खाद्य पदार्थों के उपभोग में पूरे विश्व को आज भारत जैसे संयम की आवश्यकता है
- प्रहलाद सबनानी
वर्ल्ड वाइड फंड फार नेचर (जिसे विश्व वन्यजीव कोष भी कहा जाता है ) के एक प्रतिवेदन में बताया गया है कि विश्व यदि भारत की तरह खाद्य पदार्थों की खपत करता है तो प्रकृति द्वारा इस धरा पर उपलब्ध कराई गई खाद्य सामग्री की आपूर्ति को वर्ष 2050 तक पर्याप्त मात्रा में सुनिश्चत किया जा सकता है। परंतु विश्व में यदि अर्जेंटीना की तरह खाद्य सामग्री का उपभोग किया जाता है तो खाद्य पदार्थों की आपूर्ति के लिए इस एक धरा से काम चलने वाला नहीं हैं बल्कि वर्ष 2050 तक इसी प्रकार की 7.42 पृथ्वियों की आवश्यकता होगी। इसी क्रम में, कई प्रमुख देशों में खाद्य पदार्थों के उपभोग को ध्यान में रखकर उक्त रिपोर्ट में यह आकलन करने का प्रयास किया गया है कि यदि पूरा विश्व इन देशों की तरह ही खाद्य पदार्थों का उपभोग करना प्रारम्भ कर दे तो वर्ष 2050 तक विश्व को कितनी पृथ्वियों की आवश्यकता होगी। भारत की तरह खाद्य पदार्थों का सेवन करने पर 0.84 पृथ्वियों की आवश्यकता होगी और इंडोनेशिया की तरह खाद्य पदार्थों का उपभोग करने पर 0.90 पृथ्वियों की आवश्यकता होगी। इसी प्रकार, चीन की तरह - 1.77 पृथ्वी; जापान की तरह - 1.86 पृथ्वी; सऊदी अरब की तरह - 2.08 पृथ्वी; तुर्की की तरह - 2.11 पृथ्वी; दक्षिण कोरीया की तरह - 2.30 पृथ्वी; दक्षिण अफ्रीका की तरह - 2.94 पृथ्वी; मेक्सिको की तरह - 3.03 पृथ्वी; जर्मनी की तरह - 3.36 पृथ्वी; रूस की तरह - 3.42 पृथ्वी; यूरोपीय यूनियन की तरह - 3.52 पृथ्वी; यूके की तरह - 3.98 पृथ्वी; कनाडा की तरह - 4.50 पृथ्वी; इटली की तरह - 4.64 पृथ्वी; फ्रान्स की तरह - 5.02 पृथ्वी; ब्राजील की तरह - 5.21 पृथ्वी; अमेरिका की तरह - 5.55 पृथ्वी; ऑस्ट्रेलिया की तरह - 6.83 पृथ्वी एवं अर्जेंटीना की तरह - 7.42 पृथ्वियों की आवश्यकता होगी।
दरअसल, भारत में सनातन संस्कृति के संस्कारों के अंतर्गत खाद्य सामग्री के संयमित उपयोग को महत्व प्रदान किया जाता है, जिससे खाद्य पदार्थों का निर्माण आवश्यकता के अनुसार ही किया जाता है और इसकी बर्बादी को रोकने के भरपूर प्रयास किए जाते हैं। दूसरे, संयुक्त परिवार के चलते चार सदस्यों के साथ पांचवा सदस्य अथवा मेहमान भी समयोजित हो जाता है। अतः खाद्य पदार्थों का सर्वोत्तम उपयोग सम्भव होता है। बचपन में ही नागरिकों में यह संस्कार दिए जाते हैं कि पृथ्वी से उतना ही लें जितना आवश्यक है, अर्थात, प्रकृति का शोषण नहीं करें। तीसरे, भारत में शाकाहार का अनुपालन करने वाले नागरिकों की संख्या बहुत अधिक है एवं मांसाहार का उपयोग भी सीमित मात्रा में ही किया जाता है, जिससे पशु एवं पक्षियों की संख्या पर किसी प्रकार का विपरीत प्रभाव नहीं दिखाई देता है।
स्वामी विवेकानंद वर्ष 1893 से 1897 के बीच चार वर्षों तक सनातन संस्कृति के संस्कारों से पश्चिमी देशों के नागरिकों को अवगत कराने के उद्देश्य से पश्चिमी देशों में प्रवास पर गए थे। उस खंडकाल में भारतीय संस्कारों के प्रति पश्चिमी जगत में कई प्रकार की भ्रांतियां थीं। इन भ्रांतियों को दूर करने में उन्हें बहुत सफलता मिली थी। अमेरिका में आयोजित धर्म संसद में तो स्वामी विवेकानंद के उद्बोधन, जिसकी शुरुआत, “अमेरिका में मेरे प्रिय भाईयों और बहनों” कहने भर से लगभग 3 मिनिट तक तालियां बजाकर, नागरिकों ने उनका अभिवादन किया था। इसी क्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डा मोहन भागवत भी हाल ही में अमेरिका, कनाडा एवं ब्रिटेन देशों की यात्रा पर सनातन संस्कृति के संस्कारों से इन देशों के नागरिकों को अवगत कराने के उद्देश्य से प्रवास पर गए थे। डॉक्टर साहब ने प्रकृति का दोहन करने एवं शोषण नहीं करने का विषय भी वैश्विक स्तर पर पर्यावरण की लगातार बिगड़ रही स्थिति को सम्हालने के संदर्भ में उठाया था। डा भागवत ने अपने प्रवास के दौरान इस बात की चर्चा भी की कि सनातन संस्कृति के संस्कारों का अनुपालन कर न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व की समस्याओं का हल निकाला जा सकता है।
विकसित देशों में पूंजीवाद की व्यवस्था के चलते नागरिकों में “मैं” की भावना रहती है एवं वे केवल अपने विकास की बात करते दिखाई देते हैं एवं पदार्थों का अधिकतम उपभोग करते हैं। ईसाई एवं इस्लाम धर्मों में पुनर्जन्म की व्यवस्था पर विश्वास नहीं किया जाता है एवं जो कुछ करना है इसी जन्म में भोगना है, अर्थात जो कुछ करना है आज ही करना है कल किसने देखा है, की मानसिकता से अपना जीवन यापन करते हैं, जिससे पदार्थों का उपभोग उच्च स्तर तक जाकर करते हैं। इसके विपरीत भारतीय नागरिक “हम” की भावना के साथ परिवार के बीच मिलकर रहते हैं। उपभोक्ता के रूप में विभिन्न पदार्थों की प्रति व्यक्ति खपत विकसित देशों की तुलना में भारत में बहुत कम है और सनातन संस्कृति में पुनर्जन्म की व्यवस्था पर विश्वास किया जाता है, जिसके चलते भारतीय नागरिक पदार्थों का उपभोग संयम के साथ करते हैं। भारतीय मनीषी एवं विद्वान भी समय समय पर वैश्विक स्तर पर विभिन्न देशों को आगाह करते रहते हैं कि “भोगवादी” बनने के स्थान पर संयमित होकर पदार्थों का उपभोग किया जाना चाहिए। भारत के वेदों एवं पुराणों में भी यह उपदेश दिया गया है कि नागरिकों द्वारा किए जाने वाले “कर्म” एवं “काम”, “धर्म” आधारित होने चाहिए एवं संयमित होकर करना चाहिए।
विश्व वन्यजीव कोष की स्थापना 29 अप्रैल 1961 को स्विट्जरलैंड के ग्लैंड में की गई थी। यह एक अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन है। स्थापना के समय इसके मुख्य उद्देश्यों में शामिल था- पर्यावरण संरक्षण, लुप्तप्राय प्रजातियों और उनके प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना, वनों, मीठे पानी के स्रोतों (नदियों) और महासागरों का संरक्षण करना आदि। आज यह संगठन विश्व के 100 से अधिक देशों में लगभग 1300 संरक्षण एवं पर्यावरण से जुड़ी परियोजनाओं पर कार्य कर रहा है। वन्यजीव सप्ताह 2026 के अवसर पर अपने संदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि वनों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मूल्यवान विरासत को सुरक्षित रहखने हेतु आवश्यक है। आपने नागरिकों से वन्यजीवों और उनके आवासों की रक्षा में योगदान देने का आग्रह किया है। एक अनुमान के अनुसार, भारत में सबसे अधिक वनस्पति एवं जीवों की प्रजातियां पाई जाती हैं। नए जंगलों का विकास भी भारत में सबसे अधिक मात्रा में हो रहा है। भारत में तो पशु, पक्षियों, नदियों एवं पहाड़ों की पूजा की जाती है इसीलिए भारतीय नागरिकों को प्रकृतिप्रेमी की संज्ञा दी जाती है।
प्रतिवर्ष विश्व वन्यजीव कोष द्वारा वन्यजीव दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 का विषय- जैव विविधता - भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत जैव विविधता से समृद्ध विश्व के 17 विशाल देशों में से एक है और विश्व की जैव विविधता का 7 प्रतिशत भाग इसी देश में हैं। यहां 15 कृषि जलवायु क्षेत्र, 45,000 विभिन्न पौधों की प्रजातियां हैं जिनमें से 15,000 औषधीय पौधे हैं। इनमे से लगभग 8,000 प्रजातियों का उपयोग भारतीय चिकित्सा प्रणालियों और लोक चिकित्सा प्रणालियों में किया जाता है। भारत के लगभग 70 प्रतिशत औषधीय और सुगंधित पौधे पश्चिमी और पूर्वी घाट, हिमालय और अरावली क्षेत्र के ऊष्णकटिबंधीय जंगलों में पाए जाते हैं। भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण ने 5,250 से अधिक पौधों की प्रजातियों की पहचान की है और विभिन्न रोगों के सम्बंध में उपयोग के लिए 9,567 से अधिक लोक दावों का प्रलेखन किया है। भारत इस समृद्ध विरासत की रक्षा के लिए कड़े कदम उठा रहा है।
औषधीय और सुगंधित पौधों की अपनी विरासत को बचाने में भारत की जड़ें गहरी और दूरदर्शितापूर्ण हैं। पश्चिमी घाट के जंगलों से लेकर विदर्भ के खेतों तक, प्राचीन आयुर्वेदिक ज्ञान से लेकर ई-चरक जैसे आधुनिक डिजिटल प्लेटफार्म तक, देश संरक्षण, आजीविका और स्वास्थ्य सेवाओं को एक मजबूत सूत्र में पिरो रहा है। प्रतिबद्ध संस्थानों, सशक्त समुदायों और समावेशी नीतियों के साथ, भारत न केवल अपनी हरित संपदा को संरक्षित कर रहा है, बल्कि इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए अच्छे स्वास्थ्य, गौरव और समृद्धि के स्रोत में बदल रहा है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

