योगी आदित्यनाथ पर उनके काम, उपलब्धियों और आंकड़ों के आधार पर हो बात
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विरोध में कितनी भी तीखी भाषा इस्तेमाल की जाए, उससे एक बुनियादी तथ्य नहीं बदलता कि किसी सरकार का मूल्यांकन अंततः उसके काम और उसके परिणामों से होता है। वर्ष 2017 में जब योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश की सत्ता संभाली थी, तब राज्य के सामने कानून-व्यवस्था, स्वास्थ्य, रोजगार, निवेश, बुनियादी ढांचे और औद्योगिक विकास जैसी अनेक बड़ी चुनौतियां मौजूद थीं।
करीब नौ वर्ष बाद तस्वीर को समझने के लिए राजनीतिक नारों से अधिक महत्वपूर्ण वे आंकड़े हैं, जो सरकार के कामकाज का एक ठोस आधार प्रस्तुत करते हैं। योगी आदित्यनाथ की राजनीति में गोरखपुर और पूर्वांचल की इंसेफेलाइटिस त्रासदी कोई नया मुद्दा नहीं थी। मुख्यमंत्री बनने से पहले भी वे संसद में इस बीमारी के कारण बच्चों की मौतों का मुद्दा उठाते रहे। सत्ता में आने के बाद इस समस्या से निपटने के लिए स्वास्थ्य के साथ स्वच्छता, पेयजल और ग्रामीण विकास को जोड़कर काम किया गया।
वस्तुत: सरकारी आंकड़े इस बदलाव की दिशा को ओर अधिक स्पष्ट करते हैं। उत्तर प्रदेश सरकार की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार 2017 की तुलना में 2023 में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम के मामलों में 76 प्रतिशत और मृत्यु-दर में 98 प्रतिशत की कमी हुई। जापानी इंसेफेलाइटिस के मामलों में 85 प्रतिशत तथा मृत्यु में 96 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।
यानी जिस बीमारी को पूर्वांचल के हजारों परिवारों की नियति मान लिया गया था, उसके विरुद्ध रोकथाम, स्वच्छता, पेयजल और चिकित्सा व्यवस्था को एक साथ जोड़कर परिणाम हासिल करने का दावा अब आंकड़ों में दर्ज है। आगे स्वास्थ्य क्षेत्र में बदलाव इंसेफेलाइटिस तक सीमित न रहते हुए सुधार की दिशा में बहुत आगे पहुंचा। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के सभी 75 जिलों में मुफ्त डायलिसिस सुविधा उपलब्ध है। उत्तर प्रदेश आज 63,407 पंजीकृत स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ देश में पहले स्थान पर है। राज्य में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़कर 85 हो गई है, जिनमें से कई नए सरकारी मेडिकल कॉलेज योगी शासन के दौरान ही स्वीकृत और बनाए गए हैं। इसके अलावा, ग्रामीण और शहरी स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए 22,681 आयुष्मान भारत हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं और राज्य में कुल सरकारी अस्पतालों की संख्या 4,942 से अधिक हो गई है।
स्वास्थ्य बीमा के क्षेत्र में उत्तर प्रदेश ने आयुष्मान भारत योजना के तहत 1.31 करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य कार्ड जारी किए हैं, जिससे कुल 5.59 करोड़ लाभार्थी इसके दायरे में आ चुके हैं। योजना के अंतर्गत करीब 13,353 करोड़ रुपये खर्च करके 81.55 लाख से अधिक मरीजों का अब तक मुफ्त इलाज किया जा चुका है। इलाज को सुगम बनाने के लिए राज्य में आयुष्मान योजना से जुड़े 6,213 अस्पतालों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया गया है। साथ ही, सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय कैशलेस चिकित्सा योजना भी पूरी तरह काम कर रही है। 74 जिलों में सीटी स्कैन की सुविधा उपलब्ध है और सस्ते दामों पर दवाइयाँ देने के लिए 873 जन औषधि केंद्र संचालित हैं। मरीजों को तुरंत अस्पताल पहुंचाने के लिए '108' और '102' सेवाओं के तहत 4,500 से अधिक एंबुलेंस का बेड़ा तैनात है, जिससे अब तक करोड़ों लोग लाभ उठा चुके हैं।
डिजिटल हेल्थ और मातृ स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी राज्य ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। प्रदेश में अब तक 5.76 करोड़ से अधिक नागरिकों के इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड तैयार किए जा चुके हैं। अस्पतालों और प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की देखरेख में सुरक्षित प्रसव को बढ़ावा देने के कारण राज्य में संस्थागत प्रसव का आंकड़ा सुधरकर 96.12 फीसद तक पहुंच गया है। गर्भवती महिलाओं को इसके तहत मुफ्त अल्ट्रासाउंड के लिए ई-वाउचर की सुविधा भी दी जा रही है।
योगी सरकार की सबसे प्रमुख राजनीतिक पहचान कानून-व्यवस्था को लेकर बनी। सरकार ने अपराध और माफिया के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति को शासन का प्रमुख आधार बनाया। अवैध संपत्तियों पर कार्रवाई, संगठित अपराध के विरुद्ध अभियान और पुलिस व्यवस्था में तकनीकी बदलाव को इसी नीति से जोड़ा गया है। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की आर्थिक नीतियों में भी सुरक्षा और निवेश के वातावरण को साथ-साथ रखा जा रहा है।
कभी उत्तर प्रदेश को निवेश के लिए कठिन राज्य मानने की धारणा रही थी। अब नीतिगत सुधारों और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के जरिए राज्य की निवेश क्षमता बदली है। फरवरी 2026 में सरकार की ओर से विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार पिछले करीब नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश को 50 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए और 15 लाख करोड़ रुपये से अधिक के प्रस्तावों को धरातल पर उतारने की बात सामने आई। जिसमें कि 60 लाख से अधिक युवाओं को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त हुआ।
उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था में एमएसएमई क्षेत्र की भूमिका तेजी से बढ़ी है। वर्तमान सरकारी पोर्टल पर लगभग 99 लाख एमएसएमई और 98.16 लाख औपचारिकीकृत एमएसएमई दर्ज हैं। इनमें 17.35 प्रतिशत महिला स्वामित्व वाले उद्यम भी दर्ज हैं। ‘एक जिला, एक उत्पाद’ योजना ने स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक कारीगरों को बाजार से जोड़ने का प्रयास किया। यह आंकड़ा उस विकास मॉडल की ओर संकेत करता है जिसमें रोजगार का अर्थ सरकारी नौकरी से इतर उद्यमिता और स्वरोजगार भी है।
योगी सरकार के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश की विकास नीति में एक्सप्रेसवे और औद्योगिक गलियारों को महत्वपूर्ण स्थान मिला। पूर्वांचल, बुंदेलखंड और गंगा एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं ने प्रदेश के विभिन्न हिस्सों को तेज संपर्क से जोड़ने की दिशा में काम किया। डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर और इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण को भी औद्योगिक विस्तार से जोड़ा गया है।प्रदेश में 1947 से 2017 तक कुल करीब 14 हजार कारखाने थे, जबकि पिछले साढ़े आठ वर्षों में यह संख्या 31 हजार से अधिक हो गई।
रोजगार के प्रश्न पर सरकार ने सरकारी नियुक्तियों और निजी क्षेत्र दोनों को समानांतर रूप से आगे बढ़ाने की नीति अपनाई। पिछले वर्षों में 9.30 लाख से अधिक सरकारी नियुक्तियां दी गईं। इसके साथ रोजगार संगम पोर्टल सरकारी और निजी नौकरियों, रोजगार मेलों, कैंपस प्लेसमेंट और अप्रेंटिसशिप को एक मंच पर लाने का प्रयास कर रहा है। पोर्टल पर वर्तमान में 45.75 लाख से अधिक नौकरी चाहने वालों का पंजीकरण और 7.60 लाख से अधिक जॉब अवार्ड दर्ज हैं।
शिक्षा क्षेत्र में ‘ऑपरेशन कायाकल्प’ के जरिए सरकारी विद्यालयों की आधारभूत सुविधाओं को बदलने पर जोर दिया गया। 1.91 करोड़ से अधिक बच्चों, 1,565 हाई-टेक सरकारी विद्यालयों, 6,481 नए विद्यालयों और 57 कंपोजिट विद्यालय इसके सशक्त उदाहरण हैं। एआई, ड्रोन, रोबोटिक्स और 3डी प्रिंटिंग जैसे पाठ्यक्रमों को आईटीआई से जोड़ने की दिशा यह बतलाती है कि यूपी शिक्षा में आगे है। यहां शिक्षा को पाठ्यक्रम से निकालकर तकनीकी कौशल से जोड़ने की कोशिश की गई है।
अयोध्या, काशी और प्रयागराज का विकास योगी सरकार के शासन मॉडल का एक अलग आयाम प्रस्तुत करता है। राम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम और महाकुंभ के साथ सड़क, परिवहन, आवास और पर्यटन सुविधाओं का विस्तार हुआ। सरकार इन्हें धार्मिक आस्था तीर्थाटन के साथ पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था के विकास से जोड़ती है। अत: कुल निष्कर्ष यह है योगी आदित्यनाथ के शासन पर चर्चा बयान और राजनीतिक आरोपों के आधार पर न होकर उनके काम, उपलब्धियों और आंकड़ों के आधार पर होनी चाहिए। यही स्वस्थ संवाद की मांग भी है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

