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अध्ययन व चिन्तन की इच्छाशक्ति कमजोर तो नहीं हो रही ?

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अध्ययन व चिन्तन की इच्छाशक्ति कमजोर तो नहीं हो रही ?


हृदयनारायण दीक्षित

बुद्धि कृत्रिम नहीं होती। संसार से हमारे परिचय की मध्यस्थता इन्द्रियबोध द्वारा होती है। हम देखते हैं। हम कान से सुनते हैं। त्वचा से स्पर्श करते हैं। नाक से सुगंध या गंध का अनुभव करते हैं। जिह्वा से स्वाद का अनुभव होता है। रूप, रस, गंध का बोध क्या वास्तविक बुद्धिमत्ता है। जबतक इन्द्रियबोध से प्राप्त सूचनाएं उपयोग में आती रहेंगी, उन्हें वास्तविक माना जाएगा। मोटे तौर पर इन सूचनाओं को वास्तविक बुद्धि या यथार्थ बुद्धि माना जाएगा। इससे परे तकनीकी के माध्यम से प्राप्त सूचना कृत्रिम बुद्धि या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कहा जा रहा है।

वास्तविक बुद्धि की कोई परिभाषा नहीं है। हम आँख से देखते हैं। यह वास्तविक बुद्धि है। हम किसी उपकरण का सहारा लेकर आंख की क्षमता बढ़ा सकते हैं। क्या देखने में सहायक इस उपकरण और तकनीकी को कृत्रिम मेधा कहेंगे। कृत्रिम मेधा आखिरकार है क्या? ब्रह्माण्ड बड़ा है। जिज्ञासु इस ब्रह्माण्ड के रहस्य जानने को इच्छुक हैं। आदिम काल से लेकर अब तक ब्रह्माण्ड के रहस्यों के प्रति सतत जिज्ञासा है। अभी बहुत कुछ जानना जिज्ञासा की परिधि में है। पृथ्वी आदि ग्रहों की गति क्षमता जान ली गई है। सोचने के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का काफी विकास हो चुका है। ब्रह्माण्ड के रहस्यों का ज्ञान मानव कल्याण के लिए उपयोगी है। अध्ययन की पारम्परिक शैली अपनी ज्ञान यात्रा में कालवाह्य होने के करीब है। हम अपनी बुद्धिमत्ता को और गहरा करने के लिए सक्रिय हैं।

मनुष्य हजारों वर्ष से अमृत्व की खोज में है। सौ वर्षों से ज्यादा जीने की अभिलाषा सर्वविदित है। रोबोट मनुष्य की तरह काम करता है लेकिन मनुष्य की तुलना में ज्यादा मजबूत, ज्यादा शक्तिशाली है। मनुष्य की तुलना में रोबोट में कमियां भी हैं। वह शक्तिशाली है लेकिन प्यार नहीं कर सकता। इंटेलिजेंट कोशेंट है लेकिन इमोशनल कोशेंट बिल्कुल भी नहीं। काम करने से प्रत्येक मनुष्य दूर रहना चाहता है। लेकिन बड़े-बड़े सपने देखता है। एआई या कृत्रिम मेधा की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। उसके गर्भ में अनंत सूचनाएं हैं। इन सूचनाओं का आधार है। वे निराधार नहीं हैं। बेशक वे किसी अन्य स्रोत से प्राप्त की गई हैं। उन सूचनाओं की उपयोगिता है। मनुष्य जीवन का कल्याण ही मनुष्य के सारे प्रयासों का लक्ष्य है। इसलिए एआई की उपयोगिता को सहज मन से थोड़ा झिझकते हुए स्वीकार करना चाहिए।

जीवन को सुखद बनाने में सूचनाओं का उपयोग है। लेकिन सूचना और ज्ञान में अंतर है। भारतीय ज्ञान परम्परा में ज्ञान को सामान्य सूचना नहीं माना गया। दुनिया के सबसे प्राचीन ज्ञान का संग्रह वेद कहलाता है। वेद का अर्थ ज्ञान है। वेद से अभिप्राय ब्रह्म सत्ता के आत्मदर्शन से है। उपनिषदों में ज्ञान को दो हिस्सों में बांटा गया है। पहले का नाम विद्या है और दूसरे का नाम अविद्या है। सारी सांसारिक जानकारियों को अविद्या कहा गया है। अविद्या का अर्थ झूठ नहीं है। सारे सांसारिक विषय, सारे शास्त्र, पुराण, विज्ञान और वेद भी अविद्या बताए गए हैं। अविद्या के परे आत्मतत्व आता है। आत्मतत्व का ज्ञान ही वास्तविक बोध है। लेकिन आत्मतत्व को उपलब्ध होना बहुत कठिन बताया गया है।

कठोपनिषद में बताया है कि, ”यह आत्मतत्व प्रवचन सुनकर नहीं मिलता। बहुत सुनकर भी यह आत्मतत्व नहीं मिलता। सम्प्रति भारत में कथा और वार्ता का वातावरण है। महंगे प्रवचन है। श्रद्धालुओं की भीड़ है। लेकिन कठोपनिषद का ऋषि कहता है, ”नायेनात्मा प्रवचनेन लभ्यो न बहुना श्रुतेन।” ऋषि आगे कहता है, ”न मेधया-यह मेधा से भी नहीं मिलता।” मेधा की बात ध्यान देने योग्य है। कृत्रिम मेधा अथवा वास्तविक मेधा से भी ज्ञान नहीं मिलता। कैसे मिलता है? ऋषि कहते हैं, ”आत्मदर्शन से मिलता है।”

भारत का आधुनिक काल तमाम तनाव और आपाधापी से गुजर रहा है। सूचना का विस्फोट काफी पहले ही हो चुका है। एआई ने सूचनाओं की नई दुनिया गढ़ी है। कृत्रिम मेधा के युग में लिखने, विश्लेषण करने और अनेक प्रकार की रचनात्मक गतिविधियों में मशीनों की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। वास्तविक चुनौती केवल यह नहीं है कि तकनीक हमारा काम आसान कर रही है चुनौती यह भी है कि कहीं सुविधा की अधिकता हमारे मौलिक चिन्तन व हमारी अध्ययन प्रवृत्ति को कमजोर तो नहीं कर रही। देखना यह चाहिए कि अध्ययन और चिन्तन की स्वाभाविक इच्छाशक्ति कमजोर तो नहीं हो रही है। पुस्तकों से हमारा रिश्ता आत्मीय रहा है। पढ़ना-लिखना गहन अध्ययन करना इस देश की प्रकृति रही है। इसी आधार पर एक लोकमंगलकारी संस्कृति का विकास हुआ है।

खतरा ये है कि हम पठन-पाठन से दूर हो रहे हैं। बहुत से सुयोग्य मित्र डींग हांकते हैं कि वे अखबार नहीं पढ़ते। यह भी कि वे किताब नहीं पढ़ते। वे पूरी शान से बताते हैं कि वे मोबाइल इंटरनेट से सूचनाएं प्राप्त कर लेते हैं। वे यह नहीं बताते कि अखबार या पुस्तकें पढ़ने या न पढ़ने का काम कौन करता है। दरअसल, तकनीकी तमाम सुविधाओं के साथ तमाम कठिनाइयाँ भी लाती है। एआई द्वारा पेश की गई तकनीकी में भी तमाम अड़चनें हैं। पारिवारिक नेह स्नेह के बंधन भी टूट रहे हैं। किसी व्यक्ति या दृश्य को विकृत रूप में दिखाना रोज का तमाशा बन गया है। फोटो को वास्तविक साक्ष्य मानने में दिक्कतें आ रही हैं।

राष्ट्रजीवन के सभी अंगों पर कृत्रिम मेधा का प्रभाव पड़ रहा है। साहित्य भी प्रभावित हुआ है। मशीनें सृजन नहीं कर सकतीं लेकिन एआई रेडीमेड कविता लेकर आपके सामने ’जी सर’ कह रही है। मौलिक चिन्तन और दर्शन पर इसके प्रभाव स्वाभाविक हैं। स¨चना मनुष्य की प्रकृति है। पशु-पक्षी भी संभवतः सोचते होंगे। नई तकनीकी ने मनुष्य के सोचने की क्षमता को घटाया है। हमारा सोचना, हंसना, बोलना भाववाची नहीं रहा। साहित्य शब्दों का रेडीमेड संयोजन नहीं होता। मशीन हमारी संवेदनाओं को अभिव्यक्ति नहीं दे सकती। यह जीवन संघर्ष के आनंद को भी अभिव्यक्त करने में सक्षम नहीं हैं। तकनीकी संवेदनशीलता का विकल्प नहीं हो सकती। जिज्ञासा मनुष्य चिन्तन की श्रेष्ठतम उपलब्धि है। तकनीकी जिज्ञासु नहीं होती। पुस्तक संस्कृति पर खतरा है। पुस्तकें हमारी मार्गदर्शक मित्र और आत्मीय की भूमिका निभाती हैं। तकनीकी पुस्तक का विकल्प नहीं हो सकती। सूचनाओं के साथ स्वाध्याय भी जरूरी है।

गंभीर पठन एक विशेष प्रकार का एकांत देता है। ऐसा एकांत, जिसमें वह लेखक के विचारों के साथ संवाद करता है। प्रश्न उठाता है और धीरे-धीरे अपने भीतर उतरता है। इसके विपरीत, छोटे-छोटे दृश्य और संदेशों के अंतहीन संसार में मस्तिष्क लगातार एक सूचना से दूसरी सूचना की ओर दौड़ता रहता है। इंटरनेट ने हमें गति अवश्य दी है लेकिन गहराई के लिए आवश्यक धैर्य का अभ्यास कठिन बना दिया है। गहन पठन मनुष्य को ठहरना, विचार करना और किसी विषय को उसके मूल तक समझना सिखाता है। हम सब समग्रता में सोचें।

(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश