक, हिमालय नीति अभियान के अध्यक्ष और पर्यावरणविद् हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद