आसमान से बरसता ‘अमृत’, नालियों में बहता भविष्य
डॉ. अनिल कुमार निगम
भारत में जल संकट दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। पृथ्वी का लगभग 71 प्रतिशत भाग जल से ढँका हुआ है, किंतु पीने योग्य मीठे पानी की मात्रा अत्यंत सीमित है। इसमें अतिश्योक्ति नहीं होगी अगर भविष्य में भारत के कुछ क्षेत्रों में ऐसी स्थिति आ जाए जहां पानी पेट्रोल से अधिक मूल्यवान हो जाए और पर्याप्त पैसा होने के बावजूद तत्काल स्वच्छ पानी उपलब्ध न हो। देश में जब भीषण गर्मी पड़ती है, शायद तभी हमें जल संकट की याद आती है लेकिन यह समस्या ‘सुरसा के मुंह’ की तरह प्रत्येक वर्ष गंभीर होती जा रही है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है।
विभिन्न सरकारी रिपोर्टों, केंद्रीय जल बोर्ड के आकलनों और हालिया अध्ययनों के अनुसार देश की राजधानी दिल्ली में 2023-24 में भूजल दोहन 100.77 प्रतिशत तक पहुंच गया था, अर्थात् पुनर्भरण से अधिक पानी निकाला गया। 2024-25 में यह घटकर 92.1 प्रतिशत हुआ, फिर भी कई क्षेत्र ओवर-एक्सप्लॉइटेड हैं। बेंगलूरू में भूजल दोहन लगभग 177.3 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। शहर में लगभग 3.7 लाख बोरवेल सक्रिय हैं और जल टैंकरों पर निर्भरता बढ़ रही है। जबकि 2025 के आकलन में बेंगलूरू और हैदराबाद को भारत के महानगरों में सबसे गंभीर भूजल संकट वाले शहर बताया गया। कई क्षेत्रों में जलस्तर 28 मीटर गहराई तक पहुंच गया है।
देश के 54 बड़े शहरी केंद्रों में से 23 शहरों में भूजल स्तर में सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण गिरावट आई है। गिरावट की दर कई शहरों में 0.12 से 0.45 मीटर प्रति वर्ष तक पाई गई। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और बेंगलूरु जैसे महानगरों में अत्यधिक भूजल दोहन के कारण भूमि धंसाव की समस्या भी सामने आ रही है। पानी की बढ़ती समस्या के लिए कई कारण जिम्मेदार हैं। अधिसंख्य हाईराइज कॉलोनियों या सोसाइटियों में पानी की आपूर्ति के लिए निजी बोरवेल लगे होते हैं। वर्षों तक लगातार भूजल निकालने से जलस्तर नीचे चला जाता है और बोरवेल सूखने लगते हैं। टंकियों से पानी का ओवरफ्लो होना सामान्य बात है।
दूसरा प्रमुख कारण वर्षा जल संचयन का अभाव है। वास्तविकता तो यह है कि अनेक शहरों में पानी रिचार्ज करने से अधिक भू दोहन कर निकाला जा रहा है। सोसायटियों और मकानों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था नहीं है। अगर कहीं पर है भी तो वे महज शो पीस बनकर रह गए हैं क्योंकि वे फंक्शनल भी हैं या नहीं, इसकी नियमित निगरानी का जबरदस्त अभाव है। इसलिए बारिश का पानी सीधे नालियों में चला जाता है, जिससे भूजल का पुनर्भरण नहीं हो पाता।
विकास के नाम पर भवनों, सड़कों और अन्य निर्माण कार्य अनियोजित तरीके से चल रहा है। भवनों के प्रांगण, सड़कों के किनारे, आंगन, खाली प्लॉट और मिट्टी वाले क्षेत्र अब सीमेंट, टाइल्स और कंक्रीट से ढँक दिए गए हैं। इससे वर्षा का पानी जमीन में जाने का रास्ता बंद हो चुका है।
इसके अलावा आरओ सिस्टम का अपशिष्ट जल घरों में लगे आरओ फिल्टर एक लीटर शुद्ध पानी के लिए 2–4 लीटर तक पानी बाहर निकाले जाने से पानी नालियों में बह जाता है। कई कॉलोनियों में पानी की पाइप लाइनें पुरानी हैं। लीकेज से बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद होता है। यही नहीं, पुराने तालाब, कुएं और जोहड़ शहरीकरण की भेंट चढ़ गए हैं। इससे प्राकृतिक जल संचयन प्रणाली कमजोर हो गई है। सबसे अहम बात यह है कि लोगों में पानी की बर्बादी रोकने को लेकर जागरूकता का भारी अभाव है।
देश में जल संकट का सबसे बड़ा कारण पानी की कमी नहीं बल्कि वर्षा जल का खराब प्रबंधन है। भारत में औसतन 1100–1200 मिमी वर्षा होती है, जो विश्व औसत से कम नहीं है। समस्या यह है कि वर्षा का अधिकांश पानी कुछ दिनों में बहकर नदियों और अंततः समुद्र में चला जाता है, जबकि हम साल भर भूजल निकालते रहते हैं। यदि शहरों, सोसाइटियों, संस्थानों और उद्योगों में बड़े पैमाने पर वर्षा जल संचयन के लिए रेन हार्वेस्टिंग सिस्टम अनिवार्य रूप से लागू हो जाए, तो जल संकट का बड़ा हिस्सा नियंत्रित किया जा सकता है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के पानी का सौ प्रतिशत पुनः उपयोग फ्लशिंग, बागवानी और सफाई करने के लिए उपयोग किया जाना चाहिए।
भारत में इस गंभीर समस्या के बारे में कह सकते हैं कि जल संकट का समाधान आसमान से गिरता है लेकिन हम उसे नालियों में बहा देते हैं। बिजली ऑडिट की तरह हर बड़ी सोसाइटी का वार्षिक जल ऑडिट हो और यह अनिवार्य कर दिया जाए कि जितना भूजल सोसायटी निकालेंगी, उतना या उससे अधिक रिचार्ज करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा। अधिकांश शहरों ने अपने प्राकृतिक जलाशयों को खो दिया है। इसलिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण काम किया जाना चाहिए कि शहरी झीलों और तालाबों का पुनर्जीवन किया जाए। भारत के इन्हें पुनर्जीवित करना भूजल रिचार्ज का सबसे सस्ता और प्रभावी तरीका है।
इस मामले में हमें इजराइल से सीखने में भी कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। उसने जल संकट पर नियंत्रण रखने के लिए वर्षा जल संरक्षण, जल पुनर्चक्रण, ड्रिप सिंचाई, और समुद्री जल का शोधन कर जल संकट को काफी हद तक नियंत्रित किया है। हमें जल संचयन के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे तभी हम आसमान से बरसने वाले ‘अमृत’ (पानी) को नालियों में बहने से रोक पाएंगे।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
-----------------------
हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

