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बोझ नहीं, घर की नींव हैं बुजुर्ग

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बोझ नहीं, घर की नींव हैं बुजुर्ग


विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस (15 जून) पर विशेष

- योगेश कुमार गोयल

प्रतिवर्ष 15 जून को विश्वभर में ‘विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस’ मनाया जाता है, जिसका प्रमुख उद्देश्य बुजुर्गों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित करना, उन्हें जागरूक करना और इसे रोकने के प्रयास करना है। वर्ष 2026 में विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस का वैश्विक विषय है- ‘जागरूकता से परे: बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार की रोकथाम को कारगर बनाना।’

इस विषय का मुख्य उद्देश्य बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार के प्रति जागरूकता को ठोस, कार्रवाई योग्य नीतियों में बदलना और ऐसे मजबूत, सुरक्षात्मक तंत्र सुनिश्चित करना है जो बुजुर्गों के अधिकारों का सम्मान करते हों। भारतीय संस्कृति में तो बुजुर्गों को अनुभवों की खान माना जाता रहा है लेकिन चिंताजनक स्थिति यह है कि हमारे यहां भी अब बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार और उनकी उपेक्षा के मामले निरन्तर बढ़ रहे हैं। भारत में संयुक्त परिवारों के बजाय एकल परिवारों के बढ़ते चलन के कारण भी बुजुर्गों की उपेक्षा के मामलों में वृद्धि हो रही है।

आज की आधुनिक दुनिया में बुजुर्गों के साथ ऐसे बर्ताव के बढ़ते मामलों के पीछे सोशल स्टेट्स भी प्रमुख वजह माना जाता है। दरअसल, समाज में स्वयं की हैसियत बड़ी दिखाने की चाहत में कुछ लोगों को अपने ही परिवार के बुजुर्ग मार्ग की बड़ी रूकावट लगने लगते हैं। ऐसी ही रुढ़िवादी सोच के कारण उच्च वर्ग से लेकर मध्यम वर्ग तक में अब वृद्धजनों के प्रति स्नेह की भावना कम हो रही है। बुजुर्गों की उपेक्षा के मामले हालांकि केवल भारत तक सीमत नहीं हैं बल्कि विदेशों में तो बुजुर्गों की हालत और भी बुरी है लेकिन भारत के संदर्भ में यह स्थिति ज्यादा चिंताजनक इसीलिए है क्योंकि भारतीय समाज में सदैव संयुक्त परिवार को अहमियत दी जाती रही है, जहां बुजुर्गों का सर्वोपरि स्थान रहा है।

हमारे यहां दादा-दादी, माता-पिता, ताऊ-ताई, चाचा-चाची तथा कई बच्चों के साथ भरा-पूरा परिवार होता था, परिवार में बड़ों को सम्मान और छोटों को प्यार दिया जाता था लेकिन आज के बदलते दौर में छोटे और एकल परिवार की चाहत में संयुक्त परिवार की धारणा खत्म होती जा रही है, जिसके कारण लोग जहां अपने बुजुर्गों से दूर हो रहे हैं, वहीं बच्चे भी दादा-दादी, नाना-नानी के प्यार से वंचित हो रहे हैं।

अकेले रहने के कारण जहां अब बुजुर्गों के प्रति अपराध बढ़ने लगे हैं, वहीं छोटे परिवारों में बच्चों को परिवार के बुजुर्गों का सानिध्य नहीं मिलने के कारण उनकी कार्यशैली पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में दुनियाभर में वृद्धों एवं प्रौढ़ों के साथ होने वाले अन्याय, उपेक्षा और दुर्व्यवहार पर लगाम लगाने और वृद्धजनों के प्रति उदारता तथा उनकी देखभाल की जिम्मेदारी के अलावा उनकी समस्याओं के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने की सख्त जरूरत महसूस होने लगी है।

हमारे बुजुर्ग ही हमारे घर की नींव और समाज की अमूल्य विरासत होते हैं, जिनके अनुभव पूरे परिवार, समाज और देश के काम आते हैं। जिस घर में बुजुर्गों का सम्मान होता है, वह घर स्वर्ग से भी सुंदर माना जाता है। इसके बावजूद बहुत से परिवारों में बुजुर्गों को निरन्तर अपने ही परिजनों की उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है। ऐसे परिजनों को इस बात का आभास कराया जाना बेहद जरूरी है कि आज के युवा भी आने वाले समय में वृद्ध होंगे। जीवन में हम आज जो भी हैं, अपने घर के बुजुर्गों की बदौलत ही हैं, जिनके व्यापक अनुभवों और शिक्षाओं से हम जीवन में सभी प्रकार की कठिनाइयों को पार करने में सक्षम होते हैं। सही मायनों में हमारे बुजुर्ग ही हमें जीवन जीने का सही मार्ग सिखाते हैं। ऐसे में यदि बुजुर्गों को अपनापन और उचित मान-सम्मान दिया जाए, उनकी पसंद-नापसंद का ख्याल रखा जाए तो वे घर के लिए बेहद महत्वपूर्ण सिद्ध होते हैं।

बुजुर्गों में स्वास्थ्य चिंताएं, अनिद्रा, डर, हताशा, चिड़चिड़ापन, तनाव, बुरे सपने आना, खालीपन की भावना, भूख की कमी और अनिश्चित भविष्य से जुड़ी चिंता जैसी समस्याएं भी बढ़ रही हैं। आईआईटी मद्रास ने बुजुर्गों के हेल्थ केयर पर एक सर्वेक्षण किया था, जिसकी रिपोर्ट ‘ग्लोबलाइजेशन और स्वास्थ्य’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। उस रिपोर्ट के मुताबिक बुजुर्गों में मधुमेह, रक्तचाप तथा हृदय संबंधी बीमारियां ज्यादा आम मिली। चौंकाने वाला यह तथ्य भी सामने आया कि केवल 18.9 प्रतिशत बुजुर्गों के पास ही स्वास्थ्य बीमा की सुविधा थी और स्वास्थ्य पर उनके ज्यादा खर्च करने की क्षमता नहीं थी। बुजुर्गों की स्थिति पर आईआईटी मद्रास की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों की 27.5 फीसदी आबादी गतिहीन है और बुजुर्गों की करीब 70 फीसदी संख्या आंशिक या पूरी तरह से दूसरों पर आर्थिक रूप से निर्भर है।

बहरहाल, बुजुर्गों की विभिन्न समस्याओं को लेकर समाज को संजीदा होने और विपरीत परिस्थितियों में उनका संबल बनकर उन्हें बेहतर जीवन जीने के लिए सकारात्मक माहौल उपलब्ध कराने की दरकार है। वृद्धावस्था में बुजुर्ग शारीरिक रूप से शिथिल भी हो जाएं तो परिजनों का कर्त्तव्य है कि पूरे सम्मान के साथ उनका ध्यान रखा जाए। जैसे-जैसे व्यक्ति की उम्र बढ़ती है, शरीर का रोग प्रतिरोधी तंत्र कमजोर होने लगता है और व्यक्ति को कई प्रकार की बीमारियां चपेट में ले लेती हैं। वृद्धावस्था में विभिन्न बीमारियों के अलावा आमतौर पर घुटनों तथा जोड़ों में दर्द तथा रीढ़ की हड्डी के मुड़ने जैसी समस्याओं सहित शारीरिक स्थिति में बदलाव सामान्य बात है। बुजुर्गों को इस तरह की समस्याओं से राहत के लिए उन्हें उचित पोषण मिलना बेहद जरूरी है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश